By पं. नरेंद्र शर्मा
संबंध, धर्म और आत्मा की यात्रा को समझने का गहन दृष्टिकोण

जीवन को यदि ध्यान से देखा जाए तो पता चलता है कि मनुष्य अंदर से जितना स्थायित्व चाहता है, बाहर की दुनिया उतनी ही बदलती रहती है। परिवार बढ़ता है फिर बिखरता है, मित्रता गहराती है फिर दूरी बढ़ जाती है, जीवनसाथी, सहकर्मी, पड़ोसी, गुरु, शिष्य - हर संबंध धीरे‑धीरे बदलता या कभी न कभी समाप्त होता है। मन इन परिवर्तनों को रोकना चाहता है, वही संघर्ष मानसिक पीड़ा में बदल जाता है। भगवद गीता इस पीड़ा को नकारती नहीं बल्कि उसकी जड़ तक जाकर यह समझाती है कि संबंधों की अस्थिरता को स्वीकार करना आध्यात्मिक परिपक्वता का आरंभ है।
गीता का संदेश यह नहीं कि संबंधों का महत्व कम है। संदेश यह है कि जो वस्तु स्वभाव से अस्थायी है उसे स्थायी मानकर पकड़ लेने से ही दुख जन्म लेता है। प्रेम, कर्तव्य और अपनापन जीवन की धुरी हैं, परंतु उनमें ऐसी आसक्ति न हो जो बिछोह आने पर हमें भीतर से तोड़ दे। जब हम इस भाव से जीते हैं कि हर संबंध ईश्वर द्वारा दिया गया एक अवसर है तब हम थोड़ा शांत, थोड़ा जागरूक और बहुत अधिक कृतज्ञ हो जाते हैं।
भगवद गीता कुरुक्षेत्र के मैदान में बोली गई, जहाँ रिश्ते, कर्तव्य और धर्म तीनों एक साथ खड़े थे। एक ओर दादा, गुरु, भाई और संबंधी थे, दूसरी ओर न्याय और धर्म। इसी पृष्ठभूमि में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि संसार का हर संबंध देह, परिस्थिति और समय पर आधारित है। जैसे कपड़े बदलते हैं वैसे ही जन्म बदलते हैं और उनके साथ‑साथ संबंध भी बदल जाते हैं।
गीता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो जीवन एक विशाल रंगमंच है। आत्मा विभिन्न जन्मों में अलग‑अलग भूमिकाएँ निभाती है। कहीं माता बनकर आती है, कहीं पुत्र बनकर, कहीं मित्र, कहीं शत्रु, कहीं मार्गदर्शक, तो कहीं सहायक। भूमिका समाप्त होते ही दृश्य बदल जाता है। यदि इस सत्य को भीतर से स्वीकार लिया जाए तो बिछोह का दर्द करुणा में बदलने लगता है और शिकायत की जगह समझ विकसित होती है।
गीता बार‑बार यह स्मरण कराती है कि “आत्मा कभी पैदा नहीं होती और कभी नष्ट नहीं होती।” शरीर बदलते हैं, समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, परंतु आत्मा का अस्तित्व सदा एक समान रहता है। इसीलिए जो संबंध हम देह के आधार पर पहचानते हैं वे स्थायी नहीं हो सकते।
एक जन्म में जो माता है, अगले जन्म में हो सकता है वही आत्मा किसी और भूमिका में मिले। बाल्यकाल का घनिष्ठ मित्र आगे चलकर केवल स्मृति बन सकता है। जिस व्यक्ति के बिना जीवन असंभव लगता है, कुछ वर्षों बाद उसकी उपस्थिति उतनी प्रभावी न रहे। आत्मा की दृष्टि से यह कोई कमी नहीं, यह यात्रा का स्वाभाविक हिस्सा है।
जब यह समझ भीतर पक्की हो जाती है कि संबंध भूमिका हैं, स्वत्व नहीं तब अपेक्षाएँ हल्की होने लगती हैं। हम यह मानकर नहीं जीते कि “ये हमेशा रहेंगे” बल्कि यह भाव रखकर जीते हैं कि “जब तक साथ हैं, इन्हें पूरी सजगता से जीया जाए।”
अक्सर पहला प्रश्न यही उठता है कि यदि हर संबंध अस्थायी है तो क्या मनुष्यों से गहरा प्रेम करना मूर्खता है। गीता इसके विपरीत संकेत देती है। जब किसी वस्तु को नश्वर जानकर भी उससे प्रेम किया जाए तो वह प्रेम अधिक कोमल और अधिक संवेदनशील रहता है।
जैसे किसी पुष्प का सौंदर्य इस बात से बढ़ जाता है कि वह कुछ ही समय में मुरझाने वाला है, वैसे ही संबंधों की कोमलता उनका सीमित काल बताता है। आत्मा की शाश्वतता को समझकर हम यह नहीं कहते कि “कोई मायने नहीं रखता,” बल्कि यह सीखते हैं कि “हर व्यक्ति उस एक परमसत्ता की झलक लेकर आया है।” इससे प्रेम का आधार देह से उठकर आत्मा पर टिक जाता है।
