By पं. संजीव शर्मा
जानिए अविनाशी नगरी काशी और मृत्यु के समय मिलने वाले तारक मंत्र का आध्यात्मिक सत्य

सनातन धर्म की पावन वैचारिक चेतना और वैदिक दर्शन के विशाल वांग्मय में काशी नगरी का स्थान अत्यंत अलौकिक और विस्मयकारी माना गया है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय विन्यासों और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं का अंतिम लक्ष्य मानव चेतना को जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त कराना है। विश्व में अनेक नगर अपने समृद्ध इतिहास के लिए जाने जाते हैं तो अनेक अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं परंतु काशी केवल अपने भौतिक स्वरूप के कारण वंदनीय नहीं है। यह पृथ्वी पर एक ऐसा पावन धरातल है जहां मानव जीवन के अंतिम क्षण में घटित होने वाली घटना संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड के नियमों को बदल देती है। काशी में मृत्यु को कभी छुपाया नहीं जाता है बल्कि यहां मृत्यु को एक उत्सव की भांति देखा जाता है और उसके लिए जीवनभर मानसिक तैयारी की जाती है। हजारों वर्ष से संपूर्ण विश्व के श्रद्धालु इस अटूट विश्वास के साथ जीते आए हैं कि देवाधिदेव महादेव भगवान शिव कभी भी काशी का परित्याग नहीं करते हैं। चाहे सृष्टि का प्रारंभ हो चाहे उसका निरंतर पालन हो अथवा महाप्रलय के समय संपूर्ण ब्रह्मांड का संहार ही क्यों न हो जाए काशी सदैव महादेव के त्रिशूल पर सुरक्षित खड़ी रहती है। इस अविनाशी नगरी में जब भी कोई जीवात्मा अपने भौतिक शरीर का परित्याग करती है तो साक्षात शिव उसके दाहिने कान में एक परम गुप्त महामंत्र फूंकते हैं जिसे तारक मंत्र कहा जाता है। यह मंत्र जीवात्मा को कर्मों के चक्रव्यूह से मुक्त करके सीधे मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। इस गूढ़ आध्यात्मिक सत्य को समझे बिना कलयुग में मुक्ति के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करना सर्वथा असंभव है।
इस अलौकिक विषय के अंतर्गत छिपे हुए गहरे दार्शनिक रहस्यों, ज्योतिषीय तत्वों और कर्मायन के सिद्धांतों को भलीभांति समझने के लिए काशी नगरी के मुख्य आध्यात्मिक स्तंभों का अवलोकन करना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में काशी के दिव्य स्वरूप और तारक मंत्र के अंतर्निहित सूक्ष्म ज्योतिषीय प्रभावों का एक स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
| काशी क्षेत्र के मुख्य आध्यात्मिक घटक | सूक्ष्म दार्शनिक स्वरूप | ज्योतिषीय एवं आत्मिक संबंध |
|---|---|---|
| अविनाशी महाक्षेत्र | समय और काल चक्र की सीमाओं से सर्वथा परे | सूर्य देव की अमर आत्मिक ऊर्जा और परम स्थिरता |
| भगवान श्री विश्वनाथ | चराचर ब्रह्मांड के एकमात्र परम स्वामी | देवगुरु बृहस्पति का सर्वोच्च विवेक और कृपा प्रवाह |
| मणिकर्णिका महाश्मशान | अनवरत प्रज्वलित रहने वाली वैराग्य की अग्नि | मंगल का प्रचंड तेज और संचित कर्मों का शोधन |
| दिव्य तारक मंत्र | मुक्ति प्रदान करने वाला परम गुप्त नाद | चंद्रमा की चंचलता का नाश और केतु द्वारा मोक्ष |
| पतित पावनी गंगा | उत्तरवाहिनी होकर अमृत रस प्रवाहित करना | मन की पूर्ण शुद्धि और आध्यात्मिक चेतना का विकास |
