पारिजात योग: कल्पवृक्ष की समृद्धि

By पं. अभिषेक शर्मा

जानिए कैसे लग्नेश और नवमांशेश का संरेखण धीमी शुरुआत के बाद शानदार अंत और राजसी ऐश्वर्य देता है

पारिजात योग क्या है: अर्थ और फल

जीवन को पूर्णता देने वाला राजसी महायोग

भारतीय ज्योतिष के शास्त्रीय ग्रंथ जातक पारिजात में वर्णित पारिजात योग एक अत्यंत प्रतिष्ठित और राजसी श्रेणी का योग है। पारिजात का अर्थ स्वर्ग के उस दिव्य वृक्ष अर्थात कल्पवृक्ष से है, जिस से मांगी गई हर इच्छा पूरी हो जाती है।

जिस जातक की कुंडली में यह दुर्लभ योग पूर्ण रूप से घटित होता है, उसका जीवन इस वृक्ष की तरह ही समृद्ध, फलदायी और दूसरों को आश्रय देने वाला होता है। यह योग विशेष रूप से जीवन के मध्य और उत्तरार्ध में व्यक्ति को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर ले जाता है। पारिजात योग व्यक्ति को धीरे धीरे लेकिन स्थायी रूप से सफल बनाता है।

पारिजात योग का सूक्ष्म गणित

यह योग सूक्ष्म कुंडली अर्थात D1 और नवमांश कुंडली अर्थात D9 के अद्भुत तालमेल से बनता है। इसे समझने के लिए तीन प्रमुख चरणों से गुजरना पड़ता है।

  • लग्नेश अर्थात Ascendant Lord: सबसे पहले लग्न कुंडली के स्वामी ग्रह को देखें।
  • लग्नेश का राशिपति अर्थात Dispositor: लग्नेश जिस राशि में बैठा है, उस राशि का जो स्वामी है, उसे पहचानें। मान लेते हैं यह ग्रह अ है।
  • नवमांशेश अर्थात Navamsha Lord: अब यह देखें कि वह ग्रह अ नवमांश कुंडली में किस राशि में गया है। उस नवमांश राशि का जो स्वामी है, उसे पहचानें। मान लेते हैं यह ग्रह ब है।

मूल शास्त्रीय नियम यह है कि यदि लग्नेश का राशिपति अर्थात ग्रह अ और वह नवमांशेश अर्थात ग्रह ब, लग्न कुंडली में केंद्र भावों अंक 1, 4, 7, 10 या त्रिकोण भावों अंक 5, 9 में स्थित हों और वहाँ वे अपनी उच्च राशि या स्वराशि में होकर बलवान हों, तो पारिजात योग का सृजन होता है।

व्यावहारिक उदाहरण से समझें

इस योग की जटिल संरचना को स्पष्ट करने के लिए एक व्यावहारिक परिस्थिति देखते हैं।

चरण खगोलीय स्थिति कुंडली में गणना
1. लग्न और लग्नेश मेष लग्न की कुंडली लग्नेश बने मंगल
2. लग्नेश का राशिपति अ मंगल कुंडली के चौथे भाव में कर्क राशि में बैठे हैं कर्क का स्वामी यानी राशिपति बने चंद्रमा
3. नवमांशेश ब चंद्रमा नवमांश कुंडली में वृषभ राशि में गए हैं वृषभ का स्वामी यानी नवमांशेश बने शुक्र

राजयोग की शर्त: अब यदि मुख्य जन्म कुंडली में चंद्रमा या शुक्र में से कोई भी या दोनों केंद्र या त्रिकोण में अपनी उच्च या स्वराशि में बैठ जाएं, जैसे शुक्र चतुर्थ भाव में मालव्य योग बनाकर बैठ जाएं या चंद्रमा लग्न में ही उच्च के हो जाएं, तो पारिजात योग पूरी शक्ति से सक्रिय हो जाता है।

जीवन पर प्रभाव: क्रमिक और भव्य उत्थान

पारिजात योग से युक्त व्यक्ति کی जीवन यात्रा बहुत प्रेरणादायी होती है।

  • धीमी शुरुआत, शानदार अंत: इस योग की मुख्य विशेषता यह है कि व्यक्ति को सब कुछ थाल में सजाकर नहीं मिलता। शुरुआती जीवन साधारण हो सकता है, लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती है विशेषकर 28 से 32 वर्ष के बाद, व्यक्ति का भाग्य कल्पवृक्ष की तरह फल देने लगता है।
  • राजा के समान ऐश्वर्य: ऐसे लोग अपने कुल खानदान में सबसे ऊंचे पद और प्रतिष्ठा पर पहुँचते हैं। इन्हें भूमि, उत्तम भवन, राजकीय सम्मान और अचल संपत्ति का पूर्ण सुख मिलता है।
  • धार्मिक और न्यायप्रिय दृष्टिकोण: चूंकि यह योग नवमांश अर्थात आत्मा की शक्ति और त्रिकोण अर्थात लक्ष्मी स्थान के जुड़ाव से बनता है, इसलिए ऐसा व्यक्ति अत्यधिक सात्विक, परोपकारी, परंपराओं का आदर करने वाला और समाज में पूजनीय होता है।
  • शत्रुहंता और विजयी: जीवन के संघर्षों या अदालती विवादों में इन की जीत हमेशा सुनिश्चित होती है। विरोधी इन के प्रभाव के सामने स्वतः शांत हो जाते हैं।

