By पं. नीलेश शर्मा
जानिए कैसे नीच ग्रह का भंग व्यक्ति को अपमान से सम्मान और संघर्ष से राजसी सफलता तक ले जाता है

भारतीय ज्योतिष में नीचभंग राजयोग एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सिद्धांत माना गया है। फलित ज्योतिष के अनुसार जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि में होता है तो वह अपनी सकारात्मक शक्ति खो देता है और पीड़ित अवस्था में चला जाता है। किंतु यदि कुछ विशेष ग्रहों का सहयोग या दृष्टि उस पर पड़ जाए तो उस ग्रह का नीचत्व समाप्त हो जाता है। यही स्थिति नीचभंग कहलाती है और यही आगे चलकर एक शक्तिशाली राजयोग का रूप ले लेती है।
इस राजयोग का मूल दर्शन अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा है। ऐसे जातक का जीवन प्रायः सरल और सीधा नहीं होता। प्रारंभिक वर्षों में उसे अभाव अपमान और कड़े संघर्षों का सामना करना पड़ सकता है। परंतु वही कठिनाइयां उसके भीतर ऐसी अंतर्दृष्टि और क्षमता जगाती हैं कि वह अंततः राजा के समान वैभव और सम्मान प्राप्त करता है।
महर्षि पराशर और जातक पारिजात जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार किसी नीच ग्रह का नीचभंग होने के लिए कुछ विशेष स्थितियां उत्तरदायी होती हैं। नीचे इन स्थितियों का संक्षिप्त और स्पष्ट स्वरूप दिया गया है।
| परिस्थिति का नियम | ज्योतिषीय स्थिति | जीवन पर व्यावहारिक प्रभाव |
|---|---|---|
| राशिपति का केंद्र में होना | जिस राशि में नीच ग्रह बैठा है उस राशि का स्वामी लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो | बाहरी सहायता या मार्गदर्शन से भाग्य का उदय होता है |
| उच्चनाथ का केंद्र में होना | जिस राशि में ग्रह नीच है वहां उच्च ग्रह लग्न या चंद्रमा से केंद्र में हो | व्यक्ति अपनी बुद्धि और सही निर्णय से संकट दूर करता है |
| उच्च ग्रह के साथ युति | नीच ग्रह किसी उच्च ग्रह के साथ युति में हो | शक्तिशाली व्यक्ति के सहयोग से पतन रुक जाता है |
| परस्पर दृष्टि संबंध | दो नीच ग्रह एक दूसरे को 1 और 7 के अक्ष पर देखें | विपरीत परिस्थितियां टकराकर तरक्की के मार्ग खोलती हैं |
| नवमांश में उच्च होना | मुख्य कुंडली में ग्रह नीच हो पर नवमांश में उच्च राशि में चला जाए | शुरुआती जीवन कठिन रहता है पर बाद में भाग्य में बड़ा बदलाव आता है |
यदि कुंडली में बुध मीन राशि में बैठा हो जहां बुध नीच का होता है और मीन राशि का स्वामी गुरु लग्न या चंद्रमा से प्रथम चतुर्थ सप्तम या दशम भाव में स्थित हो तो बुध का नीचभंग हो जाता है।
ऐसी स्थिति में जातक अपनी शुरुआती असफलताओं से बहुत कुछ सीखता है। वह धीरे धीरे एक कुशल रणनीतिकार बनता है। उसके भीतर अवलोकन की शक्ति, निर्णय क्षमता और व्यवहारिक बुद्धि विकसित होती है। जीवन के प्रारंभ में जो कमी बाधा या भ्रम दिखाई देता है वही आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी योग्यता बन जाता है।
अब एक दूसरा उदाहरण लें। यदि सूर्य तुला राशि में नीच का होकर बैठा हो तो तुला राशि में उच्च ग्रह शनि के कारण सूर्य की कमजोरी दूर होने की संभावना बनती है। यदि शनि लग्न या चंद्रमा से केंद्र भाव में बलवान होकर स्थित हो तो सूर्य का नीचभंग राजयोग मान्य होता है।
ऐसे जातक को आरंभ में मान सम्मान की कमी या पिता के सहयोग का अभाव झेलना पड़ सकता है। कभी कभी उसका आत्मविश्वास भी परीक्षा में पड़ता है। किंतु समय के साथ वही व्यक्ति अपने दम पर ऊंचे प्रशासनिक पदों तक पहुंच सकता है। इसमें बाहरी समर्थन से अधिक उसकी आंतरिक दृढ़ता काम करती है।