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि इच्छा से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से दुख। जब हम किसी संबंध को “मेरा” कहकर पकड़ लेते हैं तब उसके बदलने या समाप्त होने पर भीतर शून्यता पैदा हो जाती है। प्रेम स्वाभाविक प्रवाह है, पर स्वामित्व की भावना उसे भारी बोझ बना देती है।
अक्सर मन यह मानकर चलता है कि “जिससे प्रेम है वह कभी दूर नहीं होगा” या “यह रिश्ता हमेशा इसी रूप में बना रहेगा।” वास्तविकता जब इससे अलग होती है तब भ्रम टूटता है और पीड़ा उत्पन्न होती है। गीता हमें दृष्टि बदलने को कहती है। प्रश्न “वे क्यों चले गए” से हटकर “जब तक रहे, उन्होंने जीवन को क्या सिखाया” पर आता है। इस प्रश्न में कृतज्ञता छिपी रहती है।
जिस दिन यह समझ आ जाए कि कोई भी व्यक्ति केवल हमारे लिए नहीं आया बल्कि अपने कर्म और सीख के लिए आया, उसी दिन आसक्ति ढीली पड़ने लगती है। तब प्रेम विकलता से मुक्त होकर करुणा और सम्मान में बदलता है।
कुरुक्षेत्र की सबसे बड़ी उलझन यही थी कि अर्जुन को अपने ही परिजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाना था। भावनात्मक स्तर पर यह लगभग असंभव था। कृष्ण बताते हैं कि सच्चा धर्म कभी‑कभी ऐसे निर्णय की मांग करता है जो हृदय के लिए बहुत कठोर हो, पर अंततः न्याय के पक्ष में हो।
जीवन में यह स्थिति कई रूप में आती है।
ऐसी स्थितियों में केवल “रिश्ता टूट न जाए” के भय से सब सहते रहना गीता की दृष्टि में उचित नहीं। वहाँ धर्म यह कहता है कि विनम्रता और संवेदना रखते हुए भी दूरी बनाई जाए। यह दूरी नफरत नहीं, अपनी और दूसरे की आत्मा के प्रति ईमानदारी है।
सच्चा प्रेम वही है जो सामने वाले की आत्मा और सत्य, दोनों का सम्मान कर सके, भले ही इसके लिए भौतिक निकटता से हटना पड़े।
श्रीकृष्ण ऋतुओं का उदाहरण देकर बताते हैं कि जैसे ग्रीष्म के बाद वर्षा और वर्षा के बाद शीत आती है, वैसे ही जीवन में संबंधों के मौसम भी बदलते रहते हैं। बचपन के मित्रों के लिए समय नहीं निकल पाता, भाई‑बहन अपनी स्वतंत्र यात्राओं पर निकल जाते हैं, संतानें दूर शहरों या देशों में बस जाती हैं। कुछ व्यक्तियाँ मृत्यु के रूप में विदा हो जाती हैं।
यदि मन यह मानकर चलता रहे कि “यह सब पहले जैसा ही बना रहना चाहिए,” तो दुख के अलावा कुछ हासिल नहीं होता। गीता सिखाती है कि जो परिवर्तन रुक नहीं सकता, उसके साथ युद्ध करना केवल थकान देता है। इसके स्थान पर यदि यह भाव विकसित हो कि “आज जो है, वह एक दिन बदलेगा,” तो हम वर्तमान को और सावधानी से जीना शुरू कर देते हैं।
जब कोई रिश्ता दूर हो जाए या स्वरूप बदल ले तब इसे जीवन की नदी का स्वाभाविक मोड़ मानकर स्वीकार करना ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। यह स्वीकार करना कठिन हो सकता है, पर यह स्वीकार ही भीतर की कड़वाहट को धीरे‑धीरे पिघला देता है।
कई लोगों को भय होता है कि यदि सब कुछ अस्थायी मान लिया, तो कहीं भावनाएँ ही सुन्न न हो जाएँ। गीता यहाँ भी संतुलन सिखाती है। परिवर्तन को स्वीकार करना उदासीनता नहीं बल्कि परिपक्वता है। उदासीनता में व्यक्ति कहता है, “मुझे किसी से कोई मतलब नहीं।” परिपक्वता में व्यक्ति कहता है, “मुझे सबका महत्व पता है पर मैं किसी पर टिका नहीं हूँ।”
