By पं. अमिताभ शर्मा
जानिए नटराज स्वरूप और अज्ञान के प्रतीक असुर अपस्मार

सनातन धर्म की पावन वैचारिक चेतना और वैदिक दर्शन के विशाल वांग्मय में भगवान शिव के नटराज स्वरूप और उनके द्वारा असुर अपस्मार के दमन की कथा एक अत्यंत अलौकिक और विस्मयकारी विज्ञान है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय विन्यासों और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं का अंतिम लक्ष्य भी इसी अज्ञान रूपी असुर को नियंत्रित करके उस परम सत्य का साक्षात्कार करना है जो अपरिवर्तनीय है। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब मनुष्य की आंतरिक असुरक्षा या अज्ञान सबके सामने प्रकट हो जाता है तो उसका क्रोध सबसे तीव्र गति से बढ़ता है। ऐसा तब नहीं होता जब कोई आपका सामान्य अपमान करता है बल्कि तब होता है जब कोई आपके द्वारा निर्मित झूठी पहचान या झूठे ज्ञान को चुपके से चुनौती देता है। हजारों वर्ष पूर्व दारुक वन के अत्यंत रहस्यमयी वातावरण में भी एक ऐसा ही प्रसंग घटित हुआ था। अपनी प्रखर बुद्धि और तपस्या के घमंड में चूर कुछ महान ऋषियों को यह विश्वास हो गया था कि उन्हें अब ईश्वर विवेक या किसी भी प्रकार के आत्मिक विकास की कोई आवश्यकता नहीं है। तब इस चराचर ब्रह्मांड ने उनके इस प्रचंड अहंकार का उत्तर एक अत्यंत अप्रत्याशित और अलौकिक रूप में प्रदान किया। भगवान विष्णु परम सम्मोहक मोहिनी रूप में प्रकट हुए जबकि भगवान शिव एक दिगंबर भिक्षुक भिक्षाटन के रूप में वहां उपस्थित हुए। उस वन में जो कुछ भी घटित हुआ उसने मानवीय अहंकार और अज्ञान की परिभाषा को सदा के लिए बदल दिया।
इस पावन प्रसंग के अंतर्गत छिपे हुए गहरे दार्शनिक रहस्यों, ज्योतिषीय तत्वों और कर्मायन के सिद्धांतों को भलीभांति समझने के लिए दारुक वन के इस अलौकिक घटनाक्रम के मुख्य आयामों को देखना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में इस महालीला के मुख्य आध्यात्मिक तत्वों और उनके सूक्ष्म आत्मिक प्रभावों का एक स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
| महालीला के मुख्य घटक | सूक्ष्म आध्यात्मिक स्वरूप | ज्योतिषीय एवं आत्मिक संबंध |
|---|---|---|
| भिक्षुक भिक्षाटन रूप | पूर्ण शून्यता और परम अनासक्ति | शनि देव का कठोर वैराग्य और भौतिक विसर्जन |
| सम्मोहक मोहिनी रूप | माया, आकर्षण और लौकिक सौंदर्य | शुक्र जनित सांसारिक सुख और भ्रम का प्रसार |
| असुर अपस्मार | अज्ञान, मतिभ्रम और आध्यात्मिक अंधकार | राहु का तीव्रतम मायावी प्रभाव और बुद्धि का नाश |
| नटराज का पावन चरण | चेतना द्वारा अज्ञान को नियंत्रित रखना | केतु के माध्यम से विवेक की जाग्रति और मोक्ष |
| डमरू और अग्नि नाद | सृष्टि का सृजन और संहार चक्र | बुध का बौद्धिक वेग और सूर्य का आत्मतेज |
