By अपर्णा पाटनी
इस व्रत के शुभ फल और पूरी कथा

एकादशी का नाम लेते ही मन में भगवान विष्णु का स्मरण स्वतः होने लगता है। वर्ष भर में आने वाली चौबीस एकादशियों में से योगिनी एकादशी को विशेष रूप से फलदायी और पाप नाशक माना जाता है। मान्यता है कि जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से व्रत रखकर पूजा करता है और योगिनी एकादशी की कथा श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है, उसकी मनोकामनाएं धीर धीरे पूर्ण होने लगती हैं और जीवन की कई बाधाएं शांत होती हैं।
योगिनी एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की उपासना के साथ लक्ष्मी जी की आराधना भी की जाती है, जिससे धन, सुख और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता है। व्रत का वास्तविक फल मात्र उपवास से नहीं बल्कि पूजा, कथा श्रवण और मन की शुद्ध भावना से मिलकर बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि योगिनी एकादशी का व्रत कथा के बिना पूर्ण नहीं माना जाता।
योगिनी एकादशी व्रत को केवल एक साधारण उपवास नहीं माना जाता बल्कि यह व्रत मन, शरीर और कर्म, तीनों स्तरों पर शुद्धि का माध्यम समझा जाता है।
कथा में वर्णित घटनाएं केवल कहानी नहीं बल्कि यह संकेत हैं कि गलती का अहसास, सच्चा पश्चाताप और ईमानदार साधना मिल जाए, तो कितना बड़ा परिवर्तन संभव हो सकता है।
योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा अत्यंत मार्मिक है और मन को भीतर तक झकझोरती है। यह कथा बताती है कि लापरवाही और कामवशता कैसे अचानक जीवन की दिशा बदल सकती है और साथ ही यह भी दिखाती है कि सही व्रत और साधना जीवन को वापस ऊंचाई पर ले जा सकती है।
बहुत प्राचीन समय की बात है। अलकापुरी में देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर का भव्य नगर था। कुबेर भगवान शंकर के महान भक्त थे और प्रतिदिन बड़े प्रेम से भगवान शंकर की पूजा किया करते थे। उनकी पूजा के लिए एक हेम नामक माली को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह हर दिन मानसरोवर से ताजे पुष्प लाकर समय पर अर्पित करे।
हेम माली प्रतिदिन समय पर मानसरोवर से फूल लाकर, पूजा स्थल को सुगंधित पुष्पों से भर देता था। जीवन व्यवस्थित चल रहा था, कुबेर प्रसन्न थे और हेम माली भी देव सेवा का सौभाग्य पा रहा था। लेकिन एक दिन परिस्थितियां बदल गईं। उस दिन हेम माली अपनी पत्नी के साथ कामोन्मत्त होकर स्वच्छंद विहार में इतना अधिक मग्न हो गया कि उसे अपने दायित्व की सुध ही नहीं रही।
समय निकल गया, पूजा का मुहूर्त बीत गया और वह बहुत देर से फूल लेकर कुबेर के दरबार में पहुंचा। कुबेर ने जब देखा कि भगवान शंकर की पूजा समय पर नहीं हो पाई और कारण केवल माली की लापरवाही और विषयासक्ति है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। क्रोध में उन्होंने हेम माली को शाप दे दिया कि उसे मृत्युलोक में कोढ़ी होकर भटकना पड़ेगा।
शाप के प्रभाव से उसी क्षण हेम माली का दिव्य रूप नष्ट हो गया और वह कोढ़ से ग्रस्त होकर धरती पर गिर पड़ा। परिवार, सुख, सम्मान सब छिन गया और वह अकेला, घायल मन और बीमार शरीर लेकर जंगल जंगल भटकने लगा।
भटकते भटकते एक दिन हेम माली एक घने वन में पहुंचा, जहां महान तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि तप में लीन थे। कोढ़ से पीड़ित, अत्यंत दुखी और थका हुआ हेम माली ऋषि की शरण में गिर पड़ा। उसकी दयनीय दशा देखकर ऋषि ने करुणा से प्रेरित होकर पूछा कि वह कौन है, यह अवस्था कैसे हुई और किस पाप के कारण ऐसा कष्ट आया।
