नवरात्र व्रत की प्राचीन पौराणिक कथा

By पं. अमिताभ शर्मा

सुमति की अटूट भक्ति और माँ दुर्गा की असीम अनुकंपा

नवरात्र व्रत की कथा और महत्व

दैवीय आराधना का आदि प्रारंभ और विधान

सनातन संस्कृति में महाशक्ति की आराधना का पर्व नवरात्र आत्मिक शुद्धि और दैवीय कृपा प्राप्ति का सबसे पावन समय माना जाता है। इस व्रत की शुरुआत कैसे हुई और किस प्रकार एक निश्छल भक्ति ने संपूर्ण मानव जाति के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया, इसकी कथा अत्यंत प्रेरणादायी है। वैदिक काल से चली आ रही इस परंपरा का विस्तृत विवरण नीचे दी गई तालिका में निहित है।

व्रत का नाम मुख्य काल अनुशंसित अनुष्ठान आधारभूत नियम
नवरात्र व्रत चैत्र और अश्विन मास कलश स्थापना, दुर्गा सप्तशती पाठ पूर्ण ब्रह्मचर्य, फलाहार, सात्विक जीवन

इस व्रत के पीछे छिपी हुई कथा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि यह मनुष्य के अटूट विश्वास और विषम परिस्थितियों में भी धर्म पर टिके रहने की जीवंत गाथा है।

एक निर्धन ब्राह्मण की अनन्य भक्ति

प्राचीन काल में एक अत्यंत शांत और धार्मिक नगर में एक निर्धन ब्राह्मण निवास करता था। वह ब्राह्मण धन से दरिद्र होने पर भी आत्मिक रूप से अत्यंत समृद्ध था क्योंकि उसका अंतःकरण भगवती दुर्गा की भक्ति से ओतप्रोत था। वह प्रतिदिन पूरी निष्ठा के साथ वैदिक रीति से पूजन और यज्ञ संपन्न करता था। समय बीतने के साथ उस ब्राह्मण के घर में एक परम तेजस्वी कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम सुमति रखा गया।

सुमति बचपन से ही अपने पिता को वेदमंत्रों का उच्चारण करते और माता दुर्गा की आरती करते देखती थी। इस धार्मिक वातावरण का प्रभाव यह हुआ कि सुमति के भीतर भी बचपन से ही भक्ति के अंकुर फूट पड़े। वह अपने पिता के साथ प्रत्येक पूजा में बैठती और श्रद्धापूर्वक मंत्रों का श्रवण करती थी। परंतु नियति इस धर्मपरायण परिवार की परीक्षा लेने की योजना बना रही थी।

कर्तव्य विस्मरण और पिता का दारुण क्रोध

एक दिन की बात है जब सुमति अपनी सहेलियों के साथ खेलने में इतनी मग्न हो गई कि वह सायंकालीन पूजा का समय भूल गई। उधर घर पर उसके पिता पूजा की थाली सजाकर सुमति की प्रतीक्षा कर रहे थे, क्योंकि सुमति के बिना उनकी पूजा अधूरी रहती थी। जब सुमति बहुत देर बाद घर लौटी, तो ब्राह्मण का धैर्य टूट गया।

क्रोध के आवेग में आकर ब्राह्मण ने सुमति से कहा कि उसने साक्षात् आदि शक्ति का अनादर किया है। उस समय उनका विवेक क्रोध के अधीन हो चुका था, जिसके कारण उन्होंने एक अत्यंत कठोर निर्णय ले लिया। उन्होंने घोषणा की कि वह सुमति का विवाह एक अत्यंत रुग्ण, दीन और असहाय पुरुष से करेंगे। यह सुनकर उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए, परंतु सुमति ने बिना किसी प्रतिवाद के अपने पिता के वचनों को नियति का आदेश मानकर स्वीकार कर लिया।

विषमता भरा विवाह और वन की यात्रा

पिता के कहे अनुसार सुमति का विवाह एक निर्धन और गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के साथ संपन्न करा दिया गया। सुमति ने बिना किसी शिकवे के अपने पिता के घर की सुख-सुविधाओं को त्याग दिया और अपने अस्वस्थ पति का हाथ थामकर एक अनिश्चित भविष्य की ओर चल पड़ी। उनके पास न तो रहने के लिए कोई निश्चित स्थान था और न ही आजीविका का कोई साधन था।