वैदिक संहिताओं और स्कंद पुराण के काशी खंड में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि काशी नगरी का निर्माण किसी मानवीय हाथ या भौतिक तत्व से नहीं हुआ है। यह साक्षात आनंदवन है जिसे महादेव ने अपने आनंद विलास के लिए प्रकट किया था। जब संपूर्ण ब्रह्मांड महाप्रलय के समय अंधकार में विलीन हो जाता है और समय की गति पूरी तरह से ठहर जाती है तब भी काशी का अस्तित्व पूर्णतः अक्षुण्ण बना रहता है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से जब कुंडली में सूर्य और बृहस्पति का पावन संबंध बनता है तो मनुष्य के भीतर इसी प्रकार की कालजयी चेतना का उदय होता है जो उसे भौतिक संसार के अज्ञात भयों से मुक्त कर देती है।
काशी में भगवान शिव की आराधना बाबा विश्वनाथ के रूप में की जाती है जिसका अर्थ है इस संपूर्ण ब्रह्मांड का एकमात्र स्वामी। यद्यपि उनका परम पावन ज्योतिर्लिंग मुख्य गर्भगृह में स्थापित है परंतु वैदिक दर्शन यह सिखाता है कि विश्वनाथ की चेतना केवल एक मंदिर की दीवारों में आबद्ध नहीं है।
उनकी दिव्य ऊर्जा काशी के कण कण में, वहां की धूल में, प्रत्येक संकरी गली में, गंगा की तरंगों में और वहां निवास करने वाले प्रत्येक जीव के भीतर अनवरत रूप से प्रवाहित होती रहती है। यही कारण है कि काशी को किसी अन्य देवता की नगरी नहीं बल्कि साक्षात शिव का अपना गृह माना जाता है। यहाँ महादेव किसी अतिथि की भांति आते जाते नहीं हैं बल्कि वे यहाँ पूर्णता के साथ सदैव निवास करते हैं। काशी का प्रत्येक मार्ग, प्रत्येक घाट और यहां तक कि महाश्मशान भी उनकी साक्षात उपस्थिति का ही एक दिव्य विस्तार है। जब संत और मनीषी यह कहते हैं कि शिव कभी काशी नहीं छोड़ते हैं तो उनका तात्पर्य यह होता है कि यहाँ ईश्वरीय चेतना का प्रवाह कभी भी खंडित नहीं होता है। यहाँ जीव और ईश्वर के मध्य की दूरी अत्यंत न्यूनतम हो जाती है जिससे प्रार्थनाएं सीधे स्वीकार होती हैं।
लौकिक संसार में मृत्यु को एक अत्यंत दुखद, भयानक और अशुभ घटना मानकर समाज की नज़रों से दूर छुपाने का प्रयास किया जाता है। परंतु काशी की पवित्र भूमि पर मृत्यु अपने इस भयानक आवरण को त्यागकर एक अत्यंत सुंदर, दृश्यमान और मर्यादित रूप में प्रकट होती है। यहाँ के गंगा घाटों पर महाश्मशान की अग्नि चौबीसों घंटे बिना किसी रुकावट के अनवरत प्रज्वलित रहती है जो प्रत्येक क्षण संसार को यह स्मरण कराती है कि जीवन और मृत्यु कोई दो अलग तत्व नहीं हैं बल्कि वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो साथ साथ चलते हैं।
वैदिक ग्रंथों के अनुसार तारक मंत्र वह परम गुप्त नाद है जिसे भगवान शिव काशी में मृत्यु प्राप्त करने वाले प्रत्येक जीव के कान में अत्यंत कोमलता से फूंकते हैं। तारक शब्द का शाब्दिक और सूक्ष्म अर्थ ही यही है जो जीव को इस संसार रूपी भवसागर से पार उतार दे।
यह महामंत्र किसी जीवित मनुष्य को दी जाने वाली कोई सामान्य दीक्षा नहीं है और न ही इसका उपयोग किसी सामाजिक कर्मकांड या कीर्तन में किया जा सकता है। यह केवल उस अंतिम और पावन क्षण के लिए सुरक्षित रखा गया है जब जीवात्मा अपने भौतिक शरीर के बंधनों, मानवीय अहंकार और सांसारिक मोह माया से पूरी तरह मुक्त हो रही होती है। यह कृत्य सिद्ध करता है कि महादेव कलयुग के जीवों के लिए कोई कठोर न्यायाधीश नहीं हैं बल्कि वे तो एक अत्यंत दयालु और वात्सल्यमयी मार्गदर्शक हैं। काशी में मोक्ष की प्राप्ति किसी कठिन योगाभ्यास, वर्षों की कठिन तपस्या या संचित पुण्यों के गणित पर निर्भर नहीं करती है बल्कि वह केवल शिव की अमोघ करुणा और अनुग्रह पर टिकी होती है। यह मंत्र जीवात्मा को उसके वास्तविक अविनाशी स्वरूप का स्मरण कराता है जिससे वह अपने मैं और मेरा के भ्रम को छोड़कर परम ब्रह्म में लीन हो जाती है।
