By पं. अभिषेक शर्मा
जानिए कैसे विष्णु और लक्ष्मी स्थान के मिलन से बनता है सबसे शक्तिशाली राजयोग

भारतीय ज्योतिष विज्ञान में योगों का अपना एक अलग और गहरा विज्ञान है। इनमें से केंद्र त्रिकोण राजयोग को सभी योगों का राजा या मूल राजयोग माना जाता है। किसी भी कुंडली का समग्र बल इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें उपस्थित राजयोग कितने शक्तिशाली और निर्दोष हैं।
जब जीवन में व्यक्ति का अपना पुरुषार्थ अर्थात कर्म और अदृश्य दैवीय कृपा अर्थात भाग्य का आदर्श समन्वय होता है तब इस राजयोग का प्राकट्य होता है। महर्षि पराशर के बृहत् पाराशर होराशास्त्र जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार इस योग का निर्माण ब्रह्मांड की दो परम शक्तियों के मिलन से होता है।
भगवान विष्णु जो संरक्षण और पुरुषार्थ के देवता हैं तथा माता लक्ष्मी जो वैभव बुद्धि और समृद्धि की देवी हैं जब इन दोनों शक्तियों का ऊर्जात्मक संगम कुंडली के भावों के माध्यम से होता है तो मनुष्य के जीवन में साधारण से असाधारण तक की यात्रा संभव हो पाती है।
इस राजयोग की गहराई और इसके फलित होने की प्रक्रिया को समझने के लिए कुंडली के केंद्र और त्रिकोण भावों के मूल स्वभाव को समझना अत्यंत आवश्यक है।
प्रथम चतुर्थ सप्तम और दशम भावों को केंद्र कहा जाता है।
बिना मजबूत केंद्र के व्यक्ति चाहे कितना भी प्रतिभाशाली हो उसके जीवन को कोई निश्चित दिशा या ठोस आधार नहीं मिल पाता।
प्रथम पंचम और नवम भावों को त्रिकोण कहा जाता है।
बिना त्रिकोण के सहयोग के व्यक्ति की मेहनत को सही दिशा नहीं मिलती और वह जीवन भर संघर्ष ही करता रह जाता है। त्रिकोण भाव ही वह ऊर्जा देते हैं जो केंद्र के पुरुषार्थ को सफलता में बदल देती है।
भारतीय ज्योतिष का यह मूल सिद्धांत है कि जब भी किसी कुंडली में केंद्र के स्वामी अर्थात केंद्रेश और त्रिकोण के स्वामी अर्थात त्रिकोणेश का आपस में किसी भी रूप में शुभ संबंध बनता है तो वह एक अत्यंत शक्तिशाली राजयोग का निर्माण करता है।
यह संबंध व्यक्ति के जीवन के संघर्षों को न्यूनतम करके सफलता के द्वार खोलता है। यह योग बताता है कि व्यक्ति का कर्म उसके भाग्य से जुड़ गया है और अब उसके द्वारा किए गए प्रयास निष्फल नहीं जाएंगे।
ग्रहों की स्थिति दृष्टि और उनके आपस में बनने वाले संबंधों के आधार पर केंद्र त्रिकोण राजयोग मुख्य रूप से तीन रूपों में परिलक्षित होता है।
जब किसी केंद्र भाव का स्वामी और किसी त्रिकोण भाव का स्वामी कुंडली के किसी भी शुभ भाव में एक साथ आकर बैठ जाते हैं तो इसे युति राजयोग कहते हैं।
लग्न चतुर्थ पंचम नवम या दशम भाव में बनने वाली यह युति सबसे उत्तम मानी जाती है। उदाहरण के लिए यदि नवमेश जो कि भाग्य भाव का स्वामी है और दशमेश जो कि कर्म भाव का स्वामी है दशम या नवम भाव में एक साथ बैठे हों तो यह अत्यंत शक्तिशाली धर्म कर्माधिपति राजयोग बनता है।
यह योग व्यक्ति को उसके कार्यक्षेत्र में शीर्ष पर ले जाता है और उसे अपार यश प्रदान करता है।
जब केंद्रेश और त्रिकोणेश कुंडली में एक दूसरे से ऐसी दूरी पर स्थित हों कि वे एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देख रहे हों तब दृष्टि राजयोग का निर्माण होता है।
इस योग की विशेषता यह है कि दोनों ग्रह एक दूसरे के गुणों को बल देते हैं और ऊर्जा का निरंतर आदान प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए यदि पंचमेश लग्न में बैठा हो और दशमेश सप्तम भाव में हो तो वे एक दूसरे को सातवीं पूर्ण दृष्टि से देखेंगे। इस स्थिति में व्यक्ति की तीक्ष्ण बुद्धि और उसका ज्ञान उसके करियर को चमकाने का कार्य करेगा।
इसे इस समूह का सबसे शक्तिशाली और स्थायी प्रभाव देने वाला योग माना जाता है।