यदि किसी भाव में एक नीच ग्रह और दूसरा उच्च ग्रह साथ बैठ जाएं तो भी नीचभंग की स्थिति बन सकती है। उदाहरण के लिए कन्या राशि में शुक्र नीच का होता है और बुध उच्च का होता है। यदि ये दोनों साथ स्थित हों तो यह संयोजन विशेष फल देता है।
इस स्थिति का प्रभाव यह होता है कि जातक के जीवन में संतुलन धीरे धीरे स्थापित होता है। संघर्ष तो आते हैं, पर वे लंबे नहीं टिकते। व्यक्ति परिपक्व बनता है और भीतर से अधिक सजग हो जाता है। ऐसी युति कई बार कला, व्यापार, संवाद या ज्ञान के क्षेत्र में अप्रत्याशित योग्यता भी दे सकती है।
नीचभंग राजयोग का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अपमान स्थायी नहीं होता और गिरावट अंतिम सत्य नहीं होती। जो ग्रह पहले कमजोर दिख रहा था वही परिस्थिति के सही संतुलन से असाधारण शक्ति प्रदान कर सकता है।
केवल नीचभंग की सैद्धांतिक स्थिति देखकर तुरंत राजयोग का निर्णय नहीं लेना चाहिए। इसके पूर्ण फल के लिए कुछ सूक्ष्म बिंदुओं पर विचार अनिवार्य है।
नीचभंग राजयोग का पहला चरण हमेशा कष्ट और संघर्ष होता है। यदि लग्न और लग्नेश कमजोर हैं तो जातक शुरुआती मानसिक और शारीरिक दबाव को सह नहीं पाएगा। वह अवसर आने से पहले ही हतोत्साहित हो सकता है। इसलिए मजबूत लग्न इस योग की पहली व्यावहारिक शर्त है।
यदि नीच ग्रह अपनी परम नीच अवस्था के बहुत निकट है तो उसका भंग होना अपेक्षाकृत कठिन या विलंबित हो सकता है। इसके विपरीत यदि ग्रह नीच राशि के अंतिम अंशों में है तो नीचभंग अधिक सुगमता से फलित होता है। अंश बल का यह सूक्ष्म भेद किसी भी अनुभवी ज्योतिषी को देखना ही चाहिए।
इस राजयोग का वास्तविक चमत्कार तब अनुभव होता है जब युवावस्था या करियर के महत्वपूर्ण वर्षों में उस नीचभंग होने वाले ग्रह की महादशा या अंतर्दशा आती है। यदि यह दशा बचपन में या अत्यंत वृद्धावस्था में आए तो इसका व्यावहारिक लाभ सीमित रह सकता है। सही समय पर आई दशा ही इस योग को जीवन में निर्णायक बना देती है।
नीचभंग राजयोग यह सिखाता है कि जीवन में कमजोरी भी एक प्रकार की तैयारी है। जो ग्रह पहले पीड़ित था वही परिस्थिति और समर्थन मिलने पर सामर्थ्य का द्वार बन जाता है। यह योग व्यक्ति को विनम्रता, धैर्य और समय के महत्व का बोध कराता है।
एक सशक्त नीचभंग राजयोग जातक को संघर्ष के बाद स्थायी प्रतिष्ठा, बुद्धिमत्ता और राजसी उपलब्धि दे सकता है। परंतु उसका पूर्ण फल तभी दिखाई देता है जब लग्न बलवान हो, ग्रहों के परस्पर संबंध ठीक हों और दशा चक्र अनुकूल समय पर सक्रिय हो।
नीचभंग राजयोग क्या है जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि में होकर भी विशेष ग्रहों के सहयोग से अपनी कमजोरी खो देता है तो नीचभंग राजयोग बनता है।
क्या नीच ग्रह हमेशा खराब फल देता है नहीं, यदि नीचभंग की स्थिति बन जाए तो वही ग्रह व्यक्ति को संघर्ष के बाद बड़ी सफलता भी दे सकता है।
नीचभंग में लग्न का बल क्यों जरूरी है क्योंकि इस योग का पहला चरण संघर्ष है और कमजोर लग्न वाला व्यक्ति उस दबाव को सह नहीं पाता।
नवमांश में उच्च ग्रह होने का क्या महत्व है यदि ग्रह मुख्य कुंडली में नीच हो लेकिन नवमांश में उच्च हो तो बाद के जीवन में उसका शुभ फल बहुत बढ़ जाता है।
नीचभंग राजयोग का फल कब मिलता है यह योग तब अधिक फल देता है जब उस ग्रह की महादशा या अंतर्दशा जीवन के सक्रिय वर्षों में चल रही हो।
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