एक अत्यंत स्वाभाविक और तार्किक प्रश्न प्रत्येक साधक के अंतर्मन में अवश्य उत्पन्न होता है कि यदि भगवान शिव संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड में समान रूप से व्याप्त हैं और वे हर स्थान पर दयालु हैं तो फिर वे इस तारक मंत्र का दान केवल काशी में ही क्यों करते हैं। इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर सनातन दर्शन के उस सिद्धांत में छिपा है जिसे क्षेत्र महिमा कहा जाता है।
काशी केवल एक नगर नहीं है बल्कि यह आध्यात्मिक ऊर्जा से पूरी तरह चार्ज एक ऐसा ब्रह्मांडीय क्षेत्र है जहां मानवीय कर्मों का बंधन अत्यंत शिथिल हो जाता है और आत्मिक जागरूकता अपने उच्चतम शिखर पर होती है। यहाँ का वातावरण स्वतः ही मनुष्य को वैराग्य की ओर अग्रसर करता है। एक ओर जहां पतित पावनी गंगा शांत भाव से बहती है तो ठीक उसके समीप जलती हुई चिताओं की लपटें सांसारिक नश्वरता का साक्षात उपदेश देती हैं। यह एक ऐसा अद्भुत और अलौकिक दृश्य है जो मनुष्य के भीतर छिपे हुए कर्मायन के दोषों को पूरी तरह से धो देता है। ऐसी पवित्र भूमि पर ही जीवात्मा का मन पूरी तरह से शांत और आसक्ति रहित हो पाता है। किसी अन्य स्थान पर मनुष्य का अंतर्मन अपनी वासनाओं, इच्छाओं और झूठी पहचान की बेड़ियों में इस कदर जकड़ा रहता है कि वह तारक मंत्र के उस सूक्ष्म नाद को ग्रहण करने के योग्य ही नहीं हो पाता है। काशी में वे बंधन स्वतः ही ढीले हो जाते हैं जिससे शिव का वह गुप्त शब्द सीधे आत्मा में उतर जाता है।
संसार की अनेक धार्मिक और दार्शनिक प्रणालियों में मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति को अत्यंत कठिन, दुर्गम और कठोर नियमों तथा अनुशासनों के अधीन माना गया है। परंतु काशी का दर्शन संपूर्ण चराचर जगत के सम्मुख एक सर्वथा भिन्न और अत्यंत कल्याणकारी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यहाँ मुक्ति अर्जित नहीं की जाती है बल्कि यहाँ मुक्ति साक्षात ईश्वर द्वारा एक उपहार के रूप में सहर्ष प्रदान की जाती है।
काशी में महादेव की अनवरत उपस्थिति कर्मायन के उन अत्यंत जटिल और कठोर नियमों को भी पूरी तरह से कोमल और निष्प्रभावी बना देती है जो जीव को बार बार जन्म लेने पर विवश करते हैं। इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि मनुष्य के कर्मों का महत्व समाप्त हो जाता है बल्कि इसका सूक्ष्म अर्थ यह है कि काशी के धरातल पर साक्षात ईश्वर की करुणा का बल कर्मों के परिणाम से कहीं अधिक शक्तिशाली हो जाता है। यही वह परम पावन कारण है जिसने सदियों से अनगिनत संतों, योगियों और साधारण मनुष्यों को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में काशी की ओर आकर्षित किया है। वे यहाँ अपने जीवन से भागने के लिए नहीं आते हैं बल्कि वे तो अपने इस मानवीय जीवन की यात्रा को उसकी पूर्णता और सार्थकता के साथ समाप्त करने के लिए आते हैं। शिव का काशी को कभी न छोड़ने का संकल्प उनके इसी अमोघ आश्वासन का प्रतीक है कि उनकी शरण में आया कोई भी जीव अंतिम क्षण में कभी त्यागा नहीं जाएगा।