जब केंद्र का स्वामी त्रिकोण भाव में जाकर बैठ जाए और त्रिकोण का स्वामी केंद्र भाव में आ जाए अर्थात दोनों ग्रह आपस में स्थान विनिमय कर लें तो इसे परिवर्तन राजयोग कहते हैं।
इस स्थिति में दोनों भाव एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों पर भाग्य का अप्रत्याशित सहयोग मिलता है और उसकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति हमेशा सुदृढ़ रहती है।
किसी कुंडली में केवल राजयोग की सैद्धांतिक उपस्थिति ही पर्याप्त नहीं है। एक सफल ज्योतिषी यह देखता है कि वह योग वास्तविक जीवन में कितना फलित होगा। यह निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है
राजयोग बनाने वाले ग्रह अपनी युवा और पूर्ण अवस्था में होने चाहिए। वे बाल अवस्था वृद्ध अवस्था या मृत अवस्था में नहीं होने चाहिए। उनका अंश बल जितना मजबूत होगा राजयोग उतना ही शानदार परिणाम देगा।
यदि राजयोग बनाने वाले ग्रह उस विशेष लग्न कुंडली के लिए शुभ और कारक हैं तो परिणाम अत्यंत सकारात्मक होते हैं। यदि वे अकारक होकर यह योग बना रहे हैं तो सफलता तो मिलती है परंतु उसके साथ साथ संघर्ष भी बना रहता है।
यदि इन योगकारक ग्रहों पर राहु केतु शनि या मंगल जैसे क्रूर और पापी ग्रहों की प्रतिकूल दृष्टि हो या वे सूर्य के बहुत समीप आकर अस्त हो गए हों तो राजयोग के फलों में आंशिक या भारी कमी आ जाती है। इसे योग भंग होना भी कहा जाता है।
किसी भी राजयोग की अंतिम पुष्टि नवांश कुंडली से की जाती है। यदि लग्न में राजयोग बनाने वाले ग्रह नवांश में नीच के हो जाएं या बुरी स्थिति में हों तो योग का फल कमजोर पड़ जाता है।
यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। इस राजयोग का पूर्ण और वास्तविक लाभ व्यक्ति को तभी मिलता है जब उसकी सक्रिय आयु अर्थात करियर और विकास के वर्षों में इन संबंधित ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा आती है। यदि यह दशा बचपन या बहुत बुढ़ापे में आए तो व्यक्ति योग का पूर्ण आनंद नहीं ले पाता।
राजयोग केवल बाहरी सफलता पद या धन नहीं है। यह व्यक्ति की चेतना के विस्तार का भी प्रतीक है। जब केंद्र का कर्म और त्रिकोण का धर्म मिलते हैं तो व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी कार्य करता है।
यही कारण है कि उच्च कोटि के राजयोग वाले व्यक्ति हमेशा समाज में एक संरक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। उनका जीवन और उनका कर्म दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है। इस प्रकार भारतीय ज्योतिष में राजयोग एक पूर्ण और सार्थक जीवन का घोषणा पत्र है।
केंद्र और त्रिकोण भावों को विष्णु और लक्ष्मी स्थान क्यों कहा जाता है? केंद्र भाव पुरुषार्थ और स्थिरता देते हैं इसलिए इन्हें विष्णु स्थान कहते हैं। त्रिकोण भाव भाग्य विवेक और समृद्धि लाते हैं इसलिए इन्हें लक्ष्मी स्थान कहा जाता है।
धर्म कर्माधिपति राजयोग कैसे बनता है? जब नवम भाव अर्थात धर्म और भाग्य के स्वामी तथा दशम भाव अर्थात कर्म के स्वामी के बीच युति दृष्टि या परिवर्तन का संबंध बनता है तो यह योग निर्मित होता है।
परिवर्तन राजयोग क्या है और यह शक्तिशाली क्यों है? जब केंद्र का स्वामी त्रिकोण में और त्रिकोण का स्वामी केंद्र में बैठ जाए तो इसे परिवर्तन योग कहते हैं। यह दोनों भावों की ऊर्जा को स्थायी रूप से जोड़ देता है।
क्या कुंडली में राजयोग होने पर व्यक्ति हमेशा सफल होता है? नहीं राजयोग तभी पूर्ण सफलता देता है जब ग्रह बलवान हों पाप प्रभाव से मुक्त हों और सही उम्र में उनकी महादशा आए।
राजयोग के फल कम क्यों हो जाते हैं? यदि योग बनाने वाले ग्रह अस्त हों कमजोर अंश में हों या राहु केतु शनि आदि क्रूर ग्रहों से पीड़ित हों तो राजयोग के फल कम हो जाते हैं।
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