By पं. अभिषेक शर्मा
घर में भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी को सही दिशा, ऊँचाई और विधि से स्थापित करने के सरल वास्तु उपाय

जब घर में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं तब केवल सजावट नहीं होती, पूरे घर की ऊर्जात्मक धारा बदल जाती है। वैदिक परंपरा में विष्णु को पालनकर्ता और संतुलन का प्रतीक माना गया है और लक्ष्मी जी समृद्धि, शुद्धता और सौभाग्य की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। यदि इन दोनों की मूर्ति या चित्र उचित वास्तु नियमों के अनुसार रखे जाएँ, तो घर में आध्यात्मिक शांति, आर्थिक स्थिरता और मानसिक संतुलन एक साथ प्रबल होने लगते हैं। यदि नियमों की उपेक्षा हो जाए, तो पुण्य‑भाव होने के बावजूद अपेक्षित फल कम हो सकते हैं। यही कारण है कि परंपरा ने दिशा, ऊँचाई, सामग्री और पूजा‑विधान तक के लिए सूक्ष्म संकेत दिए हैं।
नीचे पाँच प्रमुख वास्तु शास्त्र नियमों को विस्तार से समझा गया है, जिनका पालन करने से भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की कृपा घर के हर कोने तक सहजता से पहुँच सकती है।
वास्तु और पुराणिक परंपरा दोनों यह मानती हैं कि भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी का संग ही पूर्णता का प्रतीक है। विष्णु पालन और संतुलन के प्रतीक हैं और लक्ष्मी शुद्ध समृद्धि की। जब दोनों साथ विराजमान होते हैं तब भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की कृपा एक साथ सक्रिय होती है।
अलग‑अलग रखी गई प्रतिमाओं से ऊर्जा विभाजित हो सकती है। इसलिए शास्त्र यही संकेत देते हैं कि विष्णु‑लक्ष्मी को एक ही आसन या एक ही चौकी पर साथ रखा जाए। सामान्य नियम यह है कि यदि आप सामने से देखें, तो विष्णु जी आपकी दाईं ओर और लक्ष्मी जी आपकी बाईं ओर विराजें। इससे परिवार को संरक्षण, न्याय, संतुलन के साथ‑साथ धन, सौभाग्य और सौम्यता की संयुक्त आभा मिलती है।
| पक्ष | विष्णु की ऊर्जा | लक्ष्मी की ऊर्जा | संयुक्त प्रभाव |
|---|---|---|---|
| मानसिक | धैर्य, संतुलन, धर्मपालन | प्रसन्नता, सहज विश्वास | तनाव में कमी, मन की स्थिरता |
| पारिवारिक | संरक्षण, संबंधों की मर्यादा | प्रेम, सामंजस्य | झगड़ों में कमी, मधुरता |
| आर्थिक | न्यायसंगत कमाई, स्थिरता | समृद्धि, अवसर | धन का सदुपयोग, व्यर्थ व्यय में कमी |
इस प्रकार जब घर के पूजा स्थान पर यह दिव्य युगल सही तरीके से स्थापित होता है, तो परिवारजन अवचेतन रूप से भी संतुलित जीवन की ओर प्रेरित होते हैं।
वास्तु शास्त्र के अनुसार पूर्व या ईशान दिशा (उत्तर‑पूर्व) भगवान विष्णु की प्रतिमा के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। यह दिशा देवताओं की दिशा कही गई है, जहाँ से सूक्ष्म रूप से दिव्य ऊर्जा का प्रवाह घर के भीतर आता है। यदि पूजा स्थान पूर्व या उत्तर‑पूर्व में बने और वहीं विष्णु‑लक्ष्मी विराजें, तो पूरे घर में हल्की, शांत और निर्मल तरंगें व्याप्त रहती हैं।
यदि घर में अलग पूजा कक्ष न हो, तो बैठक का कोई स्वच्छ, शांत और कम उपयोग में आने वाला भाग चुना जा सकता है। ध्यान रहे कि प्रतिमाएँ सीढ़ियों के नीचे, शौचालय के पास, भंडार के कोने में या ऐसे स्थान पर न हों जहाँ अधिक शोर, अव्यवस्था या नमी हो। इस प्रकार के स्थानों की ऊर्जा देवस्थल की शुद्धता से मेल नहीं खाती। साथ ही, सामान्यतः यह भी सुझाव दिया जाता है कि भगवान का मुख दक्षिण की ओर न रहे, क्योंकि वह दिशा देव‑स्थापना के लिए कमजोर मानी जाती है।
