ब्रह्मा जी की पूजा क्यों नहीं होती है

By पं. अमिताभ शर्मा

जानिए सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के मंदिर निषेध और इसके पीछे छिपे ज्योतिषीय रहस्यों का पूर्ण सत्य

ब्रह्मा जी की पूजा क्यों नहीं होती जानिए रहस्य पंचांग

सनातन धर्म के समृद्ध इतिहास और वैदिक दर्शन के पावन वांग्मय में त्रिदेवों का स्थान सर्वोपरि माना गया है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय योगों और आध्यात्मिक साधनाओं में सृष्टि की संरचना, पालन और संहार के त्रिकोण को स्वीकार किया गया है। जब भी सृष्टि के प्रारंभ की चर्चा होती है तो ब्रह्मा जी का नाम परम आदर के साथ लिया जाता है। वे त्रिदेवों में प्रथम हैं जो सृष्टि के रचयिता हैं जबकि भगवान विष्णु पालनकर्ता और देवों के देव महादेव संहारक के रूप में पूजे जाते हैं। परंतु एक अत्यंत गूढ़ और विस्मयकारी प्रश्न सदियों से प्रत्येक जिज्ञासु के मन में कौंधता रहता है कि जहाँ भगवान विष्णु और शिव के संपूर्ण विश्व में करोड़ों मंदिर हैं अनेक उत्सव हैं और अनन्य भक्त हैं वहीं ब्रह्मा जी का पूजन लगभग मौन क्यों है। पूरे भारतवर्ष में उनके केवल गिने चुने मंदिर ही विद्यमान हैं जिनमें राजस्थान का पुष्कर तीर्थ सबसे प्रमुख माना जाता है। इसके बावजूद प्रत्येक हिंदू जाने अनजाने में अपनी दैनिक प्रार्थनाओं में, कथाओं में और किसी भी नए कार्य के प्रारंभ में उनका स्मरण अवश्य करता है। इस अलौकिक रहस्य के पीछे छिपा हुआ कर्मायन का सिद्धांत और ज्योतिषीय दृष्टिकोण अत्यंत गहरा है जिसे समझे बिना सृष्टि के गूढ़ नियमों को जानना सर्वथा असंभव है।

इस पावन विषय के अंतर्गत छिपे हुए आध्यात्मिक रहस्यों और ज्योतिषीय काल चक्र को गहराई से समझने के लिए ब्रह्मा जी के इस स्वरूप के मुख्य आयामों को देखना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में सृष्टिकर्ता के इस विशिष्ट संदर्भ का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

मुख्य वैदिक तत्व सूक्ष्म आध्यात्मिक स्वरूप ज्योतिषीय और आत्मिक प्रभाव
सृष्टि का आरंभ ब्रह्मांडीय चेतना का प्रकटीकरण सूर्य देव की आत्मा और रचनात्मक ऊर्जा का केंद्र
पुष्कर तीर्थ पृथ्वी पर एकमात्र मुख्य भौतिक धाम चंद्रमा की रसात्मकता और जल तत्व का संतुलन
वेदों का प्राकट्य ज्ञान और विवेक की सर्वोच्च संहिताओं का दान बृहस्पति का दिव्य ज्ञान और बुद्धि का प्रकर्ष
पूजा का निषेध अहंकार के विसर्जन का वैश्विक नियम केतु की शरणागति और भौतिक आसक्ति से मुक्ति

सृष्टिकर्ता का कार्य प्रारंभ होते ही समाप्त हो जाता है

वैदिक दर्शन के अनुसार सृष्टि, पालन और संहार ये तीन ऐसी सनातन शक्तियां हैं जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करती हैं। ब्रह्मा जी का मुख्य उत्तरदायित्व इस सृष्टि चक्र को गति प्रदान करना है। जैसे ही जीवन का प्रवाह इस पृथ्वी पर आरंभ होता है ब्रह्मांडीय व्यवस्था में उनका प्राथमिक कार्य पूरी तरह से संपन्न हो जाता है।

  • भगवान विष्णु उस निर्मित संसार का निरंतर पालन पोषण और संरक्षण करते हैं।
  • महादेव समय पूरा होने पर उस सृष्टि को पुनः अपनी परम शांति में विलीन कर लेते हैं।
  • मानवीय स्वभाव के अनुसार मनुष्य सदैव उन शक्तियों की आराधना की ओर आकर्षित होता है जो उसके दैनिक जीवन में सक्रिय रूप से जुड़ी होती हैं।
  • लोग उनकी पूजा करते हैं जो रक्षा करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और संकटों में मार्गदर्शन करते हैं।

