By पं. अभिषेक शर्मा
जब देवताओं ने मर्यादा और ममता के क्रम की योजना बनाई

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
भगवद गीता का यह श्लोक सिर्फ आश्वासन नहीं, एक दिव्य योजना का सार है। हर युग में जब धरती का संतुलन बिगड़ता है, विष्णु अवतार लेकर आते हैं। लेकिन एक दिलचस्प सवाल यहीं खड़ा होता है - जब राम और कृष्ण दोनों ही विष्णु के अवतार हैं, तो राम पहले क्यों आए और कृष्ण बाद में। यह केवल कहानी का क्रम नहीं, देवताओं द्वारा तय किया गया एक सोचा समझा सीक्वेंस है।
राम अवतार उस समय के लिए था जब दुनिया को मर्यादा और अनुशासन की ज़रूरत थी। कृष्ण अवतार उस समय के लिए था जब लोगों के भीतर सवाल उठने लगे थे और उन्हें नियमों से ज्यादा गहराई की तलाश थी। जैसे किसी बच्चे को पहले सही तरीके से चलना सिखाया जाता है, फिर उसे यह समझाया जाता है कि वह कहाँ और क्यों जा रहा है, वैसे ही पहले राम आए, फिर कृष्ण।
कथाएं कहती हैं कि युगों के विभाजन से पहले देवताओं ने मानो एक सभा की। प्रश्न यह नहीं था कि विष्णु अवतार लेंगे या नहीं। यह तो निश्चित था। प्रश्न यह था कि मनुष्य को सबसे पहले क्या दिया जाए - सख्त लेकिन साफ मर्यादा या खुले लेकिन गहरे उत्तर।
एक पक्ष से विचार था कि पहले नियम मजबूत किए जाएं। लोग समझें कि रिश्तों, वचनों, कर्तव्य और समाज की संरचना का महत्व क्या है। दूसरे पक्ष से विचार था कि यदि केवल नियम दिए जाएं और अर्थ न बताया जाए, तो आगे चलकर नियम बोझ भी बन सकते हैं। अंततः तय हुआ कि अवतारों का क्रम ही समाधान होगा - पहले वह अवतार जो मर्यादा बनकर जीए, फिर वह जो उसी मर्यादा के भीतर छिपे सत्य को समझाए।
इस तरह राम और कृष्ण किसी एक कहानी के दो अध्याय नहीं बल्कि आत्मिक विकास की दो सीढ़ियां हैं।
त्रेता युग में लोगों के भीतर अभी भी धर्म के प्रति सम्मान था। राजा, गुरु, विवाह, वचन, परिवार - इन सबको गंभीरता से लिया जाता था। लेकिन स्वार्थ और अहंकार की धारा भी धीरे धीरे बढ़ रही थी। नियम मौजूद थे, लेकिन उन्हें निभाने के लिए मनोबल कमजोर होने लगा था।
ऐसे समय में किसी दार्शनिक की नहीं, एक “लिविंग एक्ज़ाम्पल” की जरूरत थी। कोई ऐसा जो किताबें लिखकर नहीं, अपना जीवन जीकर सिखाए। राम इसी भूमिका में आए - मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में।
वे:
उनका जीवन यह दिखाने के लिए था कि नियम केवल तब तक भारी लगते हैं, जब तक हम उन्हें बाहर से थोपे गए मानते हैं। जब वही नियम भीतर की सच्चाई से जुड़ते हैं, तो वे बोझ नहीं, सम्मान बन जाते हैं। करियर, शादी, परिवार - इन सबमें हम रोज समझौता या स्टैंड लेने की स्थिति में होते हैं। राम की कथा हमें यह याद दिलाती है कि सही निर्णय अक्सर कठिन होता है, पर भीतर से हमें मजबूत बनाता है।
