By पं. सुव्रत शर्मा
जानिए श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार हमारे आत्मिक विकास और संबंधों के बदलने का वास्तविक आध्यात्मिक विज्ञान

सनातन धर्म की पावन वैचारिक चेतना और श्रीमद्भगवद्गीता के विशाल दर्शन में मानव जीवन के प्रत्येक मानसिक और संवेगात्मक द्वंद्व का अत्यंत सटीक समाधान मिलता है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय विन्यासों और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं का अंतिम लक्ष्य भी मनुष्य के मस्तिष्क को मोह, आसक्ति और सांसारिक संबंधों के चक्रव्यूह से मुक्त करना है। व्यावहारिक संसार में प्रत्येक व्यक्ति जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर इस अत्यंत पीड़ादायक परिस्थिति का सामना अवश्य करता है कि जब वह आत्मिक रूप से प्रगति करता है तो उसके अपने ही लोग उससे दूर होने लगते हैं। जो लोग कभी आपकी छोटी-छोटी सफलताओं पर तालियाँ बजाते थे वही अचानक आपकी ऊँची उड़ान को देखकर असहज होने लगते हैं और दूरी बना लेते हैं। यह कष्ट अत्यंत व्यक्तिगत प्रतीत होता है परंतु वास्तव में यह जीवात्मा के क्रमिक विकास का एक सार्वभौमिक नियम है जिससे महाभारत के महानायक अर्जुन को भी गुजरना पड़ा था। श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक पवित्र आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है बल्कि यह तो संबंधों के टूटने से उत्पन्न होने वाले अवसाद के क्षणों में मन को स्थिरता प्रदान करने वाला एक दिव्य मार्गदर्शक है। योगेश्वर श्री कृष्ण इस परम सत्य को भलीभांति जानते थे कि जब मनुष्य अपने स्वधर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है तो उसे अपनी पुरानी आसक्तियों और संबंधों की आहुति देनी ही पड़ती है।
इस पावन प्रसंग के आध्यात्मिक महत्व और मानवीय चेतना के रूपांतरण को गहराई से समझने के लिए गीता के इन मुख्य सूत्रों का अवलोकन करना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में आत्मिक विकास के विभिन्न चरणों और उनके सूक्ष्म ज्योतिषीय प्रभावों का एक स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जो चेतना के इस स्तर को पूरी तरह स्पष्ट करता है।
| आत्मिक विकास के मुख्य चरण | सूक्ष्म दार्शनिक स्वरूप | ज्योतिषीय एवं आत्मिक संबंध |
|---|---|---|
| चेतना का ऊर्ध्वगमन | पुरानी आदतों और कोलाहल का स्वतः परित्याग | चंद्रमा की चंचलता पर सूर्य के आत्मबल का नियंत्रण |
| कड़े नैतिक सीमाओं का निर्माण | व्यक्तिगत मर्यादा और स्वधर्म की स्थापना | शनि देव के कठोर अनुशासन द्वारा चित्त की स्थिरता |
| आसक्ति रहित अनासक्ति योग | बिना किसी द्वेष के संबंधों से मूक दूरी | केतु के माध्यम से अंतर्मुखी चेतना और वैराग्य |
| एकांत जनित मानसिक शून्यता | झूठे मुखौटों का विसर्जन और आत्म-साक्षात्कार | राहु के भ्रम का नाश और आंतरिक आरोग्यता |
| स्वधर्म के मार्ग पर निरंतर अग्रसर | कर्म को ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण | देवगुरु बृहस्पति के परम विवेक और ज्ञान का उदय |
