By अपर्णा पाटनी
भगवद गीता के आसान सूत्रों से हर दिन चिंता घटाकर मन में स्थिर शांति और सच्ची पॉज़िटिविटी जगाने की गहरी राह

सुबह आंख खुलते ही मन कितनी जल्दी भागने लगता है, यह बात हर व्यक्ति अपने भीतर महसूस कर सकता है। किसी के लिए यह दौड़ अलार्म के साथ ही शुरू हो जाती है, किसी को कुछ पल की शांति मिलती है, फिर अचानक दिन भर के काम, संदेश, मीटिंग, जिम्मेदारियां मन पर टूट पड़ती हैं।
धीरे धीरे यह स्वीकार कर लिया जाता है कि बेचैनी आधुनिक जीवन की “क़ीमत” है। जैसे बिना तनाव के जीना व्यावहारिक नहीं रहा। भगवद गीता यहां एक बिल्कुल अलग दृष्टि रखती है। यह कहती है कि शांति कोई कल्पना नहीं बल्कि मन की वह स्वाभाविक अवस्था है जिसे हमने भूल दिया है। यह भूल ही हर दिन की अशांति का मूल कारण है।
कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का मन भी कुछ ऐसा ही दौड़ रहा था।
कृष्ण ने इस उलझन को एक वाक्य में समेट दिया कि जो परम से जुड़ा नहीं, उसके लिए
संस्कृत का शब्द “युक्त” इसी जुड़ाव को दर्शाता है। जब मन केवल
से ही पहचान लेता है, तो ज़रा सी हानि या बदलती परिस्थिति भी उसे हिला देती है।
कृष्ण का प्रश्न कि
“शांति के बिना सुख कैसे होगा”
पूरे जीवन की दिशा बदलने वाला प्रश्न बन सकता है।
गीता में कृष्ण एक गहरा रूपक देते हैं।
कृष्ण बताते हैं कि इच्छाएं भी ऐसी ही नदियों की तरह हैं।
मन सोचता है कि “बस यह मिल जाए, फिर शांति होगी”। पर जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है, दूसरी सामने खड़ी हो जाती है।
सागर की तरह
यदि
तो वही मन शांत रह सकता है, चाहे जीवन में कितनी भी हलचल क्यों न हो।
| दृष्टिकोण | परिणाम |
|---|---|
| हर इच्छा को पकड़े रखना | निरंतर बेचैनी, थकान और तुलना |
| इच्छा को देखकर छोड़ना | प्रयत्न के बाद भीतर की शांति बनी रहना |
गीता यह नहीं कहती कि इच्छा रखना ही दोष है।
तो यह सब भी इच्छाएं ही हैं।
मुख्य बात यह है कि
जब व्यक्ति यह मान लेता है कि “मेरा सुख केवल इच्छा पूरी होने पर ही संभव है” तो वह स्वतः ही बेचैनी में बंध जाता है।
कृष्ण का संकेत यह है कि
“शांति वहां होती है जहां व्यक्ति भीतर से कुछ हद तक पूर्ण महसूस करे, चाहे बाहरी इच्छाएं पूरी हों या न हों।”
गीता कहती है कि
“मनुष्य का मित्र भी उसका मन है और शत्रु भी उसका मन है।”
यदि मन
तो वही मन दिन भर
की अग्नि में जलाता रहता है।
उसी मन को यदि
तो वही मन धीरे धीरे बंधन से उठकर सहयोगी बन जाता है।
गीता की दृष्टि से सुबह का पहला आधा घंटा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अक्सर होता यह है कि
यदि इसके स्थान पर एक छोटा अभ्यास रखा जाए
तो दिन की ऊर्जा ही अलग दिशा पकड़ती है।
यह अभ्यास
आधुनिक जीवन में तनाव का बड़ा कारण यह है कि व्यक्ति अपने
को परिणामों के आधार पर तौलता है।
गीता कर के कहती है कि
“बंधन कर्म से नहीं, कर्म के फल की आसक्ति से होता है।”
अर्थात
कर्म योग की तीन सरल सीढ़ियां समझी जा सकती हैं
1. तैयारी
2. ईमानदार प्रयास
3. फल समर्पण
जब व्यक्ति यह भाव रखता है कि
“मुझे प्रयास करना है, परिणाम एक उच्चतर व्यवस्था के हाथ में है”
तो काम की गंभीरता बनी रहती है, पर मन का बोझ हल्का होने लगता है।
