श्रीकृष्ण ने सबको क्यों नहीं बचाया

By पं. नरेंद्र शर्मा

श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों के अनुसार स्वतंत्र इच्छा और कर्म के अटल सिद्धांतों का महा रहस्य।

श्रीकृष्ण और कर्म का नियम: गीता का रहस्य

सामग्री तालिका

भगवान श्रीकृष्ण के संपूर्ण धरा अवतरण और उनके पावन जीवन चरित्र को जब हम देखते हैं तो हमें पग-पग पर उनकी असीम करुणा के दर्शन होते हैं। उन्होंने गोकुल वासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका उंगली पर उठा लिया, यमुना नदी को विषमुक्त करने के लिए कालिया नाग का मर्दन किया, विषाद से घिरे अर्जुन का कुरुक्षेत्र के मैदान में मार्गदर्शन किया और भरी सभा में पुकारने पर संकट की घड़ी में द्रौपदी की लाज बचाई। इसके बाद भी मानव इतिहास और सनातन चिंतन में एक बहुत बड़ा प्रश्न सदैव उठता रहा है कि यदि श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान और परम दयालु हैं तो उन्होंने महाभारत के युद्ध में सबको पीड़ा और मृत्यु से क्यों नहीं बचाया। उन्होंने संसार के समस्त प्राणियों को दुखों और कष्टों से मुक्त क्यों नहीं कर दिया। इस गूढ़ रहस्य का उत्तर उनकी शक्ति पर संदेह करने से नहीं बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच के उस गहरे संबंध और सनातन नियमों को समझने से मिलता है जिसके विषय में हमारे उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत महापुराण विस्तार से बताते हैं। वैदिक ज्योतिष और आध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार श्रीकृष्ण किसी के कर्मों के विधान और उसकी स्वतंत्र इच्छा में हस्तक्षेप नहीं करते हैं क्योंकि परम मोक्ष कभी बलपूर्वक थोपा नहीं जाता बल्कि उसे आत्मा की जागृति से स्वीकार किया जाता है।

ईश्वरीय न्याय और कर्म सिद्धांत के विशेष शास्त्रीय नियम

वैदिक परंपरा के अनुसार सृष्टि का संचालन आकस्मिक नहीं है बल्कि यह पूरी तरह से काल, कर्म और ग्रहों की स्थिति के सुनिश्चित नियमों पर आधारित है। भगवान श्रीकृष्ण इस ब्रह्मांड के अधिपति होने के बाद भी इन नैतिक और प्राकृतिक नियमों की मर्यादा को कभी भंग नहीं करते हैं।

जीवन की स्थिति जीवात्मा का दृष्टिकोण श्रीकृष्ण का वैदिक नियम ज्योतिषीय कारक ग्रह आध्यात्मिक परिणाम
तीव्र कष्ट और संकट केवल बाहरी परिस्थितियों को दोष देना कर्मों के फल का अनिवार्य भोग शनि देव और राहु आत्मा का शुद्धिकरण और विवेक की जागृति
शरणागति का अभाव भौतिक सुखों और अहंकार में डूबे रहना जैसी भावना वैसी फल की प्राप्ति सूर्य और बृहस्पति सांसारिक बंधनों में निरंतर फंसा रहना
स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग अधर्म और वासना के मार्ग का चयन ईश्वर केवल साक्षी भाव में रहते हैं शुक्र और मंगल आत्म-विनाश और भविष्य के कर्म बंधन
पूर्ण समर्पण भाव सुख-दुःख में समत्व बनाए रखना योगक्षेमं वहाम्यहम् का दिव्य वचन चंद्रमा और केतु मोक्ष की प्राप्ति और ईश्वर से सायुज्य

शरणागति के अनुपात में ही ईश्वरीय कृपा का प्रवाह

श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अकाट्य सिद्धांत की घोषणा करते हैं।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

