By पं. अमिताभ शर्मा
शास्त्रों में नारद मुनि का वास्तविक स्वरूप और भूमिका

नारद मुनि का नाम लेते ही अधिकांश लोगों के मन में एक निश्चित चित्र उभर आता है। हाथ में वीणा। मुख पर हल्की मुस्कान। और हर समय "नारायण नारायण" कहते हुए इधर-उधर घूमते हुए। टेलीविजन धारावाहिकों ने इस छवि को दशकों से दोहराया है। रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण जैसे हर धार्मिक सीरियल में नारद मुनि एक हास्य पात्र के रूप में आते हैं। कोई राजा की भूल बताते हैं। तो कोई देवताओं के बीच गपशप फैलाते हैं। धीरे-धीरे यह चित्र इतना प्रचलित हो गया कि लोगों ने इसे ही नारद मुनि का संपूर्ण स्वरूप मान लिया।
लेकिन शास्त्रों में वर्णित नारद मुनि इस चित्र से कहीं अधिक गहरे हैं। वे हास्य का पात्र नहीं हैं। वे चेतना की वह शक्ति हैं जो जड़ता को तोड़ती है। जहां धर्म स्थिर हो जाता है वहां नारद मुनि गति लाते हैं। उनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि अब घटनाएं केवल मानवीय सुविधा से नहीं चलेंगी। अब सत्य हस्तक्षेप करेगा। नारद मुनि की यात्रा केवल शारीरिक नहीं है। यह चेतना की यात्रा है जो तीनों लोकों को जोड़ती है।
पुराणों, महाभारत और भागवत पुराण में नारद मुनि को महर्षि कहा गया है। वे ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। उनका जन्म किसी गर्भ से नहीं हुआ। उनका जन्म चेतना से हुआ है। यह तथ्य ही उन्हें सामान्य ऋषियों से भिन्न बनाता है। ब्रह्मा ने उन्हें सृष्टि के प्रारंभ में ही उत्पन्न किया था। वे सृष्टि के आदि साक्षी हैं।
नारद मुनि सप्तर्षियों में गिने जाते हैं। वे तीनों लोकों में स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं। देवलोक, मनुष्यलोक और पाताल लोक उनके लिए अलग-अलग क्षेत्र नहीं हैं। वे जहां आवश्यकता होती है वहां उपस्थित होते हैं। भागवत पुराण में उन्हें "दिव्य दृष्टि" वाला बताया गया है। वे भविष्य देख सकते हैं। वर्तमान की गहराई समझ सकते हैं। उनका उद्देश्य संघर्ष उत्पन्न करना नहीं है। उनका उद्देश्य उस सत्य को सामने लाना है जिसे लोग अनदेखा कर रहे होते हैं।
शास्त्रों में नारद को कभी भी स्वार्थी या अस्थिर नहीं बताया गया। वे सदा धर्म के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं भले ही वह पक्ष तत्काल अप्रिय क्यों न हो। विष्णु धरमोत्तर पुराण में उन्हें "धर्म के संदेशवाहक" कहा गया है। वे केवल संदेश नहीं देते। वे संदेश को जीवंत करते हैं।
लोकप्रिय चित्रण में नारद मुनि को गपशप करने वाला दिखाया जाता है। शास्त्रों में वे भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। "नारायण नारायण" का उच्चारण उनके लिए आदत नहीं है। यह उनका आंतरिक स्वभाव है। यह निरंतर स्मरण है। भागवत पुराण में उनकी भक्ति का वर्णन है। वे हर क्षण विष्णु का ध्यान करते हैं।
नारद मुनि यह सिखाते हैं कि भक्ति केवल एकांत में बैठकर की जाने वाली साधना नहीं है। भक्ति का अर्थ है धर्म की रक्षा के लिए सक्रिय रहना। जब देवता भी मोह में पड़ जाते हैं तब नारद उन्हें स्मरण कराते हैं। जब असुर शक्ति के नशे में डूब जाते हैं तब नारद उनकी सीमा दिखाते हैं। जब मनुष्य सत्य से दूर हो जाता है तब नारद प्रश्न बनकर सामने आते हैं। प्रह्लाद की कथा इसका जीता-जागता उदाहरण है। हिरण्यकशिपु के महल में बालक प्रह्लाद को नारद ने विष्णु भक्ति सिखाई।
नारद मुनि के हस्तक्षेप अक्सर असहज होते हैं। वे सीधे प्रश्न करते हैं। वे किसी को भ्रम में रहने नहीं देते। यही कारण है कि उनकी भूमिका को शरारत कहा गया। लेकिन यह शरारत नहीं है। यह जागृति है।