गीता का सौंदर्य यही है कि उसके सिद्धांत केवल ध्यान कक्ष तक सीमित नहीं।
यह रात का छोटा अभ्यास अगली सुबह के लिए मन को शांत और तैयार करता है।
| समय | अभ्यास | मन पर प्रभाव |
|---|---|---|
| सुबह उठते ही | 5-10 मिनट श्वास जागरूकता और आत्मस्मरण | दिन की शुरुआत केंद्रित और हल्की होती है |
| काम के बीच | 1 मिनट गहरी सांस, वर्तमान पर ध्यान | तनाव कम, निर्णय क्षमता साफ होती है |
| कठिन क्षणों में | प्रतिक्रिया से पहले 3 गिनती तक ठहरना | आवेश घटता है, संबंध सुरक्षित रहते हैं |
| सोने से पहले | दिन की समीक्षा और कृतज्ञता की सूची | मन हल्का, नींद गहरी और सकारात्मक बनती है |
गीता में कृष्ण अर्जुन को एक वचन सुनाते हैं
“मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।”
इस आश्वासन का अर्थ यह नहीं कि भक्त के जीवन में कभी कठिनाई नहीं आएगी। अर्थ यह है कि
जब कोई व्यक्ति
तो यह वाक्य उसके भीतर एक ऐसी सुरक्षा भावना भर देता है जो किसी भी बीमा पॉलिसी से गहरी होती है।
परिस्थितियां बदल सकती हैं, पर यह भरोसा कि
“यदि नीयत और दिशा सही है, तो अंततः भला ही होगा”
मन को स्थायी शांति के पास ले जाता है।
सकारात्मकता का अर्थ
नहीं है।
गीता के अनुसार वास्तविक सकारात्मकता यह है कि
इस दृष्टि के साथ
फिर हर सुबह एक नया अवसर बन जाती है कि
1. अगर समय बहुत कम हो तो गीता की कौन सी बात तुरंत अपनाई जा सकती है
सबसे सरल अभ्यास है सुबह 5 मिनट फोन से पहले खुद के साथ बैठना और तीन बार गहरी सांस लेते हुए मन में “मैं केवल परिस्थिति नहीं, उससे बड़ा हूं” का स्मरण करना। इसके साथ दिन में 1-2 बार किसी भी कठिन क्षण में प्रतिक्रिया से पहले थोड़ी देर रुकना भी बहुत प्रभावी है।
2. क्या इच्छाओं को छोड़ देना ही आध्यात्मिक मार्ग है
गीता इच्छाओं के दमन की नहीं, उनके साथ सचेत संबंध की बात करती है। लक्ष्य रखें, पर लक्ष्य में ही अपनी पहचान न खो दें। इच्छा को साधन बनाएं, बंधन नहीं। जब व्यक्ति भीतर से थोड़ा संतुष्ट रहना सीखता है तब इच्छा भी शांत और कर्म भी हल्का हो जाता है।
3. कर्म योग अपनाने का व्यावहारिक तरीका क्या हो सकता है
हर महत्वपूर्ण काम से पहले निश्चय करें - “मैं भरसक श्रेष्ठ प्रयास करूंगा, पर परिणाम को लेकर खुद को नहीं तोड़ूंगा।” काम खत्म होने पर कुछ क्षण मन ही मन उस कार्य को ईश्वर या किसी उच्चतर सत्य को समर्पित कर दें। इससे काम पूजा की तरह और मन यात्र की तरह महसूस होने लगता है।
4. रात की आत्मसमीक्षा को कैसे किया जाए कि अपराध बोध न बढ़े
समीक्षा का उद्देश्य खुद को दोष देना नहीं, सीख लेना है। दिन के प्रसंगों को इस दृष्टि से देखें कि “कहां बेहतर कर सकता था” और “आज क्या अच्छा किया”। फिर अगली सुबह के लिए एक छोटा सुधार बिंदु चुनें। इस तरह समीक्षा आत्मग्लानि नहीं, आत्मविकास का साधन बनती है।
5. क्या गीता पढ़े बिना भी इन बातों को अपनाया जा सकता है
हां, गीता के मूल सूत्र - आत्मस्मरण, फलासक्ति का त्याग, कर्म योग और ईश्वर पर भरोसा - को छोटे अभ्यासों के रूप में अपनाया जा सकता है, भले ही पूरा ग्रंथ न पढ़ा हो। बाद में यदि समय मिले तो हर दिन एक श्लोक या छोटा अंश पढ़ना इन अभ्यासों को और गहराई दे सकता है।
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