दारुक वन में निवास करने वाले ऋषि अत्यंत वेदों के ज्ञाता, प्रखर बुद्धिजीवी और महान तपोबल से युक्त थे। परंतु जैसे जैसे समय का चक्र आगे बढ़ा उनका वह पावन ज्ञान धीरे धीरे एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरे अहंकार में परिवर्तित हो गया। उन्हें यह पूर्ण विश्वास हो गया कि वे इस ब्रह्मांड के प्रत्येक सत्य को पहले से ही जानते हैं और अब उन्हें किसी भी प्रकार की भक्ति, विनम्रता या स्वयं ईश्वर की भी कोई आवश्यकता नहीं है। यहीं से उनके आत्मिक पतन का वास्तविक प्रारंभ हुआ। जब ज्ञान के साथ विनम्रता और खुलापन समाप्त हो जाता है तो वह ज्ञान साक्षात अहंकार का रूप धारण कर लेता है। वे अपनी ही बौद्धिक श्रेष्ठता के संकीर्ण पिंजरे के भीतर पूरी तरह से कैद हो गए।
यह प्राचीन कथा आज के आधुनिक समाज के लिए भी एक अत्यंत सटीक दर्पण की भांति कार्य करती है क्योंकि आज का मनुष्य भी सूचनाओं के अंबार को ही वास्तविक ज्ञान समझने की बहुत बड़ी भूल कर बैठता है। जिस क्षण मनुष्य के भीतर सीखने की ललक समाप्त हो जाती है उसी क्षण उसकी आंतरिक असुरक्षा चुपके से उसके झूठे आत्मविश्वास और घमंड के पीछे छिपना आरंभ कर देती है।
ऋषियों के इस गहरे मतिभ्रम और अज्ञान के परदे को छिन्न भिन्न करने के लिए इस ब्रह्मांड ने दारुक वन में दो सर्वथा विपरीत और शक्तिशाली ऊर्जाओं को एक साथ प्रवाहित किया। भगवान विष्णु ने साक्षात मोहिनी का रूप धारण किया जो अत्यंत तीव्र लौकिक आकर्षण, सौंदर्य और भौतिक कामनाओं का साक्षात प्रतीक थीं। दूसरी ओर भगवान शिव एक ऐसे भिक्षुक भिक्षाटन के रूप में प्रकट हुए जिनके पास भौतिक रूप से अर्पित करने के लिए कुछ भी नहीं था और जो पूर्ण शून्यता तथा परम अनासक्ति के साक्षात विग्रह थे। मोहिनी उस प्रत्येक वस्तु का प्रतिनिधित्व कर रही थीं जिसे यह संसार अपनी इंद्रियों से भोगना और प्राप्त करना चाहता है जबकि भिक्षाटन उस आंतरिक रिक्तता और शांति के संवाहक थे जो संसार के बंधनों से सर्वथा परे है।
वहां उपस्थित ऋषि मोहिनी के सौंदर्य को देखकर तत्क्षण सम्मोहित हो गए परंतु उन्हें सबसे अधिक मानसिक पीड़ा और अशांति तब हुई जब उन्होंने देखा कि उनकी अपनी पत्नियां भिक्षाटन की उस परम शांति और नीरवता की ओर स्वतः ही खिंची चली जा रही हैं। उस अलौकिक क्षण ने एक बहुत बड़े कड़वे सत्य को सबके सामने उजागर कर दिया कि आत्मा की आंतरिक शांति हमेशा किसी भी भौतिक धन, ऐश्वर्य या झूठे बौद्धिक घमंड से कहीं अधिक चुंबकीय और शक्तिशाली होती है।
दारुक वन के वे ऋषि उस समय तनिक भी क्रोधित नहीं हुए थे जब वे स्वयं मोहिनी के लौकिक आकर्षण के जाल में फंसकर अपनी मर्यादा को भूल रहे थे। उनका प्रचंड क्रोध तो तब भड़का जब उन्होंने देखा कि उनकी पत्नियां किसी ऐसी सत्ता का चुनाव कर रही हैं जो उनके संकीर्ण नियंत्रण और अधिकार क्षेत्र से सर्वथा बाहर है। यही वास्तव में मानवीय असुरक्षा की सबसे खतरनाक और विनाशकारी प्रकृति होती है। यह तब तक मन के किसी अंधेरे कोने में छुपी रहती है जब तक कि कोई तुलना या विपरीत परिस्थिति इसे जाग्रत नहीं कर देती है। अपनी पत्नियों को भिक्षाटन की उस शांत और गंभीर ऊर्जा की ओर आकर्षित होते देख वे ऋषि ईर्ष्या और द्वेष की अग्नि में पूरी तरह से जलने लगे।
