रावण की शिव भक्ति अहंकार से क्यों नहीं बची

By अपर्णा पाटनी

शिव तांडव स्तोत्र रचयिता की भक्ति और पतन का रहस्य

रावण की शिव भक्ति अहंकार से क्यों हारी

रावण: शिव भक्त लेकिन अहंकारी राजा

रावण लंका का दस मुख वाला राजा था। रामायण में उसे खलनायक के रूप में जाना जाता है। फिर भी वह भगवान शिव का परम भक्त था। शिव तांडव स्तोत्र उसकी रचना है। यह स्तोत्र आज भी गूंजता है। इसकी तीव्रता से पर्वत कांप उठे थे। रावण ने इसे कैलाश पर्वत के नीचे दबे हुए अवस्था में रचा था। उसकी आवाज़ से तीनों लोक गूंज उठे।

फिर सवाल उठता है। इतनी गहन भक्ति ने उसे विनाश से क्यों नहीं बचाया। शिव का भक्त जो अहंकार का नाश करने वाले शिव की स्तुति करता था, वह स्वयं अहंकार का शिकार कैसे हो गया। यह विरोधाभास रामायण का सबसे गहरा आध्यात्मिक प्रश्न है।

रावण की भक्ति गहन लेकिन स्वार्थपूर्ण

रावण ने वर्षों तपस्या की। प्रत्येक अवस्था में अपने दस सिरों में से एक सिर बलि चढ़ाया। यह तपस्या इतनी कठोर थी कि देवता भयभीत हो गए। शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने सभी सिर वापस कर दिए। अपार वरदान दिए। रावण लगभग अजेय हो गया। देवताओं, दानवों और मनुष्यों पर उसका प्रभुत्व हो गया।

लेकिन इस भक्ति में स्वार्थ था। शक्ति, प्रभुत्व और विश्व विजय की महत्वाकांक्षा। सच्ची भक्ति में कोई मांग नहीं होती। वह तो केवल ईश्वर की उपस्थिति की इच्छा है। रावण की भक्ति लेन-देन पर आधारित थी। वह सोचता था कि इतना कठोर तप करूंगा तो अपार शक्ति मिलेगी। यह भक्ति का व्यापार था।

अहंकार: शिव की एकमात्र असहिष्णुता

शिव को भोले बांधव कहा जाता है। वे सरलता से प्रसन्न होते हैं। एक बिल्वपत्र भी स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन वे त्रिपुरारी भी हैं। भ्रम के तीन नगरों का नाश करने वाले। गर्व, अज्ञान और अहंकार। ये तीन नगर हमारे भीतर बसे हैं।

कोई भी भक्ति कितनी ही तीव्र हो। यदि अहंकार बना रहा तो शिव की कृपा रुक जाती है। रावण के वरदानों से अहंकार और बढ़ा। वह स्वयं को देवताओं से ऊपर समझने लगा। कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास उसका चरम अहंकार था। वह सोचता था कि शिव का भक्त हूं तो कैलाश भी मेरे वश में है।

भक्ति बिना विनम्रता के अग्नि बिना प्रकाश

शिव पुराण कहता है। भक्ति के साथ विनय आवश्यक है। विनय वह दीपक है जो भक्ति को प्रकाशित करता है। रावण की भक्ति अग्नि थी लेकिन समर्पण का प्रकाश नहीं। कैलाश के नीचे दबा तब उसने शिव तांडव स्तोत्र रचा। शिव प्रसन्न हुए। उसे मुक्त किया। लेकिन विनम्रता नहीं सीखी। उल्टा यह सोचा कि मेरी भक्ति से शिव भी प्रसन्न हो गए।

आध्यात्मिक शक्ति का दुरुपयोग अभिशाप

रावण वेदों, संगीत, तंत्र, आयुर्वेद और ज्योतिष का ज्ञाता था। जिस ज्ञान के लिए ऋषि जीवन भर तप करते थे। वह शिव के गीत गाता था। वीणा बजाता था। लेकिन यह ज्ञान स्वयं की महिमा के लिए इस्तेमाल किया। सीता हरण, ऋषियों का उपद्रव, पवित्र नियम भंग। आध्यात्मिक पुण्य अहंकार से जुड़ गया तो विनाश तेज हुआ। शिव ने शक्ति दी लेकिन दुरुपयोग पर मौन रहे।