पैदल चलते हुए जब वे दोनों एक घने और निर्जन वन के मार्ग से गुजर रहे थे तब भी सुमति के मन में अपनी आराध्य देवी के प्रति अगाध श्रद्धा बनी हुई थी। वह मन ही मन माँ जगदम्बा के मंत्रों का जाप कर रही थी। उसे पूरा विश्वास था कि संसार को जीवन देने वाली माँ उसकी नैया को कभी डूबने नहीं देंगी। इसी घने वन में एक ऐसी अलौकिक घटना घटने वाली थी जो उनके भाग्य को पूर्णतः बदलने वाली थी।

महाशक्ति का प्राकट्य और अलौकिक वरदान

वन के सन्नाटे में अचानक एक तीव्र और दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। उस अलौकिक प्रकाश के मध्य साक्षात् अष्टभुजाधारी माँ दुर्गा सिंह पर सवार होकर प्रकट हुईं। सुमति माँ के इस भव्य रूप को देखकर भावविभोर हो गई और उनके चरणों में गिर पड़ी। माँ दुर्गा ने अत्यंत वात्सल्यमयी वाणी में सुमति से कहा कि वह उसकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हैं।

माँ ने सुमति को उसके पूर्वजन्म का रहस्य बताते हुए कहा कि उसने अपने पिछले जन्म में अत्यंत निष्ठा के साथ नवरात्र का पावन व्रत किया था। उस व्रत के पुण्य प्रभाव और इस जन्म की निश्छल भक्ति के कारण ही आज स्वयं महाशक्ति उसे दर्शन देने आई हैं। माँ दुर्गा ने सुमति को वरदान दिया, जिसके प्रभाव से उसी क्षण उसका पति पूर्णतः स्वस्थ और रूपवान हो गया। उनके जीवन की दरिद्रता सदा के लिए समाप्त हो गई।

मानव कल्याण के लिए व्रत की महिमा

सुमति को आशीर्वाद देने के पश्चात माँ दुर्गा ने उसे नवरात्र व्रत की महत्ता और उसकी संपूर्ण विधि समझाई। माँ ने स्पष्ट किया कि जो भी मनुष्य इन नौ पवित्र रातों में पूरी श्रद्धा और सात्विक नियमों के साथ व्रत का पालन करेगा, उसके जीवन के समस्त संताप दूर हो जाएंगे। सुमति और उसके पति की इस चमत्कारिक कथा की चर्चा धीरे-धीरे संपूर्ण आर्यावर्त में फैल गई।

लोग इस सत्य से परिचित हुए कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती है। इस घटना के बाद से ही जनमानस में नवरात्र व्रत रखने की अटूट परंपरा की शुरुआत हुई, जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं द्वारा पूरे विधि-विधान से निभाई जाती है।

## FAQ

नवरात्र व्रत की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता दुर्गा की अनन्य भक्त सुमति ने अपने पूर्वजन्म में सबसे पहले इस पवित्र व्रत का पालन किया था जिसके प्रभाव से उसे इस जन्म में साक्षात् माँ दुर्गा के दर्शन प्राप्त हुए थे।

सुमति को नवरात्र व्रत का फल किस रूप में मिला था
नवरात्र व्रत के पुण्य प्रताप से सुमति के अस्वस्थ और निर्धन पति को तात्कालिक रूप से उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त हुआ और उनके जीवन की समस्त दरिद्रता और कष्ट हमेशा के लिए समाप्त हो गए।

क्या पूर्वजन्म के कर्मों का फल नवरात्र व्रत में मिलता है
हाँ माँ दुर्गा ने स्वयं सुमति को यह बताया था कि उसके द्वारा पूर्वजन्म में किए गए नवरात्र व्रत के संचित पुण्यों के कारण ही वे वन में साक्षात् प्रकट हुईं और उसे कष्टों से मुक्ति प्रदान की।

कठिन परिस्थितियों में सुमति ने अपनी भक्ति को कैसे बनाए रखा
विवाह के बाद अत्यंत रुग्ण पति और निर्जन वन की कठिन यात्रा के समय भी सुमति ने अपने मन का संतुलन नहीं खोया और निरंतर माँ दुर्गा के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और मानसिक जप को बनाए रखा।

नवरात्र के नौ दिनों का आध्यात्मिक महत्व क्या है
नवरात्र के नौ दिन आत्मिक शुद्धि और दैवीय ऊर्जा को जाग्रत करने के सर्वोत्तम अवसर होते हैं जिसमें सात्विक जीवन अपनाकर मनुष्य अपने संचित पापों का नाश कर सकता है।

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पं. अमिताभ शर्मा

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