अपने भीतर झांकने और स्वयं के अहंकार पर प्रश्न उठाने के स्थान पर उन्होंने उस परम शांति के स्रोत पर ही आक्रमण करने का एक अत्यंत आत्मघाती निर्णय ले लिया। उनका वर्षों का संचित ज्ञान उनके प्रचंड क्रोध और घमंड के नीचे पूरी तरह से दबकर नष्ट हो गया। इतिहास का यह पावन क्षण आज के आधुनिक जीवन को पूरी तरह से प्रतिबिंबित करता है क्योंकि मनुष्य आज भी सबसे अधिक हिंसक और आक्रामक तब होता है जब उसकी झूठी पहचान, उसकी महत्ता या उसकी बौद्धिक श्रेष्ठता को किसी भी प्रकार का कोई खतरा महसूस होता है।
क्रोध और प्रतिशोध की भावना से पूरी तरह अंधे होकर उन ऋषियों ने भिक्षाटन को समूल नष्ट करने के लिए घोर अभिचार कर्म, काली विद्या और नकारात्मक तांत्रिक अनुष्ठानों का आश्रय लिया। उन्होंने यज्ञ की वेदी से सबसे पहले एक अत्यंत भयंकर मायावी बाघ को प्रकट किया ताकि वह भिक्षुक का तत्क्षण वध कर सके। परंतु भगवान शिव ने अत्यंत शांत रहकर अपनी उंगली के एक साधारण नाखून से उस बाघ की त्वचा को अलग कर दिया और उसे अपने वस्त्र के रूप में सहर्ष धारण कर लिया। इसके पश्चात उन्होंने एक अत्यंत विषैला और भयानक सर्प भेजा परंतु शिव ने उसे अत्यंत प्रेमपूर्वक अपने कंठ का पवित्र आभूषण बना लिया।
यह अद्भुत प्रतीकवाद संपूर्ण चराचर जगत को यह महान शिक्षा प्रदान करता है कि जो आत्मा आध्यात्मिक रूप से पूरी तरह जाग्रत होती है वह बाहरी नकारात्मकताओं से कभी प्रभावित नहीं होती बल्कि उन्हें अपनी आंतरिक शक्ति में रूपांतरित कर लेती है।
जैसे ही असुर अपस्मार रणभूमि में गर्जना करते हुए प्रकट हुआ संपूर्ण दारुक वन में एक गहरा और विस्मयकारी सन्नाटा पसर गया। उसी क्षण उस दिगंबर भिक्षुक भिक्षाटन ने अपने वास्तविक विराट स्वरूप को प्रकट किया और वे साक्षात ब्रह्मांडीय नर्तक नटराज के रूप में वहां प्रतिष्ठित हो गए। उनकी बंद जटाएं आकाश मार्ग में पूरी तरह से खुल गईं जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड का निर्माण होता है, उनकी जटाओं से पतित पावनी गंगा की धाराएं फूट पड़ीं, चारों ओर नक्षत्र और तारे टिमटमाने लगे और उनकी दिव्य ऊर्जा से संपूर्ण दिशाएं आलोकित हो उठीं। भगवान शिव ने अपने दाहिने पैर को उठाया और उसे अत्यंत सहजता से उस असुर अपस्मार की पीठ पर स्थापित कर दिया।
यहाँ सबसे सूक्ष्म और ध्यान देने योग्य बात यह है कि शिव ने उस अज्ञान के प्रतीक असुर का वध नहीं किया बल्कि उसे केवल अपने पैर के नीचे दबाकर पूरी तरह से अपने नियंत्रण में कर लिया। यही इस अलौकिक गाथा का सबसे गहरा और वास्तविक आध्यात्मिक संदेश है। इस सृष्टि के संचालन के लिए अज्ञान का अस्तित्व में बने रहना भी उतना ही अनिवार्य है क्योंकि यही अज्ञान मनुष्य के भीतर कुछ नया सीखने की जिज्ञासा और विनम्रता को जीवित रखता है। यदि संसार से अज्ञान पूरी तरह समाप्त हो जाए तो मनुष्य का आत्मिक विकास रुक जाएगा। खतरा तब प्रारंभ होता है जब यह अज्ञान मनुष्य की जागरूकता और उसके विवेक से ऊपर उठकर उसके मस्तिष्क पर शासन करने लगता है। नटराज का वह दिव्य नृत्य वास्तव में सृजन, पालन, संहार, विवेक और आध्यात्मिक जागृति के मध्य एक परम ब्रह्मांडीय संतुलन का साक्षात प्रदर्शन था।
