By पं. सुव्रत शर्मा
जानिए कैसे लग्नेश और चंद्रेश का संरेखण अखंड धन, प्रशासनिक योग्यता और संपूर्ण जीवन देता है

भारतीय ज्योतिष में पुष्कल का शाब्दिक अर्थ भव्य, पूर्ण, प्रचुर या बहुतायत होता है। जब कुंडली में व्यक्ति का भौतिक अस्तित्व अर्थात लग्नेश और उसके मन की चेतना को दिशा देने वाला ग्रह अर्थात चंद्रमा का राशिपति आपस में हाथ मिला लेते हैं तब पुष्कल योग का जन्म होता है।
यह योग जीवन को केवल धन ही नहीं देता बल्कि उसे एक विशेष गरिमा, उत्तम स्वास्थ्य, मधुर वाणी और समाज में राजा के समान आदरणीय स्थान प्रदान करता है। सरल शब्दों में कहें तो यह जीवन को हर मोर्चे पर पूर्णता देने वाला योग है। पुष्कल योग व्यक्ति को संपूर्णता का अनुभव कराता है।
इस योग की संरचना को समझने के लिए कुंडली के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों का विश्लेषण किया जाता है। इन दोनों के संयोजन से ही यह योग बनता है।
लग्न हमारा शरीर और कर्म है, जबकि चंद्रमा हमारा मन और इच्छाशक्ति है। जब लग्न का स्वामी और चंद्रमा को आश्रय देने वाला ग्रह एक साथ मिलकर केंद्र या विष्णु स्थान या मित्र के घर में बैठते हैं, तो व्यक्ति के विचार और उसके कार्य एक ही दिशा में संरेखित हो जाते हैं।
ऐसा व्यक्ति दुविधा में रहकर अपना समय नष्ट नहीं करता। उसकी निर्णय क्षमता बहुत सटीक होती है, जिससे वह जो भी योजना बनाता है, उसे अपनी मेहनत से धरातल पर उतारने में सफल होता है। विचार और कर्म का यह संरेखण पुष्कल योग की सबसे बड़ी ताकत है।
पुष्कल योग से युक्त व्यक्ति का जीवन अत्यंत व्यवस्थित और प्रभावशाली होता है। इसके मुख्य फल निम्नलिखित हैं।
लग्नेश और चंद्रेश की युति केंद्र भावों में किस भाव में बन रही है, इसके आधार पर जीवन के विभिन्न मोर्चों पर प्रभाव अलग होता है।
कुंडली में इस योग की तीव्रता और वास्तविक फल की अवधि को मापने के लिए तीन व्यावहारिक कसौटियों का परीक्षण अनिवार्य है।
| मूल्यांकन के बिंदु | आदर्श स्थिति | व्यावहारिक प्रभाव |
|---|---|---|
| केंद्र बनाम मित्र राशि | यदि यह युति दसवें या पहले भाव में बन रही हो | यह मित्र राशि की तुलना में कई गुना अधिक तीव्रता से और कम संघर्ष के साथ राजयोग का फल देती है |
| अंश बल अर्थात Degree Strength | दोनों ग्रह बाल या मृत अवस्था में न हों और सूर्य से अस्त न हों | ग्रहों का अंश बल जितना मजबूत होगा, व्यक्ति का भाग्य उतनी ही कम उम्र में चमक उठेगा |
| शुभ ग्रहों का संबंध | इस युति पर देवगुरु बृहस्पति या शुक्र जैसे ग्रहों की दृष्टि हो | योग की शुद्धता बढ़ जाती है और व्यक्ति की कीर्ति निष्कलंक रहती है |
यदि यह युति दसवें या पहले भाव में बन रही हो, तो यह मित्र राशि की तुलना में कई गुना अधिक तीव्रता से और कम संघर्ष के साथ राजयोग का फल देती है। केंद्र भाव इस योग को अधिक स्थिर और प्रभावशाली बनाते हैं।
दोनों ग्रह बाल या मृत अवस्था में न हों और सूर्य से अस्त न हों।grah का अंश बल जितना मजबूत होगा, व्यक्ति का भाग्य उतनी ही कम उम्र में चमक उठेगा। अंश बल इस योग की सक्रियता को तय करता है।
इस युति पर देवगुरु बृहस्पति या शुक्र जैसे ग्रहों की दृष्टि हो। योग की शुद्धता बढ़ जाती है और व्यक्ति की कीर्ति निष्कलंक रहती है। शुभ ग्रहों का प्रभाव इस योग को और अधिक पवित्र बनाता है।
पुष्कल योग का चमत्कारी और क्रांतिकारी परिणाम जातक को तब अनुभव होता है जब जीवन के सक्रिय काल में लग्नेश या चंद्रमा के राशिपति की महादशा या अंतर्दशा क्रियाशील होती है। इस अवधि में व्यक्ति का भाग्य बहुत तेजी से बदलता है।
यह समय व्यक्ति के जीवन में एक नया विस्तार और सकारात्मक उछाल लेकर आता है। दशा चक्र का सही समय पुष्कल योग को जीवन में पूर्ण रूप में प्रकट करता है।
पुष्कल योग यह सिखाता है कि संपूर्ण जीवन केवल धन या सत्ता प्राप्त करने में नहीं है बल्कि विचार और कर्म के संरेखण में है। जब भौतिक अस्तित्व और मन की चेतना एक ही दिशा में संरेखित होते हैं, तो व्यक्ति को समृद्धि, ऐश्वर्य और संपूर्ण जीवन का अनुभव होता है।
एक सशक्त पुष्कल योग व्यक्ति को अखंड धन, प्रशासनिक योग्यता, मधुर वाणी और परोपकारी स्वभाव प्रदान करता है। परंतु इसका पूर्ण फल तभी मिलता है जब लग्नेश और चंद्रेश किसी केंद्र भाव में हों, अंश बल मजबूत हो, शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और दशा चक्र सक्रिय काल में आए।
पुष्कल योग क्या होता है जब कुंडली में लग्नेश और चंद्रमा का राशिपति एक साथ केंद्र भाव में बैठे हों या मित्र राशि में बलवान हों, तो पुष्कल योग बनता है।
पुष्कल योग का सबसे बड़ा लाभ क्या है यह योग जीवन को पूर्णता देता है। इससे व्यक्ति को अखंड धन, स्वास्थ्य, मधुर वाणी और समाज में आदरणीय स्थान प्राप्त होता है।
क्या लग्नेश और चंद्रेश का पहला भाव में बैठना पुष्कल योग को और प्रभावशाली बनाता है हाँ, यदि लग्नेश और चंद्रेश पहला भाव में बैठे हों, तो व्यक्ति का व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक होता है और उसे स्वयं में बहुत तेज और आत्मविश्वास प्राप्त होता है।
क्या दसवें भाव में पुष्कल योग व्यक्ति को करियर में उच्च शिखर देता है हाँ, दसवें भाव में यदि यह युति बनती है, तो व्यक्ति को करियर में अत्यंत उच्च शिखर मिलता है। शासन तंत्र में महत्व और सरकारी लाभ इस स्थिति का मुख्य फल है।
पुष्कल योग का प्रभाव जीवन में सबसे अधिक कब दिखता है जब जीवन के सक्रिय काल में लग्नेश या चंद्रमा के राशिपति की महादशा या अंतर्दशा क्रियाशील होती है तब पुष्कल योग का प्रभाव सर्वाधिक होता है।
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