दक्षिण भारत के नौ नवग्रह मंदिर

By पं. अभिषेक शर्मा

जानिए तमिलनाडु के कुंभकोणम क्षेत्र में स्थित पवित्र नवग्रह परिपथ का वास्तविक आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्य

नवग्रह मंदिर दक्षिण भारत दर्शन और ज्योतिषीय लाभ जानिए

सामग्री तालिका

सनातन धर्म की पावन वैचारिक चेतना और वैदिक ज्योतिष के विशाल वांग्मय में नवग्रहों के गोचर और उनकी युति विन्यासों को चराचर ब्रह्मांड की आदि ऊर्जा का साक्षात कर्मायन माना गया है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय विन्यासों और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं का अंतिम लक्ष्य भी मनुष्य के भीतर छिपी हुई उसी सुप्त चेतना को जाग्रत करना है जिसे नवग्रहों की रश्मियाँ निरंतर प्रभावित करती हैं। दक्षिण भारत की पवित्र भूमि पर अधिष्ठित नौ नवग्रह मंदिर केवल साधारण स्थापत्य कला के केंद्र नहीं हैं बल्कि वे तो मानव जीवन के व्यावसायिक आयामों, आर्थिक कर्माशय और मानसिक स्पष्टता को पूरी तरह से शोधित करने वाले साक्षात ब्रह्मांडीय पोर्टल हैं। तमिलनाडु के कुंभकोणम, तंजावुर, मयिलादुथुरै और पुदुचेरी के करैकल क्षेत्र में फैले ये नौ जाग्रत मंदिर एक अत्यंत विशिष्ट पवित्र ज्यामितीय परिपथ अर्थात ज्योमेट्रिक सर्किट का निर्माण करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार इन प्राचीन देवस्थानों की सामूहिक यात्रा करने से जातक के जीवन से शनि की साढ़ेसाती, राहु-केतु जनित भयानक मतिभ्रम और मंगल दोष जैसी भयंकर बाधाओं का समूल शमन स्वतः ही हो जाता है।

नवग्रह मंदिरों की यात्रा का क्रम एवं ज्योतिषीय विवरण

इस पवित्र नवग्रह परिपथ की यात्रा से जुड़े समस्त आवश्यक खगोलीय ग्रहों, उनके विशिष्ट मंदिरों, भौगोलिक स्थानों और अनुशंसित नियमों की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना प्रत्येक निष्ठावान सात्विक साधक के लिए अनिवार्य है। नीचे दी गई तालिका में दक्षिण भारत के इन नौ दिव्य केंद्रों का एक स्पष्ट ज्योतिषीय और व्यावहारिक विवरण प्रस्तुत किया गया है।

ग्रह का नाम वैदिक मंदिर का नाम भौगोलिक स्थान (दक्षिण भारत) मुख्य ज्योतिषीय निवारण एवं लाभ
सूर्य देव (Sun) सूर्यनार कोविल (आदित्येश्वरर) तंजावुर (तमिलनाडु) आरोग्यता की प्राप्ति, सूर्य जनित दोषों और पितृ ऋण से मुक्ति
चंद्र देव (Moon) कैलाशनाथर मंदिर थिंगलूर (तंजावुर) मानसिक तनाव का समूल नाश और संवेगात्मक संतुलन
अंगारक (Mars) वैदीश्वरन कोइल मयिलादुथुरै (तमिलनाडु) भूमि विवादों का निपटारा और प्रचंड क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण
बुध देव (Mercury) श्वेतारन्येश्वरर मंदिर थिरुवेंकाडु (मयिलादुथुरै) प्रखर बुद्धि, शिक्षा की बाधाओं का अंत और व्यापार में वृद्धि
गुरु देव (Jupiter) आपत्सहेश्वरर मंदिर अलंगुडी (तिरुवारूर) वैवाहिक सुख की प्राप्ति, परम ज्ञान और संतान सुख का उदय
शुक्र देव (Venus) अग्निश्वरर मंदिर कंजनूर (तंजावुर) विलासिता, कलात्मक विकास और दांपत्य जीवन की मधुरता
शनि देव (Saturn) दरबारन्येश्वरर मंदिर थिरुनल्लर (करैकल) साढ़ेसाती के कष्टों का शमन और कड़े कर्मों का परम शोधन
राहु देव (Rahu) नागनाथस्वामी मंदिर थिरुनागेश्वरम (तंजावुर) कालसर्प दोष का निवारण और मानसिक भ्रम का पूर्ण अंत
केतु देव (Ketu) नागनाथस्वामी मंदिर कीजपेरुम्पल्लम (मयिलादुथुरै) संचित कर्माशय की शुद्धि, वैराग्य और मोक्ष मार्ग की सिद्धि