फलादेश के लिए विशेषज्ञ ज्योतिषीय बारीकियाँ

कुंडली में पारिजात योग का विश्लेषण करते समय निम्नलिखित सूक्ष्म नियमों की अनदेखी कभी नहीं करनी चाहिए।

ग्रहों का अंश बल

योग बनाने वाले दोनों मुख्य ग्रह अर्थात लग्नेश का राशिपति और नवमांशेश मृत अवस्था अर्थात 29 डिग्री या वृद्ध अवस्था में नहीं होने चाहिए। उन का बली होना ही राजयोग को धरातल पर उतारता है। अंश बल इस योग की शक्ति को तय करता है।

क्रूर ग्रहों का हस्तक्षेप

यदि इन योगकारक ग्रहों पर राहु, केतु या शनि की कोई पापी या नीच दृष्टि पड़ रही हो, तो योग का प्रभाव आंशिक रूप से दूषित हो जाता है। ऐसी स्थिति में सफलता तो मिलती है, लेकिन भारी मानसिक तनाव या स्वास्थ्य समस्याओं के बाद।

दशा चक्र का महत्व

इस योग का वास्तविक और चमत्कारी फल व्यक्ति को तब दिखाई देता है जब जीवन के सक्रिय काल में लग्नेश के राशिपति या उस नवमांशेश ग्रह की महादशा या अंतर्दशा का आगमन होता है। यह समय व्यक्ति को शून्य से उठाकर शिखर पर बैठा देता है। दशा चक्र का सही समय पारिजात योग को पूर्ण रूप से प्रकट करता है।

विभिन्न स्थितियों में पारिजात योग का प्रभाव

लग्नेश के राशिपति और नवमांशेश की स्थिति के आधार पर पारिजात योग के फल अलग अलग होते हैं।

  • केंद्र भाव में युति: यदि दोनों ग्रह केंद्र भावों में हों, तो व्यक्ति को करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा में अत्यंत तेज उन्नति मिलती है।
  • त्रिकोण भाव में युति: यदि दोनों ग्रह त्रिकोण भावों में हों, तो व्यक्ति को भाग्य और धर्म के क्षेत्र में असाधारण सफलता मिलती है।
  • उच्च राशि में बैठना: यदि दोनों ग्रह उच्च राशि में हों, तो व्यक्ति को राजसी ऐश्वर्य और भव्य जीवन प्राप्त होता है।
  • स्वराशि में बैठना: यदि दोनों ग्रह स्वराशि में हों, तो व्यक्ति को स्थिर धन और स्थायी सफलता मिलती है।

पारिजात योग का गूढ़ संदेश

पारिजात योग यह सिखाता है कि सच्ची समृद्धि धीरे धीरे लेकिन स्थायी रूप से मिलती है। यह योग कर्म और भाग्य के संतुलन पर विश्वास करता है। जब नवमांश और लग्न कुंडली में ग्रह सही संरेखण में होते हैं, तो व्यक्ति को कल्पवृक्ष की तरह समृद्धि मिलती है।

एक सशक्त पारिजात योग व्यक्ति को धीमी शुरुआत के बाद शानदार अंत, राजसी ऐश्वर्य, धार्मिक दृष्टिकोण और शत्रुओं पर विजय प्रदान करता है। परंतु इसका पूर्ण फल तभी मिलता है जब दोनों मुख्य ग्रह मृत न हों, क्रूर ग्रहों की दृष्टि न हो, अंश बल मजबूत हो और दशा चक्र सक्रिय काल में आए।

FAQ

पारिजात योग क्या है
पारिजात योग जन्म कुंडली और नवमांश कुंडली के तालमेल से बनता है, जब लग्नेश का राशिपति और नवमांशेश केंद्र या त्रिकोण में उच्च या स्वराशि में हों।

पारिजात योग का मुख्य फल क्या है
यह योग व्यक्ति को धीमी शुरुआत के बाद शानदार अंत, राजसी ऐश्वर्य, भूमि भवन सुख और समाज में पूजनीय स्थान प्रदान करता है।

क्या पारिजात योग के लिए नवमांश कुंडली देखना अनिवार्य है
हाँ, पारिजात योग के लिए नवमांश कुंडली देखना अनिवार्य है क्योंकि यह योग लग्न कुंडली और नवमांश कुंडली के तालमेल से बनता है।

पारिजात योग का प्रभाव जीवन में कब सबसे अधिक दिखाई देता है
पारिजात योग का प्रभाव जीवन के सक्रिय काल में लग्नेश के राशिपति या नवमांशेश ग्रह की महादशा या अंतर्दशा में सबसे अधिक दिखाई देता है।

क्या क्रूर ग्रहों की दृष्टि से पारिजात योग प्रभावित होता है
हाँ, यदि योगकारक ग्रहों पर राहु, केतु या शनि की पापी दृष्टि पड़ रही हो, तो पारिजात योग का प्रभाव आंशिक रूप से दूषित हो जाता है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

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