By पं. नरेंद्र शर्मा
जानिए कैसे ग्रहों की पूर्ण दृष्टि कर्म और भाग्य को जोड़कर जीवन को सफल बनाती है

भारतीय ज्योतिष में ग्रहों की दृष्टि को उनके भौतिक स्थान जितना ही प्रभावशाली और महत्वपूर्ण माना गया है। महर्षि पराशर के वैदिक सिद्धांतों के अनुसार कोई ग्रह जहां बैठता है उस भाव को तो प्रभावित करता ही है लेकिन जहां वह दृष्टि डालता है उस भाव को भी पूरी तरह से सक्रिय कर देता है।
जब कुंडली में किसी केंद्र भाव के स्वामी और किसी त्रिकोण भाव के स्वामी एक दूसरे से ऐसे भावों में स्थित हों जहां से वे एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं तब दृष्टि राजयोग का निर्माण होता है। युति राजयोग में ग्रह एक ही घर में बैठकर एक साथ काम करते हैं। इसके विपरीत दृष्टि राजयोग में दो अलग अलग भावों के बीच ऊर्जा का एक मजबूत पुल बन जाता है जिससे कुंडली के दो भिन्न क्षेत्र एक साथ अत्यंत शक्तिशाली हो जाते हैं।
विषय की गहराई में जाने से पहले इस योग के मूलभूत घटकों को समझना आवश्यक है
| विवरण | ज्योतिषीय तथ्य |
|---|---|
| केंद्र भाव | प्रथम चतुर्थ सप्तम दशम (विष्णु स्थान) |
| त्रिकोण भाव | प्रथम पंचम नवम (लक्ष्मी स्थान) |
| युति का स्वरूप | एक ही भाव में ग्रहों का बैठना |
| दृष्टि का स्वरूप | दूर से एक दूसरे को पूर्ण रूप से देखना |
| योग का परिणाम | कर्म और भाग्य का संतुलित विकास |
भारतीय ज्योतिष में सभी ग्रहों को अपने स्थान से सातवें भाव पर शत प्रतिशत पूर्ण दृष्टि प्राप्त है। जब ग्रह एक दूसरे के ठीक आमने सामने होते हैं तो उनकी ऊर्जा का सीधा और सबसे शक्तिशाली आदान प्रदान होता है।
इसके अतिरिक्त कुछ ग्रहों को विशेष दृष्टियां भी प्राप्त हैं। देवगुरु बृहस्पति को पांचवीं और नौवीं दृष्टि प्राप्त है। मंगल को चौथी और आठवीं तथा शनि देव को तीसरी और दसवीं दृष्टि प्राप्त है। परस्पर पूर्ण दृष्टि का सबसे सुदृढ़ रूप तब बनता है जब दो ग्रह एक दूसरे से प्रथम और सप्तम के अक्ष पर हों।
यह स्थिति दोनों ग्रहों के बीच एक ऐसा आकर्षण पैदा करती है जो व्यक्ति के जीवन में पुरुषार्थ और दैवीय कृपा का संगम कराती है।
जब विष्णु स्थान और लक्ष्मी स्थान के स्वामी एक दूसरे को देखते हैं तो जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में अपार सफलता प्राप्त होती है। ज्योतिषीय ग्रंथों में इसके कुछ अद्वितीय स्वरूप बताए गए हैं।
यदि दशम भाव जो कर्म का स्थान है उसका स्वामी चतुर्थ भाव में बैठ जाए और नवम भाव जो भाग्य का स्थान है उसका स्वामी दशम भाव में बैठ जाए तो एक अत्यंत शुभ स्थिति बनती है। दोनों ग्रह आमने सामने होने के कारण एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं। यह स्थिति व्यक्ति को करियर में दूरगामी दृष्टि सही निर्णय क्षमता और समाज में भारी प्रतिष्ठा दिलाती है। व्यक्ति अपने क्षेत्र का नेतृत्व करता है और भाग्य हर कदम पर उसके कर्म का साथ देता है।
यदि शरीर और व्यक्तित्व का स्वामी लग्नेश सप्तम भाव में हो और बुद्धि व ज्ञान का स्वामी पंचमेश लग्न में हो तो दोनों एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखेंगे। यह योग व्यक्ति को अत्यंत प्रतिभाशाली लोक व्यवहार में कुशल और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाता है। ऐसा व्यक्ति अपनी बौद्धिक क्षमता और आकर्षण से बड़ी सफलता अर्जित करता है।
यह राजयोग व्यक्ति के जीवन में एक रिमोट कंट्रोल की तरह काम करता है। ग्रह दूर रहकर भी एक दूसरे को लगातार ऊर्जा और बल प्रदान करते हैं जिससे जीवन में स्थिरता आती है।
चूंकि दोनों ग्रह अलग अलग भावों में होते हैं इसलिए वे जीवन के दो अलग अलग आयामों को एक साथ संभालते हैं। उदाहरण के लिए यदि चतुर्थ और दशम भाव के स्वामियों में दृष्टि संबंध है तो व्यक्ति का घरेलू जीवन और व्यावसायिक जीवन दोनों साथ साथ प्रगति करते हैं। परिवार का सुख और कार्यक्षेत्र की उन्नति एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