रत्नाकर से वाल्मीकि बनने की कथा इसका स्पष्ट उदाहरण है। नारद ने कोई उपदेश नहीं दिया। उन्होंने केवल प्रश्न पूछा - "मारा?" वही प्रश्न रत्नाकर के जीवन का मोड़ बन गया। रामायण की रचना इसी प्रश्न से शुरू हुई। प्रह्लाद की कथा में भी नारद का मार्गदर्शन दिखाई देता है। एक बालक को असुर पिता के अत्याचार के बीच स्थिर भक्ति देना कोई सामान्य कार्य नहीं है। दक्ष यज्ञ में भी नारद ने सत्य का पक्ष लिया।
नारद मुनि घटनाएं नहीं बनाते। वे उन घटनाओं को सक्रिय करते हैं जिनका समय आ चुका होता है। वे कालचक्र के सूत्रधार हैं।
नारद मुनि की वीणा केवल एक वाद्य नहीं है। सनातन परंपरा में ध्वनि को चेतना का माध्यम माना गया है। नारद उस ध्वनि के ज्ञाता हैं। संगीत शास्त्र में उन्हें आदि आचार्य कहा गया है।
भक्ति संगीत की परंपरा का मूल नारद मुनि से जुड़ा है। उनका संगीत मनोरंजन के लिए नहीं है। वह अहंकार को कोमल करने का साधन है। वह स्मरण की अवस्था उत्पन्न करता है। पद्म पुराण में वर्णन है कि नारद का संगीत सुनकर देवता भी समाधि में चले जाते थे। यही कारण है कि नारद का संगीत लोक-लोकांतर तक प्रभाव डालता है।
टेलीविजन ने इस पक्ष को लगभग पूरी तरह अनदेखा किया है। वीणा को केवल हास्य का साधन बना दिया।
टेलीविजन को त्वरित प्रभाव चाहिए। गहराई समय मांगती है। नारद मुनि का वास्तविक स्वरूप प्रश्न उठाता है। प्रश्न असुविधा पैदा करते हैं। असुविधा मनोरंजन के लिए कठिन मानी जाती है। दर्शक को हंसाना आसान है। सोचने पर मजबूर करना कठिन।
इसलिए नारद मुनि को हास्य का पात्र बना दिया गया। इससे कथा सरल हो जाती है लेकिन चरित्र की गरिमा नष्ट हो जाती है। नारद की भूमिका एक गंभीर चेतना से बदलकर हल्के हस्तक्षेप में बदल जाती है। रामानंद सागर की रामायण से लेकर बी.आर. चोपड़ा की महाभारत तक यही पैटर्न चला।
नारद मुनि केवल कथाओं के सूत्रधार नहीं हैं। वे आत्ममंथन के दूत हैं। उनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि अब स्वयं से प्रश्न पूछने का समय आ गया है। आज के युग में भी नारद का संदेश प्रासंगिक है। जब व्यक्ति भौतिकता में डूब जाता है तब नारद का प्रश्न याद आता है।
उनकी तथाकथित शरारत आत्मजागरण की प्रक्रिया है। उनका "नारायण नारायण" स्मरण का आमंत्रण है। स्मरण उस सत्य का जो सत्ता, भय और सुविधा से परे है। नारद मुनि हमें सिखाते हैं कि सच्ची यात्रा बाहर की नहीं। भीतर की है।
| प्रसंग | महत्व |
|---|---|
| रत्नाकर को वाल्मीकि बनाना | एक प्रश्न से जीवन परिवर्तन |
| प्रह्लाद को भक्ति सिखाना | असुर संतान में विष्णु भक्ति |
| दक्ष यज्ञ में सत्य पक्ष | शिव की रक्षा के लिए हस्तक्षेप |
| भगवत पुराण की रचना | ब्रह्मा के आदेश पर संकलन |
1. क्या नारद मुनि वास्तव में शरारती थे?
नहीं। उनके कार्य धर्म को सक्रिय करने के लिए थे। शास्त्रों में उन्हें महर्षि कहा गया है।
2. नारद मुनि को त्रिलोक यात्री क्यों कहा जाता है?
क्योंकि वे चेतना के स्तर पर तीनों लोकों में स्वतंत्र विचरण करते थे। कोई सीमा उनके लिए नहीं थी।
3. क्या नारद मुनि केवल विष्णु भक्त थे?
हां। वे भगवान विष्णु के परम भक्त माने जाते हैं। उनका हर कार्य विष्णु भक्ति से प्रेरित था।
4. क्या नारद मुनि का संगीत आध्यात्मिक था?
हां। उनका संगीत चेतना को शुद्ध करने और समाधि की अवस्था लाने का साधन था।
5. टीवी ने नारद मुनि को गलत क्यों दिखाया?
क्योंकि जटिल आध्यात्मिक पात्रों को सरल हास्य पात्र बनाना दर्शकों को बांधने का आसान तरीका था।
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