सूर्य देव के तेज से प्रारंभ होने वाली आदि ब्रह्मांडीय यात्रा

वैदिक खगोल विज्ञान के अनुसार नवग्रह परिपथ की आदि यात्रा साक्षात जगत की आत्मा सूर्य देव के पावन धाम से प्रारंभ होती है क्योंकि सूर्य ही संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड को प्राण ऊर्जा और जीवन तत्व प्रदान करते हैं। तंजावुर क्षेत्र में चोल राजवंश के कालखंड में निर्मित सूर्यनार कोविल एक अत्यंत जाग्रत और विस्मयकारी देवस्थान है जो संपूर्ण दक्षिण भारत में अपनी तरह का एकमात्र अद्वितीय केंद्र है।

  • इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ मुख्य गर्भगृह के चारों ओर शेष आठों ग्रहों के अलग-अलग स्वतंत्र विग्रह स्थापित हैं।
  • ऐसी विशिष्ट ज्यामितीय संरचना किसी अन्य नवग्रह मंदिर में मिलना सर्वथा असंभव माना गया है।
  • जो जातक शारीरिक व्याधियों, हृदय रोगों, नेत्र विकारों या पिता के साथ कड़े वैचारिक मतभेदों से पीड़ित हैं वे यहाँ आकर विशेष अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
  • यहाँ सूर्य देव की सात्विक रश्मियाँ मनुष्य के भीतर के सुसुप्त आत्मविश्वास को जाग्रत करके उसे समाज में उच्च पद और सामाजिक आदर प्रदान कराती हैं।

मन के कारक चंद्र देव और थिंगलूर के कैलाशनाथर मंदिर का सत्य

ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मनुष्य के मन, अंतःकरण की भावनाओं और सूक्ष्म अंतःप्रज्ञा का मुख्य अधिपति स्वीकार किया गया है। थिंगलूर में स्थापित कैलाशनाथर मंदिर मूल रूप से देवाधिदेव महादेव को समर्पित है परंतु यहाँ चंद्र देव की जाग्रत रश्मियों के कारण इसे मुख्य चंद्र स्थल के रूप में पूजा जाता है।

इस पावन तीर्थ में चंद्र देव के दोषों के समूल शमन के लिए कच्चे दूध की खीर अर्थात पाल पायसम का भोग अर्पण करने की एक अत्यंत पवित्र और कालजयी परंपरा आदि काल से चली आ रही है। जो जातक मानसिक अवसाद, गंभीर अनिद्रा रोग, अत्यधिक भावनात्मक व्याकुलता या अज्ञात भयों के गहन अंधकार से ग्रसित रहते हैं वे इस पावन धरा पर आकर प्रार्थना करते हैं। चंद्र देव की शीतल किरणें साधक के अनाहत चक्र को जाग्रत करके उसके मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को पूरी तरह शांत कर देती हैं जिससे जीवन में एक अचल संवेगात्मक स्थिरता स्वतः ही स्थापित हो जाती है।

अंगारक मंगल की प्रचंड ऊर्जा और वैदीश्वरन कोइल का हीलिंग विज्ञान

मयिलादुथुरै क्षेत्र में अवस्थित वैदीश्वरन कोइल संपूर्ण भारतवर्ष के तांत्रिक और ज्योतिषीय इतिहास में एक अत्यंत प्रखर और दिव्य हीलिंग केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित है। यहाँ साक्षात महादेव वैद्यनाथर अर्थात समस्त रोगों के परम चिकित्सक के रूप में विराजमान हैं जो कड़े शारीरिक कष्टों को क्षणभर में नष्ट करने का सामर्थ्य रखते हैं।