विपरीत परिस्थितियों में जब व्यक्ति को लगता है कि कोई मार्ग नहीं बचा है तब दृष्टि राजयोग से जुड़े ग्रह अपना प्रभाव दिखाते हैं। कर्म और भाग्य के इस अदृश्य संबंध के कारण किसी बाहरी व्यक्ति या ईश्वरीय कृपा के माध्यम से बड़ा संकट टल जाता है। यह योग व्यक्ति को कभी पूरी तरह से गिरने नहीं देता।
दृष्टि राजयोग का विश्लेषण करते समय कुछ महत्वपूर्ण नियमों का गहराई से अध्ययन करना अनिवार्य है। केवल दो ग्रहों का एक दूसरे को देखना राजयोग की पूर्ण सफलता की गारंटी नहीं है।
भावों की शुभता केंद्रेश और त्रिकोणेश का दृष्टि संबंध कुंडली के शुभ भावों में होना चाहिए जैसे लग्न चतुर्थ पंचम सप्तम नवम या दशम भाव। यदि इनमें से कोई भी ग्रह छठे आठवें या बारहवें भाव में बैठकर दूसरे ग्रह को देख रहा है तो राजयोग के शुभ फलों में भारी कमी आ जाती है और सफलता अत्यंत कठिन संघर्ष के बाद ही मिलती है।
ग्रहों का बल और नीच भंग यदि दृष्टि डालने वाले ग्रहों में से कोई ग्रह नीच राशि में है तो उसकी दृष्टि कमजोर मानी जाएगी। इसके विपरीत यदि कोई ग्रह अपनी उच्च राशि या स्वराशि में बैठकर दूसरे ग्रह को देख रहा है तो वह राजयोग को अत्यंत शक्तिशाली बना देता है। नीच भंग होने पर भी ग्रह शुभ फल देने में सक्षम हो जाता है।
पाप ग्रहों का हस्तक्षेप यदि केंद्रेश और त्रिकोणेश की इस परस्पर दृष्टि के बीच राहु केतु या किसी अन्य क्रूर ग्रह का प्रभाव आ जाए तो इसे राजयोग में व्यवधान माना जाता है। ऐसे में व्यक्ति को सफलता के अंतिम क्षणों में कई बड़ी रुकावटों का सामना करना पड़ता है।
दशा और गोचर का समन्वय इस राजयोग का स्वर्णिम काल तब शुरू होता है जब कुंडली में इन दोनों दृष्टि संबंध बनाने वाले ग्रहों की संयुक्त महादशा या अंतर्दशा आती है। जब गोचर में भी वे ग्रह अनुकूल स्थिति में होते हैं तब व्यक्ति को इस योग का वास्तविक और सर्वोत्तम लाभ प्राप्त होता है।
दृष्टि राजयोग भारतीय ज्योतिष का वह अनमोल सिद्धांत है जो यह सिद्ध करता है कि दूरी ऊर्जा के प्रवाह को रोक नहीं सकती। जब कर्म का स्वामी भाग्य के स्वामी को देखता है तो वह मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि निरंतर प्रयास करने से ईश्वरीय कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
यह योग जीवन को एक दिशा देता है और व्यक्ति को उसकी पूर्ण क्षमता का अनुभव कराता है। अपनी कुंडली में उपस्थित इस ऊर्जा को समझकर और सही समय पर सही कर्म करके कोई भी मनुष्य अपने जीवन को सफलता और शांति के सर्वोच्च शिखर तक ले जा सकता है।
दृष्टि राजयोग क्या होता है? जब कुंडली के केंद्र भाव के स्वामी और त्रिकोण भाव के स्वामी दो अलग अलग भावों में बैठकर एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं तो दृष्टि राजयोग बनता है।
युति राजयोग और दृष्टि राजयोग में क्या अंतर है? युति राजयोग में ग्रह एक ही भाव में एक साथ बैठते हैं जबकि दृष्टि राजयोग में ग्रह आमने सामने या विशेष दूरी पर बैठकर एक दूसरे को देखते हैं।
क्या नीच ग्रह की दृष्टि राजयोग को कमजोर करती है? हां यदि राजयोग बनाने वाले ग्रहों में से कोई नीच राशि में है तो उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है जिससे योग का शुभ फल कम प्राप्त होता है।
दृष्टि राजयोग का जीवन पर सबसे बड़ा प्रभाव क्या है? यह योग जीवन के दो अलग अलग क्षेत्रों का एक साथ संतुलित विकास करता है और कठिन समय में अप्रत्याशित सहायता प्रदान करता है।
राजयोग का पूरा फल किस समय प्राप्त होता है? व्यक्ति को राजयोग का वास्तविक लाभ तब मिलता है जब राजयोग बनाने वाले ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा उसके जीवन में आती है।
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