भगवान शिव का यह नटराज स्वरूप केवल किसी प्राचीन पौराणिक कथा का सुंदर विग्रह मात्र नहीं है बल्कि यह तो हमारे दैनिक जीवन की विषमताओं को सुलझाने का एक अत्यंत व्यावहारिक माध्यम है। आज के इस कलयुग में मनुष्य के जीवन में निरंतर आने वाली समस्याएं, विफलताएं, आंतरिक असुरक्षा और अनपेक्षित परिवर्तन उसे मानसिक रूप से पूरी तरह से तोड़ देते हैं जिससे वह क्रोध या अवसाद का शिकार हो जाता है।
परंतु नटराज का यह पवित्र नृत्य हमें यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितना भी बड़ा कोलाहल या भयंकर तूफान क्यों न खड़ा हो जाए मनुष्य को कभी भी भय या क्रोध में आकर जड़ नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत उसे अपने भीतर के अहंकार और अज्ञान को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में रखते हुए जीवन की इस सुंदर लय के साथ निरंतर प्रवाहित होते रहना चाहिए। नटराज के एक हाथ में संहार की अग्नि है तो दूसरे हाथ में सृजन का डमरू है जबकि उनका उठा हुआ दाहिना हाथ संपूर्ण जगत को अभय मुद्रा में यह आश्वासन प्रदान करता है कि डरो मत। उनका यह संदेश अत्यंत सरल परंतु शक्तिशाली है कि जब मनुष्य जीवन की परिस्थितियों से लड़ना बंद करके साक्षात ईश्वर की इच्छा के साथ बहना आरंभ कर देता है तो भयंकर उथल पुथल और कोलाहल के बीच भी उसका आंतरिक रूपांतरण अत्यंत सुगमता से संपन्न हो जाता है।
भगवान शिव ने असुर अपस्मार का वध क्यों नहीं किया उसे केवल दबाया क्यों
असुर अपस्मार साक्षात अज्ञान का प्रतीक है। सृष्टि के नियम के अनुसार अज्ञान का होना आवश्यक है क्योंकि यही मनुष्य के भीतर ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा और विनम्रता को जीवित रखता है इसलिए शिव ने उसका वध करने के बजाय उसे केवल नियंत्रित किया।
ज्योतिष शास्त्र में अपस्मार दमन के इस प्रसंग का क्या महत्व माना गया है
ज्योतिष के अनुसार अपस्मार राहु के उस तीव्रतम नकारात्मक प्रभाव को दर्शाता है जो मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित कर देता है। नटराज की उपासना करने से कुंडली के सभी प्रकार के मानसिक भ्रम और राहु केतु जनित दोष पूरी तरह शांत हो जाते हैं।
दारुक वन की इस कथा का मुख्य मनोवैज्ञानिक संदेश क्या है
इस कथा का मुख्य मनोवैज्ञानिक संदेश यह है कि जब मनुष्य का ज्ञान अहंकार में बदल जाता है तो वह अंधा हो जाता है। अपनी आंतरिक असुरक्षा को छुपाने के लिए मनुष्य जब क्रोध का सहारा लेता है तो वह अपने ही पतन का मार्ग तैयार करता है।
नटराज की अभय मुद्रा मनुष्य को क्या प्रेरणा प्रदान करती है
नटराज की अभय मुद्रा यह प्रेरणा देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियां, दुख या परिवर्तन क्यों न आ जाएं यदि आपका मन ईश्वर की चेतना से जुड़ा है तो आपको संसार की किसी भी नकारात्मक ऊर्जा से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।
शमी वृक्ष और शिव की इस लीला के बीच क्या ज्योतिषीय संबंध है
शमी वृक्ष को ज्योतिष में शनि देव का प्रतीक माना गया है जो कठोर अनुशासन और कर्मायन के शोधक हैं। शिव की यह लीला भी हमें अपने भीतर के विकारों को तपस्या की अग्नि में शोधित करके शांत रहने की परम शिक्षा प्रदान करती है।
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