By पं. सुव्रत शर्मा
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों से जानिए क्रोध के छिपे कारणों और नियंत्रण के अचूक वैदिक उपाय।

संसार में प्रत्येक मनुष्य कभी न कभी क्रोध का अनुभव अवश्य करता है। इसे अक्सर शक्ति का प्रदर्शन मान लिया जाता है परंतु वास्तव में यह मनुष्य को भीतर से अत्यंत दुर्बल बनाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने क्रोध को नरक के तीन द्वारों में से एक बताया है जो अतृप्त इच्छाओं और गहरे अहंकार से उत्पन्न होता है। कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर जब अर्जुन भ्रम और संताप से घिरे थे तब श्रीकृष्ण ने उन्हें सिखाया कि वास्तविक सामर्थ्य दूसरों से लड़ने में नहीं बल्कि स्वयं पर विजय प्राप्त करने में है। जब कोई व्यक्ति वैदिक आध्यात्मिकता और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से क्रोध की उत्पत्ति को समझता है तो उसे आभास होता है कि क्रोध दबाने की वस्तु नहीं है। यह तो एक ऐसी ऊर्जा है जिसे आत्म-जागरूकता के माध्यम से चेतना में रूपांतरित किया जाना चाहिए।
क्रोध जब अंतरात्मा को जलाने लगे तो उस समय बाहरी परिस्थितियों को दोष देने के स्थान पर शांत होना अनिवार्य है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि एक शांत और स्थिर मन संसार के हजारों अस्त्र-शस्त्रों से अधिक शक्तिशाली होता है। जब भावनाएं अत्यधिक तीव्र गति से बढ़ने लगें तो उस समय उन्हें बलपूर्वक दबाना शांति नहीं लाता बल्कि उनके प्रति सजग होना मुक्ति का मार्ग खोलता है।
| मानसिक अवस्था | सामान्य प्रतिक्रिया | गीता का वैदिक नियम | ज्योतिषीय समाधान |
|---|---|---|---|
| तीव्र क्रोध | चिल्लाना और अनियंत्रित व्यवहार | एक क्षण का पूर्ण मौन धारण करना | मंगल और राहु की शांति के लिए शीतल जल पीना |
| मानसिक भ्रम | दूसरों पर दोषारोपण करना | श्वास पर ध्यान केंद्रित करना | चंद्रमा को सुदृढ़ करने के लिए प्राणायाम करना |
| अहंकार की तुष्टि | स्वयं को सही सिद्ध करना | इच्छाओं का आत्म-विश्लेषण | सूर्य के सात्विक प्रभाव के लिए ध्यान लगाना |
क्रोध की अग्नि के वेग को कम करने के लिए व्यक्ति को एक कदम पीछे हट जाना चाहिए। गहरी श्वास लेने से शरीर और मस्तिष्क में स्थित प्राण वायु संतुलित होती है। क्रोध को अपने अस्तित्व की पहचान बनाने के स्थान पर उसे आकाश में तैरते हुए काले बादलों के समान देखना चाहिए जो आते हैं और कुछ समय बाद चले जाते हैं। उस क्षणिक मौन में ही वास्तविक विवेक का उदय होता है और मानसिक अशांति का तूफान स्वतः ही शांत हो जाता है।
क्रोध का विस्फोट अचानक किसी एक क्षण में नहीं होता बल्कि इसकी जड़ें बहुत पहले से हृदय की अगाध गहराइयों में पनप रही होती हैं। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि तात्कालिक कारण तो अत्यंत सामान्य होता है परंतु उसके पीछे अतीत की पीड़ा, भय, असुरक्षा अथवा निराशा छिपी होती है। श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के त्रेसठवें श्लोक में इस मनोवैज्ञानिक सत्य को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया गया है।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
इस श्लोक का अर्थ यही है कि क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव यानी सम्मोह उत्पन्न होता है और सम्मोह से स्मृति में भ्रम पैदा होता है। स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि का नाश हो जाता है और जब बुद्धि का नाश होता है तो मनुष्य का पूरी तरह पतन हो जाता है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जब मनुष्य सांसारिक वस्तुओं का निरंतर चिंतन करता है तो उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से इच्छाएं जन्म लेती हैं और जब उन इच्छाओं की पूर्ति में कोई बाधा आती है तो अनिवार्य रूप से क्रोध का जन्म होता है। वास्तविक शक्ति अपनी आवाज को ऊंचा करने में नहीं है बल्कि बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी भावनाओं का निरीक्षण करने में निहित है।
जब बुद्धि पर अहंकार का नियंत्रण हो जाता है तो सत्य को देखने की दृष्टि पूरी तरह लुप्त हो जाती है। इसके विपरीत जब आध्यात्मिक विवेक जाग्रत होता है तो मनुष्य के भीतर विनम्रता का समावेश होता है।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥
इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि जो मनुष्य अहंकार, बल, घमंड, वासना और क्रोध के आश्रित हैं वे अपने तथा दूसरों के शरीरों में स्थित अंतर्यामी परमात्मा से द्वेष करते हैं। जब तक व्यक्ति "मैं" और "मेरा" के संकुचित घेरे में बंधा रहता है तब तक वह क्रोध की अग्नि से बच नहीं सकता। जैसे ही मनुष्य इस मिथ्या अहंकार से दूरी बनाता है वैसे ही उसके भीतर क्षमा और करुणा का संचार होने लगता है। समर्पण के उस परम मौन में हृदय उस सत्य को स्वीकार कर लेता है जिसे अशांत बुद्धि कभी नहीं समझ सकती कि शांति परिस्थितियों को नियंत्रित करने से नहीं बल्कि उन्हें ईश्वर पर छोड़ने से मिलती है।
सच्ची मानसिक शक्ति इस बात से नहीं मापी जाती कि कोई व्यक्ति दूसरों पर कितना नियंत्रण रखता है। इसका आकलन तो इस बात से होता है कि जब चारों ओर परिस्थितियां विपरीत हों तब भी व्यक्ति भीतर से कितना स्थिर रहता है।
गीता का मुख्य संदेश यही है कि मनुष्य को सुख और दुःख, लाभ और हानि तथा जय और पराजय में एक समान रहना चाहिए। यही समत्व योग है जो मनुष्य को आंतरिक रूप से इतना सुदृढ़ बना देता है कि क्रोध जैसी विनाशकारी भावनाएं उसके भीतर प्रवेश ही नहीं कर पातीं।
कुरुक्षेत्र के महासंग्राम के प्रारंभ होने से ठीक पहले अर्जुन का मन अत्यंत व्याकुल, क्रोधित और भ्रमित था। उनके हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा था और यह स्थिति किसी शारीरिक भय के कारण नहीं थी बल्कि इसलिए थी क्योंकि उनकी तीव्र भावनाओं ने उनके विवेक को पूरी तरह ढक लिया था। ऐसी विकट परिस्थिति में भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने उन पर क्रोध नहीं किया और न ही उन्हें कोई कटु वचन कहे।
इसके विपरीत उन्होंने मुख पर एक मंद मुस्कान लाते हुए अर्जुन को ज्ञान का उपदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल प्रतिक्रिया देना अज्ञानता का लक्षण है जबकि परिस्थिति को समग्रता से समझना ही ज्ञान है। जब वाणी में धैर्य और श्रवण में करुणा का समावेश होता है तो मनुष्य आंतरिक द्वंद्व के चक्रव्यूह से सहज ही बाहर निकल आता है।
अनेक अवसरों पर क्रोध दूसरों के कृत्यों के कारण नहीं आता बल्कि वर्तमान परिस्थिति के प्रति हमारे भीतर छिपे कड़े प्रतिरोध से उत्पन्न होता है। मनुष्य प्रायः यथार्थ को स्वीकार करने से मना कर देता है और यह कामना करता है कि जीवन उसकी इच्छा के अनुसार चले।
श्रीकृष्ण कर्मयोग के माध्यम से एक उच्चतर मार्ग दिखाते हैं जिसके अनुसार मनुष्य को पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य करना चाहिए परंतु उसके परिणाम के प्रति किसी भी प्रकार की व्याकुलता या आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। जब व्यक्ति जीवन को अपनी शर्तों पर चलाने का हठ छोड़ देता है और ईश्वर की इच्छा पर अटूट विश्वास करने लगता है तब परम शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। यह स्वीकार्यता का भाव कोई कायरता या आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि यह अंतरात्मा की अत्यंत शुद्ध और शक्तिशाली अवस्था है।
भगवान श्रीकृष्ण के वचन हमें निरंतर सचेत करते हैं कि क्रोध कोई शक्ति नहीं है बल्कि यह शक्ति के छलावे में छिपा हुआ आत्म-विनाश का एक साधन है। हम इसे जितना अधिक पालते हैं यह हमें भीतर से उतना ही अधिक खोखला करता जाता है।
वास्तविक आनंद क्रोध से भागने में नहीं बल्कि उसके मूल कारण को पहचान कर उसे जड़ से समाप्त करने में है। श्रीमद्भगवद्गीता हमें सिखाती है कि इच्छाओं की अपूर्णता और सांसारिक आसक्ति ही क्रोध की जननी है। जब हम कुछ क्षण रुककर अपनी भावनाओं का तटस्थ होकर निरीक्षण करते हैं तो क्रोध स्वतः ही विलीन हो जाता है और उसका स्थान शाश्वत चेतना ले लेती है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार क्रोध की उत्पत्ति का मुख्य कारण क्या है?
भगवद्गीता के अनुसार क्रोध की उत्पत्ति का मुख्य कारण सांसारिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति और इच्छाओं का पूरा न होना है। जब मनुष्य की किसी कामना में बाधा आती है तो उसके अहंकार को ठेस पहुंचती है जिससे क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोध आने पर तात्कालिक रूप से मानसिक संतुलन कैसे प्राप्त करें?
क्रोध आने पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के स्थान पर कुछ क्षणों का मौन धारण करना चाहिए। गहरी और लंबी श्वास लेने से शरीर में प्राण वायु का संतुलन बनता है जिससे उत्तेजित तंत्रिका तंत्र शांत होता है और विवेक पुनः जाग्रत हो जाता है।
अहंकार और क्रोध के आपसी संबंध को गीता में कैसे स्पष्ट किया गया है?
गीता के अनुसार अहंकार ही क्रोध का पोषण करता है। जब मनुष्य स्वयं को कर्ता मानकर सब कुछ अपने नियंत्रण में रखने का प्रयास करता है और परिस्थितियां उसके अनुसार नहीं होतीं तो उसका अहंकार आहत होता है जो तीव्र क्रोध के रूप में बाहर आता है।
क्या क्रोध को दबाना ही आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति का लक्षण है?
नहीं, क्रोध को बलपूर्वक दबाना आध्यात्मिक मार्ग नहीं है क्योंकि दमित क्रोध भीतर ही भीतर मनुष्य को रोगग्रस्त बनाता है। गीता हमें क्रोध को दबाने के स्थान पर सजगता और ज्ञान के माध्यम से उसे शांत करने तथा सकारात्मक ऊर्जा में बदलने का उपदेश देती है।
ज्योतिष और गीता के अनुसार शांत स्वभाव विकसित करने के सर्वोत्तम उपाय क्या हैं?
शांत स्वभाव के लिए प्रतिदिन ध्यान करना, कर्मों के फलों के प्रति आसक्ति का त्याग करना और ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना सर्वोत्तम है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चंद्रमा और मंगल को अनुकूल करने के लिए सात्विक भोजन और प्राणायाम अत्यंत लाभकारी होते हैं।
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