  • मंगल ग्रह की उग्र ऊर्जा जब इस भूमि के जलीय तत्वों से मिलती है तो वह मनुष्य के भीतर के प्रचंड क्रोध, रक्त विकारों और भाई-बहनों के साथ चले आ रहे विवादों को शांत करती है।
  • इस पावन परिसर के भीतर जटायु कुंडम नामक एक अत्यंत पवित्र जल स्रोत विद्यमान है जिसकी मिट्टी और जल में अद्भुत औषधीय गुण पाए जाते हैं।
  • यह स्थान नाडी ज्योतिष का भी आदि केंद्र माना गया है जहां ताम्रपत्रों के माध्यम से मनुष्य के पूर्व जन्मों के कर्माशय को देखा जा सकता है।
  • यहाँ की भूमि तत्व की रश्मियाँ जातक के जीवन से भूमि, भवन और पैतृक संपत्ति से जुड़े भयंकर कानूनी विवादों को सदा के लिए समाप्त कर देती हैं।

बुध देव की कुशाग्रता और थिरुवेंकाडु का श्वेतारन्येश्वरर महाक्षेत्र

बुद्धि, वाणिज्य, गणितीय गणना और तार्किक वाणी के कारक बुध देव की आराधना के लिए थिरुवेंकाडु का श्वेतारन्येश्वरर मंदिर सबसे जाग्रत और अचूक स्थान माना गया है। इस पावन महाक्षेत्र के भीतर ब्रह्मा थीर्थम नामक एक अत्यंत अलौकिक और पवित्र सरोवर स्थित है जिसके जल का स्पर्श चेतना को शुद्ध कर देता है।

यह स्थान उन विद्यार्थियों, लेखकों, प्रखर वक्ताओं और व्यापारियों के लिए साक्षात वैकुंठ का द्वार है जिनके जीवन में शिक्षा या व्यवसाय के क्षेत्र में कड़े अवरोध उपस्थित हो रहे हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी पावन भूमि पर भगवान शिव ने अपना दिव्य नटराज नृत्य प्रस्तुत किया था जो ब्रह्मांडीय तरंगों के संचरण का आदि स्रोत है। यहाँ बुध देव की सात्विक ऊर्जा जातक की रीढ़ की हड्डी के भीतर स्थित सुषुम्ना नाड़ी को झंकृत करती है जिससे उसकी निर्णय लेने की क्षमता अत्यंत परिपक्व और सूर्य के समान स्पष्ट हो जाती है।

देवगुरु बृहस्पति का दिव्य ज्ञान और अलंगुडी का आपत्सहेश्वरर धाम

वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को भाग्य, उच्च आध्यात्मिक ज्ञान, सात्विक विवाह और संतान सुख का परम प्रदाता माना गया है। अलंगुडी में प्रतिष्ठित आपत्सहेश्वरर मंदिर को संपूर्ण दक्षिण भारत में गुरु स्थल के रूप में सर्वोच्च आदर प्राप्त है।

इस पवित्र स्थान पर महादेव आपत्सहेश्वरर के रूप में विराजमान हैं जिसका सूक्ष्म दार्शनिक अर्थ है वह परम सत्ता जो अपने भक्तों को भयंकर संकटों और आकस्मिक आपदाओं से सुरक्षित निकाल लेती है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु गुरु ग्रह के आत्मबल को सुदृढ़ करने के लिए भगवान गुरु को पीले रंग के वस्त्र, चने की दाल और पीले पुष्पों की माला पूरी निष्ठा के साथ अर्पित करते हैं। यह अनुष्ठान जातक की कुंडली में स्थित गुरु चांडाल दोष या राहु के अशुभ प्रभाव को पूरी तरह भस्म करके उसके जीवन में ऐश्वर्य और पारिवारिक सुख की पुनर्स्थापना करता है।

