By पं. अमिताभ शर्मा
जानिए सप्तम और अष्टम भाव के खाली होने और शुभ ग्रहों के केंद्र त्रिकोण में होना अचल स्थायित्व देता है

भारतीय ज्योतिष में पर्वत योग अपने नाम के अनुरूप ही जातक के जीवन को पर्वत जैसी ऊंचाई, दृढ़ता और एक अचल स्थायित्व प्रदान करने वाला एक बेहद विशिष्ट राजयोग है।
अक्सर कुंडलियों में राजयोग होते हैं, लेकिन जीवन में उतार चढ़ाव बने रहते हैं। पर्वत योग की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह जीवन के ग्राफ को नीचे नहीं गिरने देता। जब कुंडली के सबसे संवेदनशील और संकट वाले भाव खाली हों और सारी शुभ ऊर्जा केंद्र त्रिकोण में केंद्रित हो जाए तब इस महायोग का जन्म होता है।
ऋषियों ने इस योग के निर्माण के लिए दो बेहद स्पष्ट और कड़े नियम तय किए हैं।
ज्योतिषीय सिद्धांतों के अनुसार, इस विशिष्ट ग्रहीय संरचना के पीछे एक गहरा रणनीतिक और वैज्ञानिक कारण छिपा है।
कुंडली का आठवां भाव अचानक आने वाले संकटों, दुर्घटनाओं, गंभीर बाधाओं और जीवन में आने वाले बड़े पतन का होता है। सातवां भाव मारक स्थान होने के साथ साथ बाहरी दुनिया के द्वंद्व को दिखाता है। जब ये दोनों भाव पूरी तरह खाली होते हैं, तो जीवन से अचानक आने वाली बड़ी विपत्तियों और गुप्त शत्रुओं का खतरा स्वतः ही टल जाता है।
जब जीवन को पोषण देने वाले सभी शुभ ग्रह कुंडली के सबसे मजबूत स्तंभों अर्थात लग्न, चतुर्थ, दशम, पंचम और नवम भावों में सिमट जाते हैं, तो वे जातक के चरित्र, भाग्य, सुख और कर्म स्थान को असीम शक्ति प्रदान करते हैं। यह स्थिति व्यक्ति के जीवन की नींव को इतनी मजबूती देती है कि उसे हिलाना असंभव हो जाता है।
जिस जातक की जन्मपत्रिका में यह शुद्ध पर्वत योग विद्यमान होता है, उसकी जीवन यात्रा एक महान साम्राज्य की तरह अडिग होती है।
शुभ ग्रहों की स्थिति के आधार पर केंद्र भावों में पर्वत योग के फल अलग अलग होते हैं।
कुंडली में पर्वत योग की तीव्रता और वास्तविक फल की अवधि को मापने के लिए कुछ महत्वपूर्ण नियमों का परीक्षण अनिवार्य है।
इस योग का पूर्ण व्यावहारिक लाभ उठाने के लिए यह देखना जरूरी है कि राहु, केतु, शनि या मंगल जैसे क्रूर ग्रह कुंडली के उपचय भावों अंक 3, 6, या 11 में स्थित हों। यदि ये पापी ग्रह केंद्र या त्रिकोण में बैठे शुभ ग्रहों के साथ युति बनाकर उन्हें पीड़ित करेंगे, तो पर्वत योग का प्रभाव आंशिक रूप से कमजोर पड़ जाएगा।
पर्वत योग बनाने वाले शुभ ग्रहों का अंश बल मजबूत होना आवश्यक है। यदि ये ग्रह मृत अवस्था अर्थात 29 डिग्री या बाल अवस्था अर्थात 1 डिग्री में हों, तो राजयोग के व्यावहारिक लाभ सीमित हो जाते हैं। ग्रहों का अंश बल जितना मजबूत होगा, व्यक्ति का भाग्य उतनी ही कम उम्र में चमक उठेगा।
इस महायोग का चमत्कारी और क्रांतिकारी परिणाम व्यक्ति को तब अनुभव होता है जब उसकी सक्रिय कर्मठ आयु के दौरान केंद्र या त्रिकोण में बैठे इन योगकारक शुभ ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा क्रियाशील होती है। यह समय जातक को शून्य से उठाकर समाज के शीर्ष शिखर पर स्थापित कर देता है। दशा चक्र का सही समय पर्वत योग को पूर्ण रूप में प्रकट करता है।
पर्वत योग यह सिखाता है कि स्थायी सफलता केवल धन या सत्ता प्राप्त करने में नहीं है बल्कि जीवन में अचल स्थायित्व बनाने में है। जब संकट वाले भाव खाली होते हैं और शुभ ऊर्जा केंद्र त्रिकोण में केंद्रित होती है, तो व्यक्ति को पर्वत जैसी दृढ़ता और अटूट स्थायित्व मिलता है।
एक सशक्त पर्वत योग व्यक्ति को अचल साम्राज्य, प्रशासनिक नेतृत्व, अखंड धन और परोपकारी स्वभाव प्रदान करता है। परंतु इसका पूर्ण फल तभी मिलता है जब सप्तम और अष्टम भाव खाली हों, शुभ ग्रह केंद्र त्रिकोण में हों, क्रूर ग्रह उपचय भावों में हों, अंश बल मजबूत हो और दशा चक्र सक्रिय काल में आए।
पर्वत योग क्या है जब कुंडली में सप्तम और अष्टम भाव पूरी तरह खाली हों और सभी नैसर्गिक शुभ ग्रह केवल केंद्र या त्रिकोण भावों में हों, तो पर्वत योग बनता है।
पर्वत योग का सबसे बड़ा लाभ क्या है यह योग जीवन में अचल स्थायित्व देता है। आर्थिक या सामाजिक स्तर पर कभी बड़ा पतन नहीं होता और प्रतिष्ठा पर्वत की तरह स्थिर रहती है।
क्या सप्तम और अष्टम भाव का खाली होना पर्वत योग के लिए अनिवार्य है हाँ, सप्तम और अष्टम भाव का पूरी तरह खाली होना पर्वत योग के लिए अनिवार्य है। इन घरों में कोई भी ग्रह नहीं होना चाहिए।
केंद्र भावों में शुभ ग्रहों की स्थिति से फल कैसे अलग होते हैं पहले भाव में व्यक्तित्व आकर्षक होता है, चौथे में वाहन और आवास सुख मिलता है, दसवें में करियर उन्नति होती है, पंचम में शिक्षा सफलता मिलती है और नवम में भाग्य लाभ होता है।
पर्वत योग का प्रभाव जीवन में सबसे अधिक कब दिखाई देता है जब सक्रिय कर्मठ आयु के दौरान केंद्र या त्रिकोण में बैठे योगकारक शुभ ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा क्रियाशील होती है तब पर्वत योग का प्रभाव सर्वाधिक होता है।
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