उभयचरी योग: सूर्य का पूर्ण सुरक्षा चक्र

By पं. नरेंद्र शर्मा

जानिए कैसे सूर्य के दोनों ओर ग्रह अटूट आत्मविश्वास नेतृत्व क्षमता और आर्थिक समृद्धि प्रदान करते हैं

उभयचरी योग क्या है: अर्थ और फल

दोनों ओर विचरण करने वाले राजसी योग की शक्ति

भारतीय ज्योतिष में सूर्य आधारित योगों की श्रृंखला में उभयचरी योग को सबसे शक्तिशाली संतुलित और पूर्ण फल देने वाला महायोग माना जाता है। यह योग वास्तव में वेसी योग अर्थात सूर्य के आगे ग्रह होना और वासि योग अर्थात सूर्य के पीछे ग्रह होना का एक अत्यंत सुंदर और राजसी मिलाप है।

उभयचरी का शाब्दिक अर्थ होता है दोनों ओर विचरण करने वाला या दोनों तरफ से सहारा पाने वाला। सरल शब्दों में कहें तो सूर्य कुंडली में राजा है। जब राजा के आगे द्वितीय भाव और पीछे बारहवें भाव दोनों तरफ उसके मंत्री रक्षक या सहायक ग्रह खड़े हों तो सूर्य की शक्ति और तेज का दायरा असीम हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन हर क्षेत्र में चाहे वह करियर हो सामाजिक प्रतिष्ठा हो या आंतरिक आत्मबल एक राजा के समान स्थायित्व और वर्चस्व प्रदर्शित करता है।

उभयचरी योग कैसे बनता है

इस योग के निर्माण का सिद्धांत बहुत स्पष्ट और वैज्ञानिक है।

मूल नियम विवरण
सूर्य के दोनों ओर ग्रह कुंडली में सूर्य देव के ठीक पिछले बारहवें भाव और ठीक अगले दूसरे भाव दोनों में राहु केतु और चंद्रमा को छोड़कर कोई ग्रह होना आवश्यक है

चंद्रमा को बाहर क्यों रखा गया। सूर्य और चंद्रमा के आपसी संबंधों से अन्य बड़े योगों जैसे बुधादित्य या अनफा सुनफा की गणना होती है इसलिए सूर्य के स्वतंत्र योगों में चंद्रमा को शामिल नहीं किया जाता।

राहु और केतु का अपवाद क्यों। राहु और केतु छाया और क्रूर ग्रह हैं। सूर्य के आगे पीछे इनका होना ग्रहण जैसी स्थिति बनाता है जो सूर्य के तेज को चमकाने के बजाय उसे धूमिल कर देता है।

उभयचरी योग के प्रकार

उभयचरी योग कुंडली में किस प्रकार के ग्रहों के संयोजन से बन रहा है उसके आधार पर फलादेश का स्वरूप बदल जाता है।

योग का प्रकार ग्रहों की स्थिति जीवन पर मुख्य प्रभाव
शुभ उभयचरी योग सूर्य के दोनों ओर केवल नैसर्गिक शुभ ग्रह बुध गुरु शुक्र हों अत्यधिक सहजता अपार धन उच्च कोटि की वाकपटुता समाज में अत्यंत सम्मानित और बेदाग छवि
पाप उभयचरी योग सूर्य के दोनों ओर क्रूर या पापी ग्रह मंगल शनि हों अत्यधिक जुझारू स्वभाव कड़े संघर्षों और शत्रुओं को कुचलकर राजनीति या प्रशासन में शीर्ष पद
मिश्रित उभयचरी योग एक तरफ शुभ ग्रह जैसे बुध या गुरु और दूसरी तरफ क्रूर ग्रह जैसे मंगल या शनि हो व्यावहारिक संतुलन परिस्थितियों के अनुसार बेहद सौम्य और जरूरत पड़ने पर कड़ा रुख

शुभ उभयचरी योग का प्रभाव

जब सूर्य के दोनों ओर केवल नैसर्गिक शुभ ग्रह बुध गुरु शुक्र हों तो शुभ उभयचरी योग बनता है। यह योग जीवन में अत्यधिक सहजता और अपार धन प्रदान करता है।

ऐसे व्यक्ति में उच्च कोटि की वाकपटुता होती है। वे समाज में अत्यंत सम्मानित और बेदाग छवि के साथ रहते हैं। इनका व्यक्तित्व शांत और आकर्षक होता है।

पाप उभयचरी योग का प्रभाव

जब सूर्य के दोनों ओर क्रूर या पापी ग्रह मंगल शनि हों तो पाप उभयचरी योग बनता है। यह योग व्यक्ति को अत्यधिक जुझारू स्वभाव देता है।

ऐसा व्यक्ति कड़े संघर्षों और शत्रुओं को कुचलकर राजनीति या प्रशासन में शीर्ष पद पाता है। इनमें पराक्रम और साहस बहुत अधिक होता है।

मिश्रित उभयचरी योग का प्रभाव

जब एक तरफ शुभ ग्रह जैसे बुध या गुरु और दूसरी तरफ क्रूर ग्रह जैसे मंगल या शनि हों तो मिश्रित उभयचरी योग बनता है। यह योग जीवन में व्यावहारिक संतुलन प्रदान करता है।

ऐसा व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार बेहद सौम्य और जरूरत पड़ने पर कड़ा रुख अपनाने वाला होता है। मिश्रित उभयचरी योग में दोनों प्रकार के ग्रहों का सकारात्मक और वैचारिक संतुलन मिलता है।