द्वापर तक पहुंचते-पहुंचते समाज कहीं ज्यादा जटिल हो चुका था। राजनीति गहरी हो गई, गठबंधन उलझे हुए हो गए, रिश्ते केवल भावनाओं से नहीं, स्वार्थ और रणनीति से भी चलने लगे। अब लोग केवल “क्या करना चाहिए” से संतुष्ट नहीं थे, “क्यों करना चाहिए” भी पूछने लगे थे।
इसी पृष्ठभूमि में कृष्ण आते हैं। वे केवल गोपाल नहीं, रणनीतिकार भी हैं। वे केवल रास करते हुए प्रेमी नहीं, संदेह में डूबे अर्जुन के सारथी भी हैं। उनका सबसे बड़ा मंच कुरुक्षेत्र बनता है, जहां एक योद्धा अपने ही रिश्तेदारों के विरुद्ध खड़ा होने से पहले अपने पूरे जीवन पर प्रश्न खड़ा कर देता है।
कृष्ण उससे केवल यह नहीं कहते कि “युद्ध कर।” वे पहले यह पूछते हैं कि अर्जुन की उलझन है कहां। जो आज की भाषा में कहा जाए तो - पहले उसकी मेंटल हेल्थ, कन्फ्यूजन, गिल्ट और अटैचमेंट को समझते हैं, फिर समाधान तक पहुंचते हैं। यह वही पैटर्न है जो आज भी करियर चुनने से लेकर शादी के निर्णय तक दिखता है - बाहर की परिस्थितियों से पहले भीतर की स्पष्टता ज़रूरी है।
अगर जीवन को एक स्कूल मानें, तो राम और कृष्ण दो अलग-अलग कक्षा के शिक्षक हैं। राम का क्लासरूम है - “ड्यूटी, रिस्पॉन्सिबिलिटी, स्टेबलिटी।” कृष्ण का क्लासरूम है - “क्लैरिटी, डिटैचमेंट, इनर फ्रीडम।”
यदि सीधे कृष्ण की गीता से शुरू करें और आधार न हो, तो “फल की इच्छा मत रखो” जैसे वाक्य कई बार गलत दिशा में इस्तेमाल हो सकते हैं। लोग जिम्मेदारी से बचने के लिए भी इसे बहाना बना सकते हैं। इसलिए देवताओं ने पहले राम भेजे - ताकि इंसान यह सीख जाए कि:
जब यह जमीन तैयार हो जाती है तब कृष्ण आते हैं और कहते हैं:
इस क्रम को अगर हम आज की उम्र (20 से 40) पर लागू करें, तो बात बहुत आसान हो जाती है - पहले करियर और रिश्तों की जिम्मेदारी समझो, फिर उनमें संतुलन और शांति सीखो।
राम के हाथ में धनुष है, कृष्ण के हाथ में बांसुरी। यह सिर्फ सौंदर्य भर नहीं, संदेश भी है।
धनुष:
यह उस समय की ज़रूरत थी जब समाज को बाहर से मजबूत ढांचा चाहिए था। रावण जैसे अहंकारी शक्तियों को रोकने के लिए स्पष्ट सीमा, स्पष्ट प्रहार और स्पष्ट न्याय जरूरी था।
बांसुरी:
यह उस युग की ज़रूरत थी जहां लोग नियमों से थक चुके थे और उन्हें प्रेम, स्वीकार और inner calling की आवाज सुननी थी। आज भी हम देख सकते हैं - कोई बॉस अगर सिर्फ धनुष की तरह आदेश देता रहे, तो टीम थक जाती है। वहीं कोई व्यक्ति बांसुरी की तरह प्रेरित करे, तो लोग स्वेच्छा से काम करते हैं।
देवताओं ने पहले धनुष दिया ताकि जीवन में स्ट्रक्चर बने। फिर बांसुरी दी ताकि स्ट्रक्चर में स्नेह, संगीत और सहजता आ सके।
राम की कथा में फोकस बाहर है - राज्य, युद्ध, प्रजा, शासन, न्याय। वे बाहरी व्यवस्था को संतुलन में लाते हैं। यदि इसे आज के संदर्भ में देखें, तो यह वह फेज है जब हम:
