By अपर्णा पाटनी
संपूर्ण प्रदोष व्रत: शिव कृपा पाने की विधि, कथा, पूजन सामग्री, मंत्र और नियम - एक विस्तृत मार्गदर्शिका

प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए रखा जाने वाला अत्यंत पवित्र व्रत है। यह प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है जिससे वर्ष में लगभग चौबीस या पच्चीस प्रदोष आते हैं। प्रदोष काल सूर्यास्त और रात्रि के आगमन के मध्य का वह शक्तिशाली समय है जब शिव उपासना साधक के पाप रोग शोक और बाधाओं को शांत करती है। वार अनुसार इसके फल बदलते हैं जिसमें सोम प्रदोष संतान सुख के लिए शनि प्रदोष कष्ट निवारण के लिए और शुक्र प्रदोष दांपत्य सौभाग्य के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
प्रदोष काल सूर्यास्त से लगभग पैंतालीस मिनट पूर्व आरंभ होकर पैंतालीस मिनट बाद तक मान्य है। त्रयोदशी की संध्या में लगभग सात बजे से नौ बजे के बीच शिव आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है।
बेलपत्र गंगाजल अक्षत सफेद चंदन शहद दही दूध घी सफेद मिठाई फूल फल धूप दीप कपूर रुद्राक्ष माला कलावा कुश का आसन पंचामृत मिश्री धागा लाल या पीला वस्त्र शिवलिंग या भगवान शिव का चित्र।
प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें।
पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और दीपक जलाएं।
पूर्व या उत्तर पूर्व दिशा में बैठकर शिवलिंग का जल दूध दही शहद और घी से अभिषेक करें।
बेलपत्र अक्षत फूल धूप दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
शिव मंत्रों का जाप करें जैसे ॐ नमः शिवाय और महामृत्युंजय मंत्र।
संध्या में पुनः स्नान कर प्रदोष काल में शिवलिंग की पूजा करें।
व्रत कथा सुनें आरती करें और भोग अर्पित करें।
अगले दिन व्रत का पारण कर ब्राह्मण को भोजन और वस्त्र दान करें।
सात्विकता और संयम का पालन करें।
फलाहार या निर्जला व्रत किया जा सकता है।
तामसिक भोजन मांसाहार नशा क्रोध विवाद और अपशब्द से दूर रहें।
दिनभर शिव ध्यान और मंत्र जप में मन लगाएं।
व्रत का संकल्प पहले ही ले लें और उद्यापन विधि से पूर्ण करें।
एक नगर में एक निर्धन विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ रहती थी और श्रद्धा से प्रदोष व्रत करती थी। एक दिन उसका पुत्र गंगा स्नान को गया जहाँ मार्ग में लुटेरों ने उसे लूट लिया और सैनिकों ने उसे लुटेरों का साथी समझकर बंदी बना लिया। राजा ने विचार बिना उसे कारागार में डाल दिया। उसी रात राजा ने स्वप्न में देखा कि बालक निर्दोष है और उसे मुक्त करने का आदेश मिला। सुबह राजा ने उसे आदरपूर्वक बुलाया और वर मांगने को कहा। बालक ने केवल एक मुट्ठी धान माँगा ताकि उसकी माता भगवान शिव के लिए खीर बना सके। राजा उसकी भक्ति से प्रभावित हुआ और ब्राह्मणी को सम्मान देकर उन्हें अपना सलाहकार बना लिया। प्रदोष व्रत की कृपा से उनका जीवन समृद्धि और शांति से भर गया।
ॐ नमः शिवाय
ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ ह्रीं हौं जूं सः
जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्धांगी धारा
एकानन चतुरानन पंचानन राजे
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे
त्रिगुण रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी
श्वेतांबर पीतांबर बाघांबर अंगे
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे
कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धारी
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी
त्रिगुणस्वामी की यह आरती जो नर गावे
सुख संपत्ति पावे।
शिव और पार्वती कृपा प्राप्त होती है।
संतान सुख परिवार शांति और आर्थिक उन्नति मिलती है।
दैहिक दैविक और भौतिक कष्टों का नाश होता है।
ग्रह दोष शनि पीड़ा और पितृ दोष शांत होते हैं।
मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और साधक आध्यात्मिक रूप से अग्रसर होता है।
मांसाहार मदिरा क्रोध झूठ अपशब्द विवाद और आलस्य से दूर रहें।
पूजा में लापरवाही न करें और व्रत के नियमों का उल्लंघन न करें।
प्रदोष व्रत भक्ति श्रद्धा और समर्पण का वह पवित्र अवसर है जो कठिन समय में भी साधक के मन में नई शक्ति जागृत करता है। यह व्रत जीवन में शिव कृपा सुख शांति और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है।
• क्या प्रदोष व्रत हर कोई कर सकता है
हाँ यह व्रत स्त्री पुरुष सभी के लिए शुभ है।
• क्या प्रदोष व्रत में निर्जला उपवास अनिवार्य है
नहीं फलाहार भी किया जा सकता है यदि स्वास्थ्य अनुमति दे।
• क्या प्रदोष व्रत ग्रह दोष शांत करता है
हाँ विशेष रूप से चंद्र शनि और पितृ दोष।
• क्या प्रदोष काल में विशेष मंत्र जप आवश्यक है
ॐ नमः शिवाय और महामृत्युंजय मंत्र सबसे शुभ माने गए हैं।
• क्या प्रदोष दिन पर नए कार्य आरंभ करने चाहिए
यह दिन पूजा साधना के लिए श्रेष्ठ है नए कार्य के लिए नहीं।
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