शुक्र देव का सात्विक सौंदर्य और कंजनूर का अग्निश्वरर मंदिर

सौंदर्य, कला, भौतिक विलासिता, दांपत्य सुख और रचनात्मक अभिव्यक्ति के मुख्य कारक शुक्र देव की साधना के लिए कंजनूर का अग्निश्वरर मंदिर अत्यंत अद्वितीय माना गया है। इस मंदिर के विन्यास के पीछे एक अत्यंत गूढ़ और जाग्रत आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है जो संहिताओं में वर्णित है।

धर्माचार्यों के अनुसार इस पावन धाम में साक्षात महादेव स्वयं शुक्र देव के विग्रह के भीतर अंतर्निहित होकर निवास करते हैं जिससे इस स्थान की शक्तियाँ अनंत गुना अधिक प्रखर हो जाती हैं। जो जातक अपने वैवाहिक जीवन में भयानक कड़वाहट, संतान हीनता या कला के क्षेत्र में कड़े अवरोधों का सामना कर रहे हैं वे यहाँ आकर शुक्र देव की शरण ग्रहण करते हैं। शुक्र की यह सात्विक ऊर्जा मनुष्य के भीतर के कामुक विकारों का शोधन करके उसे निश्छल प्रेम और दांपत्य स्थायित्व का अमूल्य वरदान प्रदान करती है।

शनि देव का कठोर अनुशासन और थिरुनल्लर का दरबारन्येश्वरर महाक्षेत्र

संपूर्ण भारतवर्ष में शनि देव के सबसे प्रखर और भयानक दोषों को शांत करने के लिए पुदुचेरी के करैकल में स्थित थिरुनल्लर का दरबारन्येश्वरर मंदिर सबसे सर्वोच्च और शक्तिशाली माना गया है। जब किसी जातक के जीवन में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या क्रूर गोचर का कालखंड आता है तो वह इस जाग्रत महाक्षेत्र की शरण ग्रहण करता है।

  • यहाँ महादेव साक्षात कुश की घास के आसन पर दरबारन्येश्वरर के रूप में विराजमान हैं जो कर्मायन के कठोर अधिपति हैं।
  • ऐसी दृढ़ मान्यता है कि यहाँ श्रद्धापूर्वक दर्शन करने से मनुष्य के संचित क्रूर कर्मों का संताप पूरी तरह से भस्म हो जाता है और उसे शनि देव के दंड से मुक्ति मिलती है।
  • इस पावन परिसर में प्रवेश करने से पूर्व प्रत्येक श्रद्धालु को नल तीर्थम नामक पवित्र सरोवर में डुबकी लगानी अनिवार्य होती है।
  • यह जलीय स्नान जातक के आभामंडल से राहु और शनि की नकारात्मक रश्मियों को पूरी तरह धो देता है जिससे चेतना शुद्ध स्वर्ण की भांति चमकने लगती है।

राहु देव का मायावी भ्रम और थिरुनागेश्वरम का नागनाथस्वामी मंदिर

आकांक्षा, अचानक मिलने वाली अद्भुत सफलता, भयंकर अवरोध, मायावी भ्रम और तंत्र शास्त्र के स्वामी राहु देव की शांति के लिए थिरुनागेश्वरम का नागनाथस्वामी मंदिर अत्यंत विस्मयकारी है। इस जाग्रत राहु स्थल पर होने वाला दुग्धाभिषेक संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड के कौतूहल का एक अत्यंत प्रखर विषय है।

इस अलौकिक अनुष्ठान के दौरान जब राहु देव के विग्रह पर श्वेत गाय का दूध अर्पित किया जाता है तो वह दूध उनके शरीर से नीचे प्रवाहित होते समय स्वतः ही नीले रंग में रूपांतरित हो जाता है। इस विस्मयकारी घटनाक्रम के साक्षी प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु बनते हैं जो जल तत्व पर खगोलीय ऊर्जा के साक्षात प्रभाव को प्रदर्शित करता है। जो जातक कुंडली के सबसे भयानक कालसर्प दोष, अज्ञात मतिभ्रम, अचानक होने वाली व्यापारिक हानि या संशयों के चक्रव्यूह से पीड़ित हैं वे यहाँ आकर विशेष पूजा संपन्न करते हैं जिससे राहु का विषैला प्रभाव पूरी तरह शांत हो जाता है।