इस भाव से जो प्रेम जन्म लेता है उसमें पकड़ कम और प्रशंसा अधिक होती है। हम रिश्तों पर अधिकार जताने के बजाय उनका आदर करना सीखते हैं। जब तक कोई हमारे साथ है तब तक उसके प्रति उत्तरदायित्व निभाना, सम्मान देना, सुनना और सहयोग करना ही सच्चा प्रेम है। भविष्य में क्या होगा यह चिंता धीरे‑धीरे कम होने लगती है।
गीता का केंद्रीय संदेश यह है कि आत्मा का वास्तविक संबंध केवल परमात्मा से है। बाकी सभी संबंध उसी एक संबंध के प्रतिबिंब हैं। माता‑पिता के रूप में ईश्वर पालनकर्ता बनकर आता है, मित्र के रूप में सहारा देता है, गुरु के रूप में मार्ग दिखाता है, जीवनसाथी के रूप में साथ का अनुभव कराता है। जब यह समझ भीतर बैठ जाती है कि हर संबंध के पीछे वही एक शक्ति है तब किसी एक व्यक्ति के जाने से भी भीतर का आधार नहीं टूटता।
जब किसी प्रियजन का बिछोह हो तब गीता यह नहीं कहती कि दुख मत मानो। वह कहती है कि उस दुख के भीतर छिपे सत्य को देखो। जिस प्रेम को हम उस व्यक्ति के साथ महसूस कर रहे थे, उसका स्रोत आज भी हमारे भीतर है। वह प्रेम ईश्वर की देन है, वही हमारे भीतर बना रहता है। यही भाव धीरे‑धीरे शोक को प्रार्थना और कृतज्ञता में बदल देता है।
जब प्रेम का केंद्र केवल मनुष्य न रहकर ईश्वर बन जाता है तब मन अधिक स्वतंत्र हो जाता है। हम पूरी आत्मीयता से प्रेम करते हैं, पर खोने का भय कम हो जाता है क्योंकि भीतर यह विश्वास रहता है कि कुछ भी हो जाए, उस परमसत्ता से संबंध कभी नहीं टूट सकता।
सिद्धांतों को समझ लेना एक बात है, उन्हें जीवन में उतारना दूसरी। कुछ सरल अभ्यास इस दिशा में सहायक बनते हैं।
इन छोटे‑छोटे अभ्यासों से मन धीरे‑धीरे परिपक्व होता है। गीता का ज्ञान केवल पुस्तक में नहीं रहता, वह व्यवहार में उतरने लगता है।
गीता का सबसे कठिन सत्य यह है कि हर संबंध किसी न किसी मोड़ पर समाप्त हो जाता है, चाहे वह दूरी से हो या मृत्यु से। यही सत्य सबसे मुक्त करने वाला भी है, क्योंकि यह हमें सिखाता है कि जो आज हमारे पास है उसे पूरे मन से जिया जाए। आसक्ति रहित प्रेम का अर्थ यह नहीं कि प्रेम कम हो जाएगा बल्कि यह कि प्रेम अधिक स्वच्छ हो जाएगा।
हर मिलन आशीर्वाद है और हर वियोग एक सीख। एक रिश्ता समाप्त होता है तो दूसरा रूप आरंभ होता है, कभी किसी नए व्यक्ति के रूप में, कभी अपने ही भीतर जागने वाली समझ के रूप में। गीता हमें सिखाती है कि संबंधों को पूरे मन से निभाएँ, पर अपने मन को केवल संबंधों के सहारे न छोड़ दें। इस संतुलन में ही सच्ची आध्यात्मिक परिपक्वता है।
1. गीता के अनुसार संबंध अस्थायी क्यों माने गए हैं?
क्योंकि देह, परिस्थितियाँ और भूमिकाएँ लगातार बदलती रहती हैं। आत्मा शाश्वत है, पर देह आधारित हर संबंध परिवर्तनशील है।
2. क्या अस्थायी होने के कारण संबंधों का महत्व कम हो जाता है?
नहीं बल्कि उनका महत्व बढ़ जाता है। जब हमें पता हो कि समय सीमित है तब हम रिश्तों को अधिक सजगता और प्रेम से जीते हैं।
3. प्रेम और आसक्ति में क्या अंतर है?
प्रेम में दूसरे के कल्याण की भावना होती है, जबकि आसक्ति में स्वामित्व और खोने का भय। प्रेम हल्का करता है, आसक्ति भारी बना देती है।
4. जब धर्म और संबंध में टकराव हो जाए तो क्या करना चाहिए?
गीता के अनुसार सत्य और न्याय को प्राथमिकता देना चाहिए। सम्मान और करुणा रखते हुए भी गलत संबंध से दूरी बनाना उचित है।
5. बिछोह के दर्द में गीता की कौन सी बात सबसे सहारा देती है?
यह स्मरण कि आत्मा और ईश्वर का संबंध कभी नहीं टूटता। जो चला गया वह उसी दिव्य स्रोत में विलीन हुआ है जिससे हम भी जुड़े हैं।
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