इस श्लोक का सीधा और स्पष्ट अर्थ यह है कि जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस भाव से मेरी शरण में आता है, मैं भी उसे उसी प्रकार स्वीकार करता हूँ और वैसी ही कृपा प्रदान करता हूँ क्योंकि हे अर्जुन, सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। यह दिव्य वचन प्रकट करता है कि ईश्वर की कृपा का प्रवाह कभी किसी के लिए बंद नहीं होता परंतु उसका अनुभव मनुष्य को उसकी शरणागति के अनुपात में ही होता है। श्रीकृष्ण कभी किसी जीव पर अपनी इच्छा बलपूर्वक नहीं थोपते बल्कि वे मनुष्य की आंतरिक पुकार का आदर करते हैं।

  • जो व्यक्ति उनसे केवल भौतिक सुख और धन-संपत्ति मांगता है, वे उसे वही प्रदान कर देते हैं।
  • जो साधक संसार के बंधनों से मुक्ति और मोक्ष की कामना करता है, उसके लिए वे ज्ञान का मार्ग खोल देते हैं।
  • जो भक्त इन सब से ऊपर उठकर केवल श्रीकृष्ण को ही चाहता है, वे स्वयं को उस भक्त के अधीन कर देते हैं।

कर्म के अटल विधान की परम सर्वोच्चता

यह संपूर्ण ब्रह्मांड किसी अराजकता से नहीं चल रहा है बल्कि इसकी नींव धर्म और कर्म के अटूट सिद्धांतों पर रखी गई है। भगवान श्रीकृष्ण समस्त चराचर जगत के स्वामी होने के बाद भी कर्म के इस शाश्वत नियम की मर्यादा को कभी कम नहीं करते हैं। महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद जब गांधारी ने अपने सौ पुत्रों के विनाश से दुखी होकर श्रीकृष्ण को श्राप दिया था तब भी उन्होंने अत्यंत शांत रहकर उसे स्वीकार किया। उन्होंने गांधारी को स्मरण कराया कि प्रत्येक जीव को अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है और उनके पुत्रों का अंत उनके अपने अधर्मी कृत्यों का ही परिणाम था।

यदि श्रीकृष्ण संसार के प्रत्येक व्यक्ति के बुरे कर्मों के परिणामों को अपनी जादुई शक्ति से तुरंत मिटा देते तो इस जीवन का पूरा अर्थ ही समाप्त हो जाता और जीवात्मा के लिए आत्मिक उन्नति करना पूरी तरह असंभव हो जाता। ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को कर्मफल दाता माना गया है जो प्रत्येक जीव को उसके कर्मों के अनुसार न्याय प्रदान करते हैं और श्रीकृष्ण इस व्यवस्था के परम साक्षी हैं। कर्म कोई दंड नहीं है बल्कि यह आत्मा को सुधारने वाला एक परम शिक्षक है जिसके अनुभवों से गुजरकर ही मनुष्य के भीतर वैराग्य और आत्म-ज्ञान का उदय होता है।

स्वतंत्र इच्छा का अप्रतिम उपहार

ईश्वर द्वारा जीवात्मा को दिया गया सबसे बड़ा और अमूल्य उपहार उसकी स्वतंत्र इच्छा यानी चुनने की स्वतंत्रता है। हमारे उपनिषदों में जीवात्मा को सनातन, नित्य चेतन और अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करने की स्वतंत्रता से युक्त बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण कभी भी किसी जीव से उसकी यह स्वतंत्रता नहीं छीनते और न ही किसी को अपनी भक्ति करने के लिए विवश करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय के त्रेसठवें श्लोक में संपूर्ण गीता का सार समझाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मैंने तुम्हें यह परम गोपनीय ज्ञान समझा दिया है, अब तुम इस पर पूरी गहराई से विचार करो और जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा ही करो।

कुरुक्षेत्र के उस भयंकर युद्ध के मुहाने पर खड़े होकर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को लड़ने के लिए मजबूर नहीं किया। उन्होंने अर्जुन के संशयों को दूर किया, उसे सत्य का मार्ग दिखाया परंतु अंतिम निर्णय पूरी तरह से अर्जुन के विवेक पर ही छोड़ दिया। वास्तविक प्रेम और भक्ति का मूल्य केवल तभी होता है जब उसे किसी दबाव में नहीं बल्कि पूरी स्वतंत्रता के साथ चुना जाए। यदि ईश्वर सबको अपनी कठपुतली बनाकर बलपूर्वक सही मार्ग पर चलाने लगें तो मनुष्य की चेतना का विकास पूरी तरह रुक जाएगा।