जीवन पर मुख्य व्यावहारिक प्रभाव

जिस व्यक्ति की कुंडली में शुद्ध उभयचरी योग क्रियाशील होता है उसका जीवन स्थिरता का एक बेहतरीन उदाहरण बनता है।

अटूट आत्मविश्वास और तेज

चूंकि सूर्य को दोनों तरफ से सुरक्षा प्राप्त है ऐसे लोग कभी भी आत्म संदेह या डिप्रेशन का शिकार नहीं होते। इनका मनोबल बहुत ऊंचा होता है और ये विपरीत परिस्थितियों में भी एक मार्गदर्शक की तरह खड़े रहते हैं।

असाधारण प्रशासनिक और नेतृत्व क्षमता

इन लोगों में दूसरों को संभालने और बड़े संगठनों का नेतृत्व करने का जन्मजात गुण होता है। सरकारी क्षेत्रों राजनीति या बड़े कॉरपोरेट घरानों में ये लोग उच्च प्रबंधकीय पदों को सुशोभित करते हैं।

आर्थिक समृद्धि और धन प्रबंधन

सूर्य से दूसरा भाव संचित धन का है और बारहवां भाव निवेश का। उभयचरी योग वाले व्यक्ति न केवल प्रचुर धन कमाते हैं बल्कि उसका प्रबंधन और निवेश भी इतनी समझदारी से करते हैं कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी उसका सुख भोगती हैं।

आकर्षक व्यक्तित्व और वजनदार वाणी

इनके चेहरे पर एक स्वाभाविक तेज होता है। जब ये समाज या सभा में बोलते हैं तो इनकी बातों में एक अधिकार और सच्चाई झलकती है जिससे लोग इनकी ओर स्वतः आकर्षित हो जाते हैं।

फलित होने के सूक्ष्म नियम

कुंडली का गहराई से विश्लेषण करते समय इस योग की वास्तविक ताकत को मापने के लिए इन तीन व्यावहारिक बिंदुओं का ध्यान रखना अनिवार्य है।

सूर्य का स्वयं का बल

यदि सूर्य अपनी उच्च राशि मेष या अपनी स्वराशि सिंह में बैठकर यह योग बना रहा है तो उभयचरी योग का प्रभाव व्यक्ति को वैश्विक स्तर की प्रसिद्धि और अधिकार दिला सकता है। इसके विपरीत यदि सूर्य नीच राशि तुला में है तो सफलता मिलने से पहले संघर्ष का दौर बहुत लंबा चलता है।

अस्त का प्रभाव

बुध और शुक्र अक्सर सूर्य के बहुत निकट होते हैं और उनके अस्त होने की संभावना रहती है। यदि सूर्य के दोनों ओर बैठे ग्रह सूर्य से सुरक्षित अंशों की दूरी पर हैं और स्वतंत्र रूप से बलवान हैं तो यह योग अपने पूरे शबाब पर होता है।

दशा चक्र का समय

इस योग का वास्तविक और क्रांतिकारी उत्कर्ष व्यक्ति को जीवन के उस पड़ाव पर अनुभव होता है जब कुंडली में सूर्य या उन दोनों भावों में बैठे विशिष्ट ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा क्रियाशील होती है।

यह समय व्यक्ति के जीवन में एक बड़ा सकारात्मक उछाल लेकर आता है। दशा चक्र का सही समय इस योग को जीवन में निर्णायक बना देता है।

उभयचरी योग का गूढ़ संदेश

उभयचरी योग यह सिखाता है कि आत्मविश्वास और तेज केवल तभी पूर्ण होता है जब आत्मा के दोनों ओर सुरक्षा और सहारा होता है। जब सूर्य के आगे और पीछे ग्रह होते हैं तो व्यक्ति में अटूट आत्मबल और नेतृत्व क्षमता विकसित होती है।

एक सशक्त उभयचरी योग व्यक्ति को असाधारण प्रशासनिक क्षमता आर्थिक समृद्धि आकर्षक व्यक्तित्व और वैश्विक प्रसिद्धि प्रदान कर सकता है। परंतु इसका फल तभी पूर्ण रूप में प्रकट होता है जब सूर्य बलवान हो दोनों ओर के ग्रह अस्त न हों और दशा चक्र अनुकूल समय पर सक्रिय हो।

FAQ

उभयचरी योग क्या है जब कुंडली में सूर्य के ठीक पिछले बारहवें भाव और ठीक अगले दूसरे भाव दोनों में राहु केतु और चंद्रमा को छोड़कर कोई ग्रह हो तो उभयचरी योग बनता है।

उभयचरी योग का मुख्य फल क्या है यह योग अटूट आत्मविश्वास असाधारण नेतृत्व क्षमता आर्थिक समृद्धि और आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करता है।

शुभ उभयचरी योग और पाप उभयचरी योग में क्या अंतर है शुभ उभयचरी योग में सूर्य के दोनों ओर शुभ ग्रह होते हैं जो सहजता और धन देते हैं जबकि पाप उभयचरी योग में क्रूर ग्रह होते हैं जो संघर्ष के बाद शीर्ष पद देते हैं।

उभयचरी योग का फल कब सबसे अधिक मिलता है जब सूर्य या दोनों भावों में बैठे ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा आती है तब उभयचरी योग का वास्तविक और क्रांतिकारी उत्कर्ष मिलता है।

क्या सूर्य का बल उभयचरी योग में महत्वपूर्ण है हाँ यदि सूर्य उच्च राशि या स्वराशि में बली है तो उभयचरी योग वैश्विक प्रसिद्धि और अधिकार दिला सकता है।

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पं. नरेंद्र शर्मा

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