ब्रह्मा जी की भूमिका उस दिव्य स्फुलिंग की भांति है जो केवल अग्नि को प्रज्वलित करता है न कि स्वयं ज्वाला बनकर निरंतर जलता है। उनका कार्य जीवन की कहानी के पूरी तरह खुलने से पहले ही समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि भौतिक धरातल पर उनके मंदिरों की संख्या अत्यंत न्यून है परंतु आंतरिक चेतना में उनका स्मरण शाश्वत और अमर बना रहता है।

वह अमोघ श्राप जिसने सृष्टिकर्ता को मौन में अमर कर दिया

प्राचीन पौराणिक ग्रंथों और संहिताओं में ऐसी अनेक कथाएं आती हैं जो यह स्पष्ट करती हैं कि ब्रह्मा जी को पृथ्वी पर व्यापक रूप से न पूजे जाने का श्राप मिला था। एक प्रमुख प्रसंग के अनुसार जब भगवान शिव ने अपनी सर्वोपरिता को सिद्ध करने के लिए एक विशाल ज्योतिर्लिंग का रूप धारण किया था तब ब्रह्मा जी ने उसके ऊपरी छोर को खोज लेने का एक मिथ्या दावा किया था जिससे क्रोधित होकर महादेव ने उन्हें इस लोक में अप्रशंसित रहने का श्राप दे दिया था।

यह कथाएं केवल किसी सामान्य दंड की कहानियां नहीं हैं बल्कि इनके भीतर छुपा हुआ आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गंभीर है। यह संपूर्ण चराचर जगत को यह शिक्षा प्रदान करता है कि रचना की शक्ति तभी तक दिव्य और पवित्र है जब तक वह व्यक्तिगत अहंकार से पूरी तरह मुक्त रहे। यह श्राप वास्तव में एक प्रतीकात्मक विधान है जो यह सिखाता है कि यदि मनुष्य अपनी रचनात्मकता पर घमंड करने लगे तो वह अपनी शक्तियों के मूल स्रोत को भूल जाता है। सनातन संस्कृति में इसी कारण ब्रह्मा जी के सृजन कार्य का आदर तो किया जाता है परंतु उन्हें व्यक्तिगत आसक्ति या भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति का माध्यम नहीं बनाया जाता है। उनका यह मौन ही उनकी वास्तविक अमरता का सूचक है।

इच्छाओं की पूर्ति के नहीं बल्कि साक्षात परम ज्ञान के देवता

बजरांगबली की भांति ही ब्रह्मा जी को भी वेदों का परम दाता माना गया है जो मनुष्यों की भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के बजाय उन्हें आत्मज्ञान और विवेक प्रदान करते हैं। मुंडक उपनिषद में यह सविस्तार वर्णित है कि किस प्रकार ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि के कल्याण के लिए ब्रह्मविद्या का दिव्य उपदेश मनुष्यों को दिया था।

  • ज्ञान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे केवल बाहरी कर्मकांडों या धूप दीप के माध्यम से पूजा जा सके।
  • ज्ञान तो वह तत्व है जिसे जीवन में जिया जाता है, जिसका निरंतर अध्ययन किया जाता है और जिसका साक्षात्कार किया जाता है।
  • जब भी कोई विद्यार्थी पूर्ण एकाग्रता के साथ विद्या ग्रहण करता है तो वह क्षण स्वतः ही ब्रह्मा जी की पूजा बन जाता है।
  • जब कोई साधक एकांत में बैठकर सत्य का अन्वेषण करता है तो उसका वह चिंतन ही सृष्टिकर्ता के चरणों में एक पवित्र अर्पण होता है।

उनकी वास्तविक उपासना कर्मकांडों के कोलाहल में नहीं बल्कि मानवीय चेतना की जागरूकता और आत्मिक बोध में समाहित होती है। ज्योतिष शास्त्र में भी बृहस्पति ग्रह का जो परम विवेक है वह इसी ज्ञान तत्व से पोषित होता है।