भक्ति और लेन-देन की सूक्ष्म रेखा

रामायण दिखाता है। सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक सौदा में बारीक फर्क है। रावण का तप वरदान के बदले था। नंदी या ऋषियों की भक्ति में कोई हिसाब नहीं। नंदी तो शिव के द्वार पर शांत बैठे रहते थे। रावण हमेशा सोचता था। क्या दूंगा, क्या पाऊंगा। सच्चा समर्पण इसी हिसाब को त्यागता है। भगवद्गीता भी कहती है। कर्मयोगी फल की इच्छा त्याग देता है।

शिव भक्तों की परीक्षा सबसे गहरी जगह

कथाएं कहती हैं। शिव भक्तों की परीक्षा उनकी सबसे बड़ी आसक्ति पर करते हैं। रावण की शक्ति और अहंकार की आसक्ति सीमा लांघ गई। राम के द्वार पर पहुंचे तो अहंकार ने झुकने न दिया। शिव भक्ति उसे राम को ईश्वर रूप में देखने की बुद्धि दे सकती थी। लेकिन अंधा हो चुका था। विभीषण ने समझाया लेकिन अहंकार ने सुना नहीं।

मुक्ति केवल पूजा से नहीं

हिंदू धर्म कहता है। पूजा मुक्ति का एक चरण है। गहरा चरण है आत्मसाक्षात्कार। व्यक्तिगत अहं का सार्वभौमिक में विलय। रावण ने भव्य अनुष्ठान किए। लंका में शिवलिंग स्थापित किया। लेकिन अलगाव का भाव नहीं छोड़ा। वह सोचता था मैं रावण हूं, मैं सबसे शक्तिशाली हूं।

सबसे बड़े भक्त का पतन आंतरिक शुद्धि के बिना

रावण का जीवन सिखाता है। बाहरी कर्म पर्याप्त नहीं। यदि मन दूषित है। शिव के सच्चे भक्त भीतर का लंका जलाते हैं। कन्नप्पा ने तो शिवलिंग पर अपना नेत्र चढ़ा दिया। भृंगी ने अपना शरीर ही शिव को समर्पित कर दिया। वे सादगी से पूजते थे। कुछ न मांगते थे। केवल शिव की उपस्थिति।

रावण का अनदेखा सबक

रावण की भक्ति पर्वत हिला सकती थी। लेकिन अपना अहंकार नहीं हिला सकी। पृथ्वी कांपाने वाला राजा अपना मन जीत न सका। वह शिव ही तो हैं जो अहंकार नष्ट करते हैं। लेकिन रावण ने अपना अहंकार कभी समर्पित नहीं किया।

उसका जीवन चेतावनी है। पूजा, स्तोत्र, अनुष्ठान यदि अहंकार को बढ़ाएं तो बेड़ियां बन जाते हैं। शिव महल या बलि नहीं मांगते। वे केवल एक चीज मांगते हैं। हमारा अलगाव भाव, हमारा अहंकार। उसी समर्पण में सबसे भयंकर नाशक सबसे करुणामय रक्षक बन जाते हैं।

ॐ नमः शिवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. रावण सबसे बड़ा शिव भक्त क्यों माना जाता है?
शिव तांडव स्तोत्र रचना और दस सिरों की बलि से। इस तपस्या ने शिव को भी प्रभावित किया।

2. अहंकार ने रावण को कैसे नष्ट किया?
वरदानों से बढ़ा अहंकार ने उसे राम को ईश्वर रूप में देखने से रोका। विभीषण की सलाह भी न सुनी।

3. सच्ची भक्ति क्या है?
बिना मांग के केवल ईश्वर उपस्थिति की इच्छा। फल की चिंता न करना।

4. क्या शिव भक्ति से रावण बच सकता था?
हां लेकिन केवल यदि अहंकार त्याग देता। राम से समझौता कर लेता।

5. रावण से क्या सीख मिलती है?
भक्ति के साथ विनम्रता और समर्पण आवश्यक है। बाहरी पूजा से अधिक भीतर की शुद्धि।

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अपर्णा पाटनी

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