By पं. सुव्रत शर्मा
पितृ दोष निवारण और पीपल पूजा की शक्ति से परिवार में समृद्धि की अनुभूति

सोमवती अमावस्या का दिन भारतीय परंपरा में अत्यंत शुभ माना जाता है और जब यह तिथि सोमवार के दिन आती है तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव और बढ़ जाता है। इस दिन की गई पूजा, पितृ तर्पण और पीपल की परिक्रमा के बारे में अनेक प्राचीन ग्रंथों में विशेष उल्लेख मिलता है। श्रद्धा से किया गया एक छोटा सा कर्म भी कई गुना फल देता है और इसीलिए इसे आत्मशुद्धि और पितृ कृपा का विशेष अवसर माना गया है।
अमावस्या हर माह आती है लेकिन जब यह सोमवार को पड़े तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। यह तिथि पितरों के तर्पण, जीवित पूर्वजों के कल्याण और भगवान शिव की उपासना का सर्वोत्तम समय मानी जाती है। जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में स्थित होते हैं तब मन की स्थिरता प्रभावित होती है और साधना का प्रभाव बढ़ता है।
एक समय एक धार्मिक ब्राह्मण अपनी पत्नी और एकमात्र कन्या के साथ अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। कन्या रूप और गुण से धन्य थी और माता पिता की आज्ञाओं का पालन करती थी। वह प्रतिदिन पूजा करती थी और ब्राह्मणों की सेवा में तत्पर रहती थी। इसके बावजूद विवाह में अवरोध बना हुआ था और निरंतर प्रस्ताव असफल हो जाते थे। माता पिता के मन में चिंता बढ़ती गई और वे उपाय खोजते रहे।
तिथि: वैदिक ज्योतिष में समय का सूक्ष्मतम आयाम
एक दिन एक वृद्ध संन्यासी उनके घर पहुंचे। ब्राह्मण दंपती ने सम्मान से भोजन कराया और अपनी कन्या की समस्या बताई। संत ने ध्यान किया और बोले कि कन्या के विवाह में जो अवरोध है वह पितृ दोष के कारण है। जब तक यह दोष दूर नहीं होगा तब तक उसका विवाह नहीं हो सकेगा। ब्राह्मण ने उपाय पूछा और तब संत ने सोमवती अमावस्या का गूढ़ रहस्य बताया।
संत ने कहा कि जिस दिन अमावस्या सोमवार को आए उस दिन एक सती स्त्री के साथ कन्या को पीपल वृक्ष की एक सौ आठ परिक्रमा करवानी होंगी। परिक्रमा करते समय भगवान विष्णु और पितरों का ध्यान करना होगा। इसके बाद पितरों को तर्पण देना होगा, ब्