रक्षा के स्थान पर रूपांतरण की लीला

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला मनुष्य को सांसारिक दुखों से पलायन करना नहीं सिखाती बल्कि उन चुनौतियों के बीच रहकर आत्म-रूपांतरण करने की प्रेरणा देती है। जब उन्होंने इंद्र के क्रोध से गोकुल को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था तो उनका उद्देश्य केवल वर्षा से रक्षा करना नहीं था बल्कि देवराज इंद्र के झूठे अहंकार को तोड़ना और गोकुल वासियों की अंधी कर्मकांडीय रूढ़िवादिता को समाप्त करके उन्हें सीधे परमात्मा से जोड़ना था।

  • महाभारत के युद्ध को अनुमति देना विनाश की प्रशंसा करना नहीं था बल्कि अधर्म का नाश करके समाज में धर्म की स्थापना करना था।
  • श्रीकृष्ण केवल उसी स्थान पर रक्षा करते हैं जहां रक्षा करने से मनुष्य की सोई हुई चेतना जाग्रत होती हो।
  • वे उन परिस्थितियों को जीवन में आने देते हैं जो मनुष्य को भीतर से झकझोर कर उसे वासनाओं से मुक्त करती हैं।

यदि वे बिना किसी कारण के प्रत्येक मनुष्य को हर संकट से बिना प्रयास के बचा लेते तो वे मनुष्य को उस गहरे आत्मिक अनुभव और आत्म-साक्षात्कार से वंचित कर देते जो केवल संघर्षों की भट्टी में तपने के बाद ही प्राप्त होता है।

मोक्ष एक जीवंत संबंध है कोई आदेश नहीं

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार श्रीकृष्ण द्वारा अपने भक्तों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा उपहार दुखों से तात्कालिक मुक्ति नहीं है बल्कि उनके साथ प्रेम और भक्ति का वह अटूट संबंध है जो काल की सीमाओं से परे है। वे किसी राजा की भांति आदेश देकर शासन नहीं करते बल्कि वे अपने भक्तों के प्रेम के धागे में बंधना स्वीकार करते हैं। वे माता यशोदा की प्रेम रूपी रस्सी से बंध जाते हैं, द्रौपदी की करुण पुकार पर दौड़े चले आते हैं और गोपियों के आंसुओं के वश में हो जाते हैं।

यह प्रसंग ईश्वर के सबसे बड़े रहस्य को उजागर करता है कि श्रीकृष्ण को असहाय और लाचार दासों की आवश्यकता नहीं है बल्कि वे प्रेम करने वाले सखाओं और साथियों की प्रतीक्षा करते हैं। वे अपने भक्तों के जीवन से सभी कठिनाइयों को पूरी तरह मिटाते नहीं हैं बल्कि वे स्वयं उन कठिनाइयों के बीच भक्त के साथ खड़े हो जाते हैं। वे अर्जुन के सारथी बनकर पूरे युद्ध के तनाव को स्वयं झेलते हैं जिससे भक्त के जीवन का प्रत्येक दुख भी परमात्मा तक पहुंचने का एक पावन मार्ग बन जाता है।

स्वतंत्रता का सम्मान करने वाली परम करुणा का सत्य

इस संपूर्ण विवेचन के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि श्रीकृष्ण सबको क्यों नहीं बचाते क्योंकि वास्तविक मोक्ष संसार से पलायन करना नहीं बल्कि सत्य के प्रति पूरी तरह जाग्रत हो जाना है। उन्होंने मनुष्य को अपना ज्ञान, अपनी करुणा और विवेक पहले ही प्रदान कर दिया है। परमात्मा के घर का द्वार सदैव खुला रहता है परंतु उस द्वार के भीतर प्रवेश करने का निर्णय प्रत्येक जीवात्मा को स्वयं ही अपनी स्वतंत्र इच्छा से लेना पड़ता है। यह ईश्वर की किसी शक्ति की सीमा नहीं है बल्कि यह उनके प्रेम की परम पराकाष्ठा है कि वे हमें कभी भी अपनी कठपुतली नहीं बनाते और न ही हमारे कर्मों के माध्यम से मिलने वाले आवश्यक पाठों को हमसे छीनते हैं।