जब मनुष्य के भीतर सात्विक गुणों का उदय होने लगता है तो सबसे बड़ा संकट यह उत्पन्न होता है कि उसके पुराने साथी उसके इस मानसिक रूपांतरण को एक प्रकार का विश्वासघात समझने लगते हैं। परंतु वास्तविकता यह होती है कि उस जीव ने किसी के साथ कोई छल नहीं किया है बल्कि उसने केवल अपनी चेतना को एक उच्च धरातल पर उन्नत किया है। वह व्यक्ति अब व्यर्थ की गपशप में भाग नहीं लेता, संवेगात्मक नाटकों से दूर रहता है और संसार के कोलाहल के स्थान पर अंतर्मन के महामौन को प्राथमिकता देने लगता है।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को भी इसी भयंकर वैचारिक युद्ध का सामना करना पड़ा था जहां सामने कोई बाहरी शत्रु नहीं बल्कि उनके अपने ही गुरु, पितामह और भाई खड़े थे। जैसे ही अर्जुन ने अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य और क्षत्रिय धर्म को समझा उन्हें अपनों की इस आसक्ति से अलग होकर पूरी सुदृढ़ता के साथ खड़ा होना पड़ा। गीता के चौथे अध्याय के सैंतालीसवें श्लोक में श्री कृष्ण कहते हैं कि ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा अर्थात ज्ञान की प्रखर अग्नि समस्त पुराने कर्मों और निरर्थक बंधनों को जलाकर भस्म कर देती है। आपका यह आत्मिक विकास उन सभी पुरानी आसक्तियों को स्वतः ही नष्ट कर देता है जो आपकी आत्मा के मूल उद्देश्य के अनुकूल नहीं होती हैं।
लौकिक संसार का यह एक अत्यंत कड़वा नियम है कि लोग अक्सर आपके वास्तविक स्वरूप से नहीं बल्कि आपके उस रूप से प्रेम करते हैं जो उनके अपने अहंकार और सुख को संतुष्ट करता है। वे आपके उस रूप को पसंद करते थे जो कभी किसी बात के लिए मना नहीं करता था, जो सदा मूक बना रहता था और समाज की संकीर्ण कुरीतियों पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठाता था।
ज्योतिष शास्त्र में भी जब सूर्य का आत्मतेज जाग्रत होता है तो मनुष्य के भीतर इसी नैतिक साहस का जन्म होता है जो उसे सत्य के मार्ग पर अकेले चलने की शक्ति प्रदान करता है।
आधुनिक समाज के विचारक अक्सर संबंधों में कड़वाहट आने पर उन्हें बलपूर्वक काटने या मन में ईर्ष्या पालने की अपरिपक्व सलाह देते हैं परंतु श्रीमद्भगवद्गीता का दर्शन इससे कहीं अधिक गहरा और करुणा से पूर्ण है। श्री कृष्ण अर्जुन को अपने सगे-संबंधियों के प्रति मन में घृणा या क्रोध उत्पन्न करने की शिक्षा नहीं देते हैं बल्कि वे अत्यंत आदर के साथ अनासक्ति योग का पालन करना सिखाते हैं।
अर्जुन के मन में विपरीत पक्ष में खड़े अपने प्रियजनों के प्रति कोई द्वेष नहीं था परंतु फिर भी उन्होंने अपने गांडीव धनुष को उठाया क्योंकि उनका उद्देश्य किसी से प्रतिशोध लेना नहीं बल्कि धर्म की स्थापना करना था। गीता के दूसरे अध्याय के पंद्रहवें श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते अर्थात जो धीर पुरुष सुख और दुख में पूरी तरह स्थिर रहता है और इन सांसारिक थपेड़ों से कभी व्याकुल नहीं होता वही परम मोक्ष का साक्षात अधिकारी बनता है। आपको संसार से किसी प्रशंसा की आवश्यकता नहीं है बल्कि आपको केवल अपने धर्म के मार्ग पर अत्यंत शांति और गरिमा के साथ मूक रूप से आगे बढ़ जाना चाहिए।
चेतना के ऊर्ध्वगमन के मार्ग पर जो सबसे भयावह क्षण आता है वह बाहरी परिवर्तन नहीं है बल्कि वह तो उस अलगाव के बाद उत्पन्न होने वाली अंतर्मन की गहरी नीरवता और एकांत है। इस पड़ाव पर पहुँचकर पुराने मित्र छूट जाते हैं, परिचितों का समाज बिखर जाता है और मनुष्य कई बार स्वयं अपने ही निर्णयों पर संदेह करने लगता है।
परंतु श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के चालिसवें श्लोक में योगेश्वर श्री कृष्ण अर्जुन को साक्षात अभय दान देते हुए कहते हैं कि न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति अर्थात आत्म-साक्षात्कार और कल्याण के मार्ग पर चलने वाले किसी भी जीव का कभी भी विनाश नहीं हो सकता है। पृथकता के बाद जो महामौन घटित होता है उसी नीरवता के भीतर मनुष्य पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप और परम सत्य से साक्षात साक्षात्कार करता है। तब उसे इस बात का पूर्ण बोध होता है कि संसार का प्रत्येक जीव उसकी इस आत्मिक यात्रा का सहयात्री बनने की पात्रता नहीं रखता था क्योंकि प्रत्येक आत्मा का कर्मायन और उसकी गति सर्वथा भिन्न होती है।