वैदिक काल से पौराणिक काल तक अनुष्ठानों में आया सूक्ष्म परिवर्तन

यदि हम इतिहास के झरोखे से देखें तो वैदिक काल में ब्रह्मा जी को प्रजापति के रूप में केंद्रीय स्थान प्राप्त था और प्रत्येक बड़े यज्ञ तथा आहुति में उनका आहान अनिवार्य माना जाता था। परंतु जैसे जैसे समय का चक्र आगे बढ़ा सनातन परंपरा में भक्ति मार्ग का प्राकट्य हुआ जो अधिक व्यक्तिगत और भावनात्मक था।

भगवान विष्णु और शिव के रूप में ऐसे दिव्य चरित्र सामने आए जो मनुष्यों के सुख दुख में सहभागी बनते थे, जो प्रेम करते थे, रक्षा करते थे और क्षमा दान देते थे। उनके अवतारों की लीलाएं मानवीय जीवन का एक साक्षात दर्पण बन गईं जिससे जनमानस का उनसे एक अत्यंत गहरा भावनात्मक जुड़ाव स्थापित हो गया। इसके विपरीत ब्रह्मा जी सृजन के एक अत्यंत अमूर्त और दार्शनिक सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते रहे जो सामान्य लौकिक बुद्धि की समझ से थोड़ा परे था। जैसे ही धर्म का झुकाव व्यक्तिगत श्रद्धा और कहानियों की ओर बढ़ा ब्रह्मा जी का स्वरूप बाह्य कर्मकांडों की दृश्य भूमि से धीरे धीरे ओझल हो गया। परंतु आज भी प्रत्येक वैदिक मंत्र में, यज्ञ की अग्नि में और इस विश्वास में कि हर नया प्रारंभ पवित्र है उनकी उपस्थिति उतनी ही सुदृढ़ बनी हुई है।

ब्रह्मा और ब्रह्म सृष्टिकर्ता और परम सत्य का सूक्ष्म भेद

भारतीय दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों में सृष्टिकर्ता देवता ब्रह्मा और सर्वव्यापी परम तत्व ब्रह्म के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण भेद किया गया है। ब्रह्मा जी दृश्य और भौतिक ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं जबकि ब्रह्म वह अदृश्य, अविनाशी और नित्य तत्व है जो इस पूरी सृष्टि के कण कण में व्याप्त है।

सदियों के वैचारिक उद्वेलन के पश्चात सनातन संतों और साधकों का ध्यान बाहरी सृष्टिकर्ता की पूजा करने के स्थान पर अपने भीतर बैठे उस परम ब्रह्म का साक्षात्कार करने की ओर अधिक केंद्रित हुआ। भौतिक मंदिरों के निर्माण की तुलना में अंतर्मुखी होकर ध्यान लगाने की पद्धति को अधिक महत्व दिया जाने लगा। आस्था की यह यात्रा मूर्ति से विचार की ओर और बाहर से भीतर की ओर मुड़ गई। इस प्रकार यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो ब्रह्मा जी की पूजा कभी समाप्त नहीं हुई बल्कि उसने केवल अपनी दिशा बदल ली। वह बाहरी पत्थरों के घेरे से निकलकर मनुष्य की आंतरिक चेतना में समाहित हो गई जहां संपूर्ण सृष्टि को ही ईश्वर का रूप माना जाता है।

वह सृष्टिकर्ता जिसके मंदिर संपूर्ण ब्रह्मांड में बिखरे हैं

यद्यपि भौतिक रूप से ब्रह्मा जी के स्वतंत्र मंदिर अत्यंत विरल हैं परंतु वास्तव में प्रत्येक मंदिर के अनुष्ठान में उनकी उपस्थिति अनिवार्य रूप से विद्यमान होती है। जब भी किसी नए मंदिर का निर्माण होता है या मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है तो पुरोहित सबसे पहले ब्रह्मा जी का आहान उस दिव्य वास्तुकार के रूप में करते हैं जो इस पूरे ब्रह्मांड की रूपरेखा तैयार करता है।

  • चाहे वह मंदिर भगवान विष्णु का हो, शिव का हो या साक्षात आदि शक्ति माता दुर्गा का हो, पूजा के प्रारंभ में ब्रह्मा जी का नाम लेना अनिवार्य है।
  • इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस पृथ्वी का प्रत्येक मंदिर ही उनका मंदिर बन जाता है और प्रत्येक प्रार्थना उनका स्मरण बन जाती है।
  • ब्रह्मा जी के चारों ओर जो यह गहरी नीरवता और शांति दिखाई देती है वह कोई शून्यता नहीं है बल्कि वह तो चेतना का सबसे शुद्ध और प्रखर स्वरूप है।
  • उनके मंदिर भले ही पत्थरों के ऊंचे शिखरों के रूप में दिखाई न दें परंतु वे प्रत्येक पवित्र कृत्य के प्रारंभ में स्वतः ही निर्मित हो जाते हैं।