वे केवल एक मार्गदर्शक की भांति अत्यंत धैर्य के साथ हमारी प्रतीक्षा करते हैं और जैसे ही कोई हृदय पूरी निष्ठा से उनकी ओर मुड़ता है, वे उसका हाथ थाम लेते हैं। उनकी सबसे बड़ी दया यही है कि मोक्ष कोई सामूहिक सरकारी आदेश नहीं है बल्कि यह प्रत्येक आत्मा की श्रीकृष्ण के साथ एक अत्यंत व्यक्तिगत, गोपनीय और मधुर यात्रा है जहां अंततः प्रत्येक जीव उन्हें केवल ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में नहीं बल्कि अपनी अंतरात्मा के परम प्रियतम के रूप में खोज लेता है।

FAQ

यदि श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान थे तो उन्होंने महाभारत के युद्ध को क्यों नहीं रोका?
श्रीकृष्ण ने शांति दूत बनकर कौरवों की सभा में जाकर युद्ध को टालने का हर संभव प्रयास किया था। परंतु जब दुर्योधन ने अपने अहंकार और स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग करते हुए सुई की नोंक के बराबर भी भूमि देने से मना कर दिया, तो समाज में न्याय और धर्म की स्थापना के लिए युद्ध को होने देना ही एकमात्र विकल्प बचा था।

क्या किसी व्यक्ति का भाग्य और उसके कर्म श्रीकृष्ण की कृपा से बदले जा सकते हैं?
हां, जब कोई जीवात्मा पूरी तरह से अहंकार को त्याग कर श्रीकृष्ण के चरणों में आत्मसमर्पण कर देती है, तो उनकी असीम कृपा से संचित कर्मों के बुरे प्रभाव अत्यंत क्षीण हो जाते हैं। ज्योतिष के अनुसार भी पूर्ण शरणागति से ग्रहों की नकारात्मकता पूरी तरह शांत हो जाती है।

श्रीकृष्ण के अनुसार दुखों का मूल कारण क्या है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
श्रीकृष्ण के अनुसार दुखों का मूल कारण स्वयं को शरीर मानना, संसार की नश्वर वस्तुओं से अत्यधिक आसक्ति रखना और कर्मों के फलों की चिंता करना है। इससे बचने का एकमात्र उपाय निष्काम कर्मयोग का पालन करना और प्रत्येक परिस्थिति को ईश्वर का विधान मानकर स्वीकार करना है।

द्रौपदी और गजेंद्र की भांति श्रीकृष्ण हमें संकट के समय तुरंत बचाने क्यों नहीं आते?
श्रीकृष्ण सदैव हमारे अत्यंत समीप निवास करते हैं परंतु जब तक मनुष्य अपने धन, बल या बुद्धि के अहंकार पर भरोसा रखता है तब तक उनकी गुप्त कृपा प्रकट नहीं होती। जैसे ही मनुष्य द्रौपदी की भांति संसार का आश्रय छोड़कर केवल उन्हें पुकारता है, वे तत्काल सहायता के लिए प्रकट हो जाते हैं।

क्या स्वतंत्र इच्छा का अर्थ यह है कि मनुष्य अपनी मर्जी से कोई भी पाप कर्म करने के लिए स्वतंत्र है?
स्वतंत्र इच्छा का अर्थ कर्म करने की स्वतंत्रता है, परंतु कर्म के फल से बचने की स्वतंत्रता किसी के पास नहीं है। मनुष्य जो भी पाप या पुण्य कर्म चुनता है, उसका फल उसे प्रकृति के नियमों के अनुसार अवश्य भोगना पड़ता है और यही ईश्वर का अटल न्याय है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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