इस समय स्थिरता, अनुशासन, भरोसा और त्याग सब महत्वपूर्ण होते हैं।
कृष्ण की कथा में असली फोकस भीतर है - अर्जुन का डर, कन्फ्यूजन, गिल्ट, अटैचमेंट। यह हमारे जीवन का वह फेज है, जब बाहर से सब ठीक दिखता है, लेकिन अंदर सवाल उठने लगते हैं:
राम और कृष्ण मिलकर बताते हैं कि जीवन में पहले बाहर की नींव जमा लेना गलत नहीं, जरूरी है। लेकिन वहीं रुक जाना भी पर्याप्त नहीं। एक समय के बाद भीतर की स्पष्टता और शांति पर काम करना भी उतना ही ज़रूरी है।
कल्पना करो, अगर पहले ही कोई अवतार आता और कहता - “सब लीला है, कुछ भी स्थायी नहीं, फल की चिंता मत करो, आसक्ति छोड़ो” - तो क्या हम इसे गंभीरता से लेते या उसे जीवन से भागने का बहाना बना लेते।
शायद कई लोग कहते:
यही गलतफहमी रोकने के लिए राम पहले आए। उन्होंने सिखाया कि:
कृष्ण बाद में आए और उन्होंने सिखाया कि:
20 से 40 की उम्र में:
इस फेज में:
यदि केवल राम को समझें और कृष्ण को भूल जाएं, तो हम अपने आप को हमेशा दूसरों के लिए जला देने को ही धर्म मान बैठेंगे।
यदि केवल कृष्ण को पकड़ें और राम को भूल जाएं, तो हम जिम्मेदारियों से बचने को ही आध्यात्मिकता कहने लगेंगे।
संतुलन यही है - बाहर से राम, भीतर से कृष्ण।
1. क्या राम और कृष्ण अलग संदेश देते हैं या वे एक ही सत्य के दो रूप हैं?
दोनों एक ही सार की ओर ले जाते हैं - धर्म और अंततः आत्मबोध की ओर। फर्क केवल इतना है कि राम रास्ता अनुशासन और मर्यादा से दिखाते हैं, कृष्ण उसी रास्ते की गहराई और स्वतंत्रता समझाते हैं।
2. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में किसका आदर्श ज़्यादा काम आता है - राम या कृष्ण?
दोनों। ऑफिस और परिवार की जिम्मेदारियों के लिए राम की मर्यादा जरूरी है। मानसिक दबाव, कन्फ्यूजन और रिश्तों के उलझाव के लिए कृष्ण की गीता उतनी ही जरूरी है।
3. क्या बिना राम की समझ के कृष्ण की गीता को सही तरह से अपनाया जा सकता है?
थोड़ा बहुत हां, पर गहराई से नहीं। बिना जिम्मेदारी समझे “डिटैचमेंट” अक्सर भागने का बहाना बन जाता है। पहले जिम्मेदारी सीखना, फिर डिटैचमेंट समझना सुरक्षित क्रम है।
4. क्या राम केवल नियमों के प्रतीक हैं और कृष्ण केवल आज़ादी के?
नहीं। राम के भीतर भी करुणा है और कृष्ण के भीतर भी मर्यादा। बस उनकी प्रमुख भूमिका अलग है - राम ढांचा खड़ा करते हैं, कृष्ण उस ढांचे के भीतर छुपे ईश्वर से मिलवाते हैं।
5. व्यक्तिगत ग्रोथ के लिए इस क्रम से हमें क्या सीख मिलती है?
पहले जीवन को संभालो - काम, रिश्ते, जिम्मेदारियां। फिर जीवन को समझो - मैं कौन हूं, मुझे सच में क्या चाहिए और मुझे भीतर से किस दिशा में जाना है। राम और कृष्ण मिलकर इस पूरी यात्रा को संतुलन और अर्थ देते हैं।
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