केतु देव का वैराग्य और कीजपेरुम्पल्लम का नागनाथस्वामी क्षेत्र

वैदिक दर्शन के अनुसार केतु को साक्षात अध्यात्म, इंद्रिय जनित बंधनों से मुक्ति, सूक्ष्म अंतःप्रेरणा और पूर्व जन्मों के संचित कर्माशय का मुख्य संवाहक माना गया है। मयिलादुथुरै के कीजपेरुम्पल्लम में स्थित यह पावन मंदिर साक्षात केतु देव की दिव्य रश्मियों को पृथ्वी के केंद्र के साथ संरेखित करता है।

यहाँ आने वाले श्रद्धालु अपने पितृ दोषों, पुराने असाध्य रोगों, अचानक आने वाले संतापों और आत्मिक अवरोधों से मुक्ति पाने के लिए केतु देव के सम्मुख काले तिलों का दान करते हैं, घी के दीप प्रज्वलित करते हैं और सर्प देवताओं की सात्विक आराधना संपन्न करते हैं। केतु की यह सात्विक ऊर्जा मनुष्य के मस्तिष्क से बाहरी दिखावे की झूठी लालसा को पूरी तरह नष्ट करके उसे अंतर्मुखी बनाती है जिससे जीव साक्षात मोक्ष के पावन मार्ग पर अग्रसर होने की पात्रता प्राप्त कर लेता है।

FAQ

क्या इन नौ नवग्रह मंदिरों की यात्रा एक निश्चित क्रम में ही करनी आवश्यक है
हां वैदिक ज्योतिष के सिद्धांतों के अनुसार इन मंदिरों की यात्रा हमेशा सूर्य देव के मंदिर से प्रारंभ करके क्रमशः चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और अंत में राहु-केतु के मंदिरों पर ही समाप्त करनी चाहिए ताकि ऊर्जा का संतुलन बना रहे।

थिरुनागेश्वरम मंदिर में राहु देव पर चढ़ाया जाने वाला दूध नीला क्यों हो जाता है
यह एक अत्यंत अलौकिक और वैज्ञानिक रूप से रहस्यमयी घटना है जो राहु ग्रह की खगोलीय तरंगों और उस जाग्रत विग्रह के चुंबकीय क्षेत्र के मध्य होने वाले रासायनिक और आध्यात्मिक संरेखण को प्रदर्शित करती है।

शनि देव के थिरुनल्लर मंदिर में जाने से पूर्व नल तीर्थम में स्नान करना क्यों अनिवार्य है
नल तीर्थम का जल राजा नल की कथा से जुड़ा है। इसमें स्नान करने से मनुष्य के आभामंडल पर जमा हुआ राहु और शनि का नकारात्मक मैल पूरी तरह धूल जाता है जिससे मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा शरीर में सुगमता से प्रवेश कर पाती है।

क्या कुंडली में कालसर्प दोष होने पर दक्षिण भारत के इन मंदिरों की यात्रा फलदायी सिद्ध होती है
हां विशेष रूप से थिरुनागेश्वरम (राहु स्थल) और कीजपेरुम्पल्लम (केतु स्थल) के दर्शन करने से कुंडली का भयंकर से भयंकर कालसर्प दोष और राहु-केतु जनित मानसिक अवसाद पूरी तरह से शांत हो जाता है।

यदि कोई जातक शारीरिक रूप से वहां जाने में असमर्थ हो तो वह इसका पुण्य कैसे प्राप्त कर सकता है
यदि वहां जाना संभव न हो तो जातक घर पर ही इन नौ मंदिरों का मानसिक ध्यान करके, नवग्रह स्तोत्र का पाठ करके और बुधवार या शनिवार को हरी या काली वस्तुओं का गुप्त दान करके भी समतुल्य सात्विक फल प्राप्त कर सकता है।

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पं. अभिषेक शर्मा

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