सदियों के इतिहास में आदि शंकराचार्य, संत कबीर, गोस्वामी तुलसीदास से लेकर अनगिनत अनाम योगियों और साधारण श्रद्धालुओं ने अपने अंतिम दिनों को व्यतीत करने के लिए काशी की पावन मिट्टी को ही चुना है। उनका यह चुनाव मृत्यु के प्रति किसी प्रकार के अवसाद या अज्ञात भय पर आधारित नहीं था बल्कि वह तो मृत्यु के वास्तविक स्वरूप की पूर्ण स्पष्टता और बोध के कारण था।
काशी में निवास करने का अर्थ ही यही है कि मनुष्य स्वयं को उस परम सत्य के सम्मुख पूरी तरह से अनावृत कर देता है जहां किसी भी प्रकार का कोई पाखंड या दिखावा शेष नहीं रह जाता है। यहाँ का दैनिक जीवन प्रत्येक जीव को हर क्षण यह स्मरण कराता रहता है कि इस संसार में क्या वास्तव में महत्वपूर्ण है और क्या पूरी तरह से व्यर्थ है। महादेव की उपस्थिति यहाँ किसी जादुई चमत्कार के माध्यम से नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर जाग्रत होने वाली आत्मिक जागरूकता और परम शांति के रूप में महसूस की जाती है। जब सनातन संस्कृति के विद्वान यह उद्घोषणा करते हैं कि शिव कभी काशी को नहीं छोड़ते हैं तो उनका वास्तविक तात्पर्य यही होता है कि इस पावन नगरी में सत्य कभी भी अज्ञान के परदे के पीछे छुपा हुआ नहीं रहता है। वह सदैव साक्षात रूप में प्रकट रहता है और जीव को अभय दान प्रदान करता है।
तारक मंत्र का वास्तविक और सूक्ष्म स्वरूप क्या है
वैदिक दर्शन के अनुसार तारक मंत्र साक्षात राम नाम या ओमकार का वह सूक्ष्म नाद स्वरूप है जिसे स्वयं भगवान शिव अंत समय में जीव के कान में फूंकते हैं जिससे उसके संचित कर्मों के बंधन नष्ट हो जाते हैं।
क्या काशी में मरने वाले प्रत्येक जीव को चाहे वह पापी हो मोक्ष मिलता है
हां शास्त्रों की यह स्पष्ट मान्यता है कि काशी क्षेत्र की महिमा इतनी सर्वोपरि है कि वहां मृत्यु प्राप्त करने वाले प्रत्येक जीव को शिव की करुणा से मोक्ष मिलता है परंतु पापी जीवों को मृत्यु से पूर्व भैरव यातना भोगनी पड़ती है जिससे उनके पाप नष्ट होते हैं।
भैरव यातना क्या है और इसका क्या ज्योतिषीय महत्व है
काशी के कोतवाल भगवान काल भैरव हैं जो दंड के अधिष्ठाता हैं। मृत्यु के समय पापी जीव के संचित पापों को नष्ट करने के लिए जो तीव्र मानसिक और आत्मिक पीड़ा कुछ क्षणों के लिए दी जाती है उसे भैरव यातना कहते हैं जो कड़े कर्मों का शोधन करती है।
ज्योतिष शास्त्र में काशी यात्रा और वास का क्या महत्व माना गया है
Vedic ज्योतिष के अनुसार काशी साक्षात शिव की नगरी होने के कारण कुंडली के सबसे क्रूर ग्रहों जैसे शनि, राहु और केतु के अशुभ प्रभाव को पूरी तरह से समाप्त कर देती है और मनुष्य के मन में परम सात्विक ऊर्जा का संचार करती है।
क्या काशी नगरी वास्तव में भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई है
यह एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक सत्य है। त्रिशूल वास्तव में मानव शरीर की तीन मुख्य नाड़ियों इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का प्रतीक है। काशी ब्रह्मांड के केंद्र में सुषुम्ना नाड़ी के समान स्थित है जो इसे भौतिक प्रलय से पूरी तरह सुरक्षित रखती है।
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