हेम माली ने आंखों में पश्चाताप के साथ अपने पूरे जीवन की कथा, कुबेर की सेवा, शंकर पूजा के लिए फूल तोड़ने की जिम्मेदारी और फिर अपने कामभाव से विचलित होकर कर्तव्य में देरी, तथा कुबेर के शाप तक की पूरी कहानी सुना दी। ऋषि ने उसकी सच्चाई और पछतावे को समझा और उसे उद्धार का मार्ग बताया।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा कि यदि वह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करेगा, तो उसके पापों का क्षय होगा और उसका कोढ़ मिट जाएगा। यह सुनकर हेम माली के भीतर आशा की ज्योति जगी। उसने अत्यंत विनम्रता से मुनि को साष्टांग प्रणाम किया और निश्चय कर लिया कि बताए गए नियम के अनुसार वह योगिनी एकादशी का व्रत अवश्य करेगा।
समय आने पर हेम माली ने मार्कण्डेय ऋषि के निर्देशों के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत रखा। उसने नियम, संयम, श्रद्धा और पूर्ण निष्ठा के साथ उपवास किया, पूजा की, कथा सुनी और मन ही मन बीते हुए दोषों के लिए क्षमा मांगी।
इस व्रत के प्रभाव से धीरे धीरे उसका कोढ़ समाप्त हो गया। उसका शरीर पुनः दिव्य और स्वस्थ हो उठा। पाप भार से दबा हुआ जो जीवन था, वह हल्का होकर ऊर्जावान और प्रसन्न हो गया। अंततः वह स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ और उसकी स्थिति पहले से भी अधिक प्रकाशमय हो गई।
इस कथा का संकेत यही है कि अपने कर्मों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करके, सही मार्गदर्शन में व्रत और साधना किया जाए, तो अत्यंत भारी दोष भी धीरे धीरे हल्के हो सकते हैं।
योगिनी एकादशी व्रत केवल भोजन न करने का नाम नहीं बल्कि पूरे दिन की एक सुसंगत साधना है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की इस तिथि पर दिनचर्या कुछ इस प्रकार मानी जाती है।
योगिनी एकादशी के दिन केवल पूजा नहीं बल्कि दान और कथा श्रवण को भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
इन मान्यताओं का मर्म यही है कि प्रकृति, पेड़, जीव और समाज, इन सबके प्रति व्यक्ति जिम्मेदार रहे और जब भी भूल हो जाए, तो सच्चे पश्चाताप और व्रत साधना के माध्यम से स्वयं को भीतर से बदलने की कोशिश करे।
योगिनी एकादशी व्रत कथा केवल पुण्य अर्जन या पाप नाश की सूची भर नहीं बल्कि एक गहरा जीवन संदेश भी देती है।
इस एकादशी का सार यही है कि व्रत केवल पेट से नहीं बल्कि मन से भी रखा जाए। जब व्रत के साथ संकल्प, सुधार और आत्मचिंतन जुड़ जाते हैं तब योगिनी एकादशी वास्तव में जीवन में योग अर्थात जुड़ाव और संतुलन की भावना जगा देती है।
क्या केवल कथा पढ़ लेने से व्रत का फल मिल जाता है?
कथा पढ़ना या सुनना व्रत का महत्वपूर्ण भाग है, पर पूर्ण फल के लिए व्रत, पूजा, संयम और कथा, इन सबका सम्मिलित रूप से पालन करना अधिक शुभ माना जाता है।
यदि पूर्ण उपवास न कर सकें तो क्या योगिनी एकादशी का व्रत रख सकते हैं?
अपनी स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार फलाहार या हल्का व्रत भी किया जा सकता है, पर मन में शुद्ध भावना, संयम और भगवान के प्रति श्रद्धा बनी रहना आवश्यक है।
क्या इस दिन केवल भगवान विष्णु की ही पूजा करनी चाहिए?
मुख्य आराध्य भगवान विष्णु हैं और साथ में देवी लक्ष्मी की पूजा की भी परंपरा है, ताकि जीवन में अर्थ और धर्म दोनों का संतुलन बना रहे।
क्या योगिनी एकादशी केवल रोग मुक्ति के लिए ही महत्वपूर्ण है?
यह व्रत रोग नाश के साथ साथ पाप क्षय, मानसिक शांति, समृद्धि और जीवन में नई शुरुआत की भावना जगाने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
यदि किसी कारण से कथा न सुन पाएं तो क्या करना चाहिए?
यदि उसी दिन कथा सुनना संभव न हो, तो मन ही मन भगवान से क्षमा मांगकर, सुविधा होते ही श्रद्धा से कथा पढ़ना या सुनना अच्छा रहता है। फिर भी कोशिश यही हो कि व्रत के दिन ही कथा अवश्य सुनी जाए।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 15
इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, मुहूर्त
इनके क्लाइंट: म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें