By पं. नीलेश शर्मा
बारह भावों की दिशा, ग्रहों की दिशा, मंगल, शुक्र, शनि, बृहस्पति की दिशा और वास्तु से जुड़ी जानकारी

वैदिक ज्योतिष में कुंडली को केवल समय का चित्र नहीं माना जाता बल्कि इसे दिशा का मानचित्र भी समझा जाता है। बारह भाव जीवन के अलग अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रत्येक भाव किसी न किसी दिशा से जुड़ा होता है। उसी ढांचे के भीतर ग्रहों की दिशा और ग्रहों की दिग्पाल की अवधारणा काम करती है।
बारह भावों की दिशा को एक सारणी में रखा जाए तो चित्र साफ दिखने लगता है।
| भाव | दिशा | प्रमुख विषय |
|---|---|---|
| प्रथम भाव | पूर्व | शरीर, व्यक्तित्व, शुरुआत |
| द्वितीय भाव | उत्तर पूर्व | धन, वाणी, कुटुंब |
| तृतीय भाव | उत्तर पूर्व | साहस, लेखन, छोटे भाई बहन |
| चतुर्थ भाव | उत्तर | घर, माता, भावनात्मक आधार |
| पंचम भाव | उत्तर पश्चिम | संतान, बुद्धि, रचनात्मकता |
| षष्ठ भाव | उत्तर पश्चिम | रोग, सेवा, दिनचर्या |
| सप्तम भाव | पश्चिम | विवाह, साझेदारी, जनसंपर्क |
| अष्टम भाव | दक्षिण पश्चिम | परिवर्तन, आयु, गुप्त विषय |
| नवम भाव | दक्षिण पश्चिम | धर्म, भाग्य, गुरु |
| दशम भाव | दक्षिण | कर्म, करियर, प्रतिष्ठा |
| एकादश भाव | दक्षिण पूर्व | लाभ, मित्र, इच्छाएं |
| द्वादश भाव | दक्षिण पूर्व | व्यय, एकांत, मोक्ष की दिशा |
इसी आधार पर ग्रहों की दिशा और बारह भावों की दिशा को जोड़कर देखा जाता है। अलग अलग दिशा में अलग अलग ग्रहों की ऊर्जा सक्रिय हो जाती है और वहीं से कुंडली की असली धड़कन समझ में आती है।
पूर्व दिशा को वैदिक परंपरा में सबसे शुभ दिशा माना गया है। यहीं से सूर्य उदित होता है, यहीं से दिन की शुरुआत मानी जाती है और अंधकार के बाद प्रकाश लौटता है। ज्योतिष में यही दिशा प्रथम भाव से जुड़ती है, जो स्वयं, शरीर, स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और शुरुआत का भाव है।
सूर्य को पूर्व का स्वामी माना जाता है। सूर्य जीवन शक्ति और आत्मचेतना का कारक ग्रह है। सूर्य की दिशा में होने वाली ऊर्जा व्यक्ति को स्पष्टता, उद्देश्य और पहचान देती है। जब कुंडली में प्रथम भाव मजबूत हो या उदय लग्न पर शुभ ग्रह हों, तो व्यक्ति के अंदर स्वाभाविक नेतृत्व, स्पष्ट पहचान और दूसरों पर प्रभाव डालने की क्षमता दिखाई देती है।
दैनिक जीवन में पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठने की परंपरा केवल धार्मिक भावना नहीं है। यह कुंडली दिशा को ध्यान में रखकर बनी सजग आदत है।
वास्तु की दृष्टि से भी घर का पूर्व भाग खुला, स्वच्छ और प्रकाश से भरा होना शुभ माना जाता है। यदि यह हिस्सा बहुत बंद या भरा हुआ हो, तो कई बार आत्मविश्वास, प्रेरणा और जीवन की दिशा को लेकर उलझन अधिक महसूस होने लगती है।
उत्तर पूर्व दिशा को ईशान कोण कहा जाता है। इसे घर और जीवन दोनों का सबसे सात्त्विक और पावन क्षेत्र माना गया है। इस दिशा का संबंध द्वितीय भाव और तृतीय भाव से जोड़कर देखा जाता है। द्वितीय भाव धन, वाणी, कुटुंब, भोजन और मूल्य प्रणाली का भाव है। तृतीय भाव साहस, संचार, लेखन, छोटे भाई बहन और स्वयं के प्रयास का संकेत देता है।
इस उत्तर पूर्व दिशा पर गुरु या बृहस्पति का अधिकार माना जाता है। बृहस्पति बुद्धि, धन, धर्म और विस्तार देने वाला ग्रह है। जब द्वितीय और तृतीय भाव शुभ हों, या बृहस्पति इन भावों या उत्तर पूर्व दिशा से जुड़े हों, तो व्यक्ति के लिए परिवार का वातावरण सुदृढ़, वाणी मधुर, मूल्य स्पष्ट और प्रयास सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।
| दिशा | संबद्ध भाव | ग्रह | जीवन क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| उत्तर पूर्व | द्वितीय, तृतीय | बृहस्पति | धन, वाणी, साहस, शिक्षा |
वास्तु में इस दिशा को पूजा कक्ष, ध्यान, अध्ययन और पुस्तकालय के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उत्तर पूर्व को साफ, हल्का और पवित्र रखना ज्ञान, धन और नैतिक मजबूती के लिए सहायक माना गया है। रोजमर्रा की साधना में भी यदि मंत्रजप, गुरु संबंधी प्रार्थना या ज्ञान की इच्छा हो, तो उत्तर पूर्व की ओर मुख करके बैठना विशेष फलदायी माना जाता है।
उत्तर दिशा का संबंध चतुर्थ भाव से जोड़ा जाता है। चतुर्थ भाव घर, माता, भावनात्मक सुरक्षा, स्थायी संपत्ति, वाहन और औपचारिक शिक्षा का भाव है। इस दिशा पर बुध का प्रभाव माना जाता है। बुध बुद्धि, विश्लेषण, व्यापार और संवाद का ग्रह है।
जब चतुर्थ भाव और उत्तर दिशा संतुलित हों, तो व्यक्ति को घर के भीतर स्थिरता, मानसिक शांति और पढ़ाई लिखाई में सहूलियत महसूस होती है। बुध की स्पष्ट सोच और उत्तर दिशा की शीतलता मिलकर परिवार में संवाद को बेहतर बनाते हैं।
कुंडली के स्तर पर देखा जाए तो कुंडली के चतुर्थ भाव को आधार स्तंभ माना जाता है। जब यहां बुध या अन्य शुभ ग्रह हों, तो भावनात्मक परिपक्वता के साथ तार्किक निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
उत्तर पश्चिम दिशा चंद्र से संबंधित मानी जाती है। चंद्र मन, भावना, कल्पना और उतार चढ़ाव का ग्रह है। इस दिशा का संबंध पंचम भाव और षष्ठ भाव से जोड़ा जाता है। पंचम भाव संतान, बुद्धि, रचनात्मकता, विद्या और पूर्व जन्म के संस्कार का भाव है। षष्ठ भाव रोग, शत्रु, सेवा, ऋण और रोजमर्रा की चुनौतियों का क्षेत्र है।
यह क्षेत्र हवा प्रधान माना जाता है। चंद्र की तरह यहां की ऊर्जा भी चलायमान और बदलती प्रकृति की होती है। पंचम भाव के स्तर पर यह दिशा रचनात्मकता, संतान सुख और अध्ययन में लचीलापन दे सकती है। षष्ठ भाव के स्तर पर यही दिशा स्वास्थ्य, दिनचर्या और जिम्मेदारियों के उतार चढ़ाव को दिखाती है।
| दिशा | भाव | ग्रह | संकेत |
|---|---|---|---|
| उत्तर पश्चिम | पंचम | चंद्र | भावनात्मक बुद्धि, संतान, रचनात्मकता |
| उत्तर पश्चिम | षष्ठ | चंद्र | सेवा, दिनचर्या, मानसिक तनाव की संभावना |
वास्तु में उत्तर पश्चिम को अतिथि कक्ष, अस्थायी रहने वाले लोगों के कमरे या चलायमान कार्यों के लिए उपयोगी माना गया है। ध्यान के लिए यह दिशा सामान्यतः स्थिर नहीं मानी जाती, पर भावनात्मक डायरी लिखने, परामर्श या मन में चल रहे बदलावों को समझने के लिए यह क्षेत्र उपयोगी हो सकता है।
पश्चिम दिशा अस्त होते सूर्य की दिशा है। यही वह स्थान है जहां दिन का कार्य पूरा होता है और संबंधों की परीक्षा होती है। सप्तम भाव इसी पश्चिम दिशा से जुड़ा माना जाता है। सप्तम भाव विवाह, साझेदारी, अनुबंध, व्यापारिक संबंध और जनसंपर्क का भाव है।
शनि को पश्चिम दिशा का ग्रह माना जाता है। शनि अनुशासन, समय, कर्म और जिम्मेदारी से जुड़ा ग्रह है। जब सातवां भाव और पश्चिम दिशा मजबूत हों, तो संबंधों में स्थिरता, दीर्घकालिक साझेदारी और परिपक्व व्यवहार देखने को मिलता है। यदि शनि या सप्तम भाव कमजोर हों, तो विवाह में देरी, रिश्तों में परीक्षा या अनुबंधों में तनाव की स्थिति बन सकती है।
| दिशा | भाव | ग्रह | जीवन क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| पश्चिम | सप्तम | शनि | विवाह, साझेदारी, सार्वजनिक छवि |
वास्तु में पश्चिम दिशा को बुजुर्गों के कमरे, गंभीर कार्यस्थल या अनुशासित गतिविधियों के लिए उचित माना जाता है। यह क्षेत्र बहुत हल्के मनोरंजन या अत्यधिक भोग के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है। व्यावहारिक स्तर पर जब गंभीर निर्णय, अनुबंध या धैर्य की आवश्यकता हो, तो पश्चिम दिशा की ओर मुख करके साधना या प्रार्थना करना शनि दिशा से सामंजस्य बैठाने का सरल उपाय माना जाता है।
दक्षिण पश्चिम दिशा को अत्यंत गूढ़ और गहरी ऊर्जा वाला क्षेत्र माना गया है। इस दिशा पर राहु का प्रभाव माना जाता है। राहु छाया ग्रह है, जो तीव्रता, छिपी इच्छाएं, उलझन और तेज बदलाव का संकेत देता है। इसी दिशा से अष्टम भाव और नवम भाव को जोड़ा जाता है।
अष्टम भाव आयु, गुप्त विषय, आकस्मिक घटनाएं, साझा संसाधन और गहन परिवर्तन का भाव है। नवम भाव धर्म, भाग्य, गुरु, उच्च शिक्षा और लंबी यात्राओं से जुड़ा है। दोनों भाव मिलकर जीवन में ऐसे अनुभव लाते हैं जो व्यक्ति को भीतर से बदलते हैं। दक्षिण पश्चिम की ऊर्जा सही ढंग से संभाली जाए तो स्थिरता, संरक्षण और गहरी समझ मिलती है। गलत उपयोग होने पर मानसिक तनाव, कानूनी उलझन या असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।
वास्तु में दक्षिण पश्चिम को मुख्य शयनकक्ष या घर के बड़े जिम्मेदार व्यक्ति के कमरे के लिए उत्तम माना गया है। यहां पूजा घर या रसोई बनाने की सलाह नहीं दी जाती। यह क्षेत्र जितना स्थिर, भारी और सुरक्षित रखा जाए, उतना ही अच्छा माना जाता है।
दक्षिण दिशा का संबंध दशम भाव से जोड़ा जाता है। यह कर्म, करियर, सामाजिक प्रतिष्ठा, उत्तरदायित्व और सार्वजनिक जीवन का भाव है। इस दिशा पर मंगल का प्रभाव माना जाता है। मंगल ऊर्जा, साहस, कार्य क्षमता और प्रतिस्पर्धा का ग्रह है और मंगल ग्रह की दिशा के संदर्भ में इसे दक्षिण से जोड़ा जाता है।
दशम भाव कुंडली का ऊपरी भाग है, जहां से व्यक्ति की सार्वजनिक छवि और कर्म क्षेत्र दिखता है। जब यहां शुभ ग्रह हों या मंगल संतुलित रूप में जुड़ा हो, तो कार्यक्षेत्र में प्रगति, नेतृत्व और स्पष्ट निर्णय लेने की क्षमता दिखाई देती है। असंतुलित मंगल करियर में अनावश्यक विवाद, जल्दबाजी या तनाव भी दे सकता है।
| दिशा | भाव | ग्रह | विषय |
|---|---|---|---|
| दक्षिण | दशम | मंगल | करियर, कर्म, नेतृत्व |
वास्तु में दक्षिण दिशा को पूरी तरह निषेध नहीं माना गया बल्कि मजबूत नींव और अनुशासन की आवश्यकता मानी गई है। जिस स्थान पर अत्यधिक काम, व्यायाम या सक्रियता हो, उसे दक्षिण दिशा से जोड़ना कई बार सहायक होता है। ध्यान या विश्राम के लिए यह दिशा कम उपयुक्त मानी जाती है।
दक्षिण पूर्व दिशा पर शुक्र का प्रभाव माना जाता है। शुक्र सौंदर्य, आनंद, संबंध, रचना और भोग के संकेतक ग्रह हैं। यह दिशा एकादश भाव और द्वादश भाव से जुड़ती है। एकादश भाव लाभ, मित्र, बड़े लक्ष्य और आकांक्षाओं का भाव है। द्वादश भाव व्यय, त्याग, एकांत, निद्रा और मोक्ष की दिशा का भाव है।
दक्षिण पूर्व को अग्नि कोण माना गया है। यहां आग, ऊर्जा और सौंदर्य का मिलाजुला स्वरूप दिखाई देता है। यदि यह दिशा अत्यधिक उत्तेजित हो जाए, तो अनावश्यक व्यय, बेचैनी या भोग में अतिशयता बढ़ सकती है। संतुलित रूप में रहने पर यह दिशा रचनात्मकता, लाभ और सांस्कृतिक जीवन को समर्थन दे सकती है।
| दिशा | भाव | ग्रह | संकेत |
|---|---|---|---|
| दक्षिण पूर्व | एकादश, द्वादश | शुक्र | लाभ, व्यय, रचनात्मकता, त्याग |
वास्तु में दक्षिण पूर्व को रसोई, रचनात्मक कार्यस्थल या सुंदरता से जुड़े कार्यों के लिए उपयुक्त माना गया है। यहां शयनकक्ष केवल सावधानी के साथ ही बनाया जाना उचित समझा जाता है। प्रकाश, रंग और सजावट को यहां संतुलित और सौम्य रखना आवश्यक माना गया है।
ग्रहों की दिशा जैसे विषय तब अधिक स्पष्ट होते हैं जब बारह भावों और दिशाओं का ढांचा सामने हो। सूर्य पूर्व, बृहस्पति उत्तर पूर्व, बुध उत्तर, चंद्र उत्तर पश्चिम, शनि पश्चिम, राहु दक्षिण पश्चिम, मंगल दक्षिण और शुक्र दक्षिण पूर्व से जुड़े समझे जाते हैं। जब कोई ग्रह अपने अनुकूल दिशा वाले भाव में स्थित होता है, तो उसका प्रभाव अधिक स्पष्ट और मजबूत दिखाई देता है।
12 कुंडली के भावों को उनकी दिशाओं के साथ देखा जाए तो कई व्यावहारिक संकेत मिल सकते हैं।
इस तरह वास्तु और दिशाएं केवल सिद्धांत नहीं बल्कि रोजमर्रा के निर्णयों, साधना की दिशा और वास्तु की व्यवस्था तक एक सतत मार्गदर्शन देने लगते हैं।
1. क्या ग्रहों की दिशा बदलने से भावों की दिशा भी बदल जाती है
ग्रहों की दिशा उनकी दिग्बल और स्वाभाविक संबंध से समझी जाती है। भावों की दिशा स्थिर रहती है। प्रथम भाव हमेशा पूर्व, सप्तम पश्चिम, चतुर्थ उत्तर और दशम दक्षिण से जुड़े रहते हैं। ग्रह केवल इन दिशाओं में अपनी शक्ति को अलग ढंग से व्यक्त करते हैं।
2. ज्योतिष में मंगल की दिशा क्या मानी गयी है
मंगल की दिशा दक्षिण मानी जाती है। दशम भाव और दक्षिण दिशा के संयोजन में मंगल करियर, साहस और कर्म क्षेत्र में ऊर्जा देता है। संतुलन न हो तो विवाद या जल्दबाजी भी बढ़ा सकता है।
3. ज्योतिष में शुक्र की दिशा का जीवन पर क्या असर होता है
शुक्र की दिशा दक्षिण पूर्व मानी जाती है। यह क्षेत्र लाभ, इच्छाएं, व्यय और सौंदर्य से जुड़ता है। जब शुक्र संतुलित हो तो कला, संबंध और वित्तीय लाभ में मदद करता है। असंतुलन होने पर भोग, व्यय और असंतुष्टि बढ़ सकती है।
4. ज्योतिष में शनि की दिशा क्या बताती है
शनि की दिशा पश्चिम मानी जाती है, जो सप्तम भाव से जुड़ी है। यह विवाह, साझेदारी और सार्वजनिक छवि में अनुशासन, समयबद्धता और जिम्मेदारी का सबक सिखाती है। मजबूत शनि दीर्घकालिक संबंध दे सकता है, कमजोर शनि परीक्षाएं बढ़ा सकता है।
5. वास्तु के अनुसार दिशाओं को दैनिक जीवन में कैसे उपयोग किया जा सकता है
दैनिक साधना, बैठने की दिशा, अध्ययन, वित्तीय योजना या प्रार्थना के समय संबंधित दिशा की ओर मुंह करके बैठना उपयोगी माना जाता है। उदाहरण के लिए करियर पर ध्यान हो तो दक्षिण की ओर, संबंध सुधार की इच्छा हो तो पश्चिम की ओर और ज्ञान तथा धन प्रवाह पर ध्यान हो तो उत्तर पूर्व की ओर ध्यान देना शुभ माना जाता है।
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