इस प्रकार दिशा और स्थान दोनों के संतुलन से घर की सूक्ष्म ऊर्जा सुव्यवस्थित होती है।
ऊँचाई केवल सजावट का विषय नहीं, सम्मान का भी संकेत है। जिसे हम श्रद्धा से ऊपर मानते हैं, उसे प्रतीक रूप में ज़मीन से ऊपर ही स्थापित करते हैं। इसलिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि विष्णु‑लक्ष्मी की मूर्तियाँ सीधे फर्श पर न रखी जाएँ। उन्हें किसी साफ चौकी, अलमारी, मंदिर या आसन पर स्थापित किया जाए।
वास्तु मत के अनुसार लकड़ी या संगमरमर का आसन विशेष रूप से शुभ माना गया है। यह आसन बहुत अधिक ऊँचा भी न हो और बहुत नीचे भी नहीं। एक सरल तरीका यह है कि जब आप आसन पर बैठकर पूजा करें, तो भगवान की आँखें आपके नेत्रों से थोड़ी ऊपर आएँ। इससे प्रतीक रूप में यह भावना बनती है कि मार्गदर्शन ऊपर से आ रहा है और भक्त विनम्र भाव में बैठा है।
जब ऊँचाई और आसन सही हों, तो पूजा करते समय मन स्वाभाविक रूप से श्रद्धा के भाव में स्थित हो जाता है।
वास्तु शास्त्र प्राकृतिक और शुद्ध सामग्री को देव प्रतिमाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ मानता है। लकड़ी, पीतल, कांसा और संगमरमर से बनी मूर्तियाँ सामान्यतः शुभ मानी जाती हैं। संगमरमर की प्रतिमाएँ शीतलता, दीर्घायु और पवित्रता का भाव रखती हैं, वहीं धातु की प्रतिमाएँ स्थिरता और आभा का प्रतीक मानी जाती हैं।
पूजा स्थान की सादगी भी उतनी ही आवश्यक है। वहाँ अधिक सामान, रसीदें, पुराने फूल, टूटे दीपक या अनुपयोगी वस्तुएँ जमा न होने दें। जैसे‑ही पूजा स्थान पर प्रवेश हो, भीतर एक हल्की शांति और श्रद्धा का भाव स्वतः उठना चाहिए। ताज़े फूल, सुगंधित धूप या अगरबत्ती और घी के दीपक से वहाँ की हवा को निर्मल और सकारात्मक रखा जा सकता है।
प्रकाश भी यहाँ बहुत महत्त्वपूर्ण है। सुबह और संध्या के समय दीपक जलाकर यदि विष्णु‑लक्ष्मी के समक्ष शांत चित्त से बैठा जाए, तो वह प्रकाश केवल कमरे को नहीं, मन में जमी उदासी, भय और भ्रम को भी धीरे‑धीरे कम करने लगता है।
वास्तु मत यह संकेत देता है कि पूजा कक्ष में अत्यधिक देवी‑देवताओं की प्रतिमा या चित्र रख देने से ध्यान‑ऊर्जा बिखर सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य देव रूप न रखें बल्कि यह कि मुख्य केन्द्रीय ध्यान सीमित रूपों पर रहे। यदि विष्णु‑लक्ष्मी मुख्य आराध्य हैं, तो उनके अतिरिक्त दो‑तीन पूरक रूप रखे जा सकते हैं, जैसे चक्र, शंख या गरुड़ का प्रतीक।
परंपरा यह भी कहती है कि भगवान गणेश को विष्णु‑लक्ष्मी के समीप या हल्का आगे रखना शुभ होता है। इससे बाधा‑निवारण और समृद्धि का संयुक्त योग बनता है। ध्यान रहे कि टूटी हुई, खंडित या फटी हुई प्रतिमाओं को पूजा स्थान पर न रखें। यदि कभी कोई प्रतिमा क्षतिग्रस्त हो जाए, तो उचित विधि से उन्हें respectfully हटाकर नई प्रतिमा स्थापित करना अच्छा माना जाता है।
समय के साथ‑साथ जब यह क्रम नियमित हो जाता है, तो घर का वातावरण ही बदलने लगता है। संबंधों में कोमलता, वाणी में संयम और निर्णयों में संतुलन अनुभव होना आरंभ हो जाता है।
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