जब-जब आप अपने जीवन में सत्य का पक्ष लेते हैं, अपनी आत्मा की आवाज को सुनते हैं और अधर्म के सामने पूरी दृढ़ता के साथ नहीं कहते हैं तो वह कोई आपका व्यक्तिगत अहंकार नहीं होता है बल्कि वह तो आपके भीतर बैठे साक्षात नारायण का आदर होता है।
यदि आपको कभी यह प्रतीत हो कि आपके भीतर की सात्विक ऊर्जा और ज्ञान का प्रकाश दूसरों को असहज कर रहा है तो उस भय के कारण अपने आत्मतेज को कभी भी मंद मत कीजिए। श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य को समाज के खोखले सांचे में ढलने के लिए स्वयं को छोटा या निर्बल बनाने की शिक्षा कभी नहीं देती है बल्कि वह तो अपनी आत्मा के परम सत्य के प्रति वफादार रहने की प्रेरणा प्रदान करती है।
वे आपसे प्रेम तब तक ही करते थे जब तक आप उनकी संकीर्ण सीमाओं के भीतर बंधे हुए थे और जैसे ही आपने गगन की ओर उड़ान भरी वे आपसे दूर हो गए। योगेश्वर इस कड़वे सत्य को भलीभांति जानते थे और इसीलिए उन्होंने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में शस्त्र उठाने की आज्ञा दी थी। उनका यही अमर संदेश आज के युग के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है कि चाहे संपूर्ण संसार आपके विपरीत खड़ा हो जाए परंतु अपनी आत्मा के गौरव को अक्षुण्ण रखते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहिए क्योंकि अंततः विजय केवल धर्म और सत्य की ही सुनिश्चित होती है।
गीता के अनुसार जब अपने लोग हमारे आत्मिक विकास का विरोध करें तो क्या करना चाहिए
गीता के अनुसार ऐसी परिस्थिति में मन में किसी प्रकार का द्वेष या क्रोध पालने के स्थान पर अनासक्ति योग का आश्रय लेना चाहिए और दूसरों को प्रसन्न करने के बजाए केवल अपने स्वधर्म का पालन करना चाहिए।
क्या संबंधों का छूटना पूरी तरह से हमारे पूर्व संचित कर्मों से निर्धारित होता है
हां वैदिक ज्योतिष के अनुसार जातक की कुंडली में जब केतु की दशा या शनि देव का शोधन काल आता है तो जीवन से वे सभी निरर्थक संबंध स्वतः ही दूर हो जाते हैं जो आत्मा के विकास में बाधा बन रहे होते हैं।
मनुष्य के भीतर सीमाओं का निर्माण करने की शक्ति किस ग्रह से प्राप्त होती है कुंडली में जब सूर्य का आत्मबल सुदृढ़ होता है और शनि देव का न्यायप्रिय अनुशासन जाग्रत होता है तब मनुष्य के भीतर बिना किसी झिझक के असत्य को नहीं कहने का नैतिक साहस और आत्मिक नियमन का जन्म होता है।
अनासक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है क्या इसका तात्पर्य संसार को पूरी तरह छोड़ देना है
बिल्कुल नहीं अनासक्ति का अर्थ अकर्मण्य होना या वन में चले जाना नहीं है बल्कि इसका सूक्ष्म तात्पर्य यह है कि संसार के भीतर रहकर अपने सभी कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाना परंतु उनके परिणाम और प्रशंसा के प्रति उदासीन रहना।
इस कथा से आज के मानसिक तनाव से जूझ रहे युवाओं को क्या व्यावहारिक सीख मिलती है
इससे यह व्यावहारिक सीख मिलती है कि दूसरों से निरंतर प्रशंसा पाने की लालसा ही मानसिक तनाव की मूल जड़ है। जब युवा अपनी तुलना दूसरों से करना बंद करके अपने आंतरिक गुणों को विकसित करते हैं तो उन्हें परम शांति प्राप्त होती है।
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