ज्योतिषीय गणना में भी जब हम किसी नए भवन का निर्माण करते हैं तो वास्तु पुरुष के साथ ब्रह्मा जी के केंद्र स्थान अर्थात ब्रह्मस्थान का विशेष ध्यान रखा जाता है जो घर की सुख शांति की धुरी होता है।

प्रत्येक जीव के भीतर अनवरत प्रवाहित होने वाली सृजन शक्ति

ब्रह्मा जी की यह पावन गाथा किसी अनुपस्थिति या विस्मृति की कहानी नहीं है बल्कि यह तो ऊर्जा के निरंतर रूपांतरण का साक्षात सत्य है। वे इस संसार में हर उस स्थान पर जीवित हैं जहां कोई नया विचार जन्म लेता है, कोई कला आकार लेती है, कोई नई खोज होती है या कोई नया अविष्कार संपन्न होता है।

जब भी कोई कवि अपनी लेखनी से किसी सुंदर काव्य की रचना करता है, जब कोई वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में किसी नए सिद्धांत की कल्पना करता है या जब कोई छोटा बच्चा अपनी आंखों में नए सपने संजोता है तो वहां ब्रह्मा जी की सृजनात्मक ऊर्जा का ही प्रवाह हो रहा होता है शास्त्रों का यह स्पष्ट मत है कि निस्वार्थ भाव से किसी नई और कल्याणकारी वस्तु का निर्माण करना ही ब्रह्मा जी की सबसे सच्ची और वास्तविक उपासना है। विचारों, सुंदरता और करुणा को जन्म देना ही सृजन के उस दिव्य स्फुलिंग का आदर करना है। यही कारण है कि आज भी हिंदू समाज उनके नाम को विस्मृत नहीं कर सका है। वह कोलाहल में नहीं बल्कि जीवन की अत्यंत शांत लय में, प्रत्येक नई सुबह की पहली किरण में और सृजन के प्रत्येक पवित्र कृत्य में उनके नाम को अत्यंत आदर के साथ स्मरण करता है।

FAQ

ब्रह्मा जी का सबसे प्रमुख मंदिर पुष्कर में ही क्यों स्थित है
पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर यज्ञ के लिए स्थान का चयन करने हेतु अपने हाथ से एक कमल का पुष्प गिराया था जो पुष्कर में गिरा था इसी कारण वहां उनका सबसे पवित्र और मुख्य मंदिर स्थापित है।

क्या ब्रह्मा जी के दसों सिर थे और उनके चार मुख का क्या रहस्य है
नहीं ब्रह्मा जी के दसों सिर नहीं थे बल्कि उनके चार मुख हैं जो चरों दिशाओं अर्थात पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और सामूहिक रूप से चारों वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के साक्षात प्रतीक हैं।

ज्योतिष शास्त्र में ब्रह्मा जी का संबंध किस भाव और ग्रह से माना जाता है
ज्योतिष में ब्रह्मा जी का संबंध कुंडली के लग्न भाव अर्थात आत्मिक उत्पत्ति से है और ग्रहों में उन्हें परम विवेक के स्वामी बृहस्पति और आत्मा के कारक सूर्य देव की सकारात्मक ऊर्जा से संबद्ध माना जाता है।

ब्रह्मा और परम ब्रह्म के बीच का मुख्य अंतर क्या है
ब्रह्मा जी एक विशिष्ट देवता हैं जो रजोगुण के माध्यम से इस भौतिक सृष्टि का निर्माण करते हैं जबकि परम ब्रह्म वह निराकार, अजन्मा और अनंत तत्व है जो पूरी सृष्टि का मूल आधार है।

किसी नए घर के निर्माण में ब्रह्मा जी की पूजा का क्या महत्व है
भवन निर्माण के समय भूखंड के ठीक केंद्र भाग को ब्रह्मस्थान माना जाता है जहां ब्रह्मा जी का वास होता है इसकी पूजा करने से घर के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और वास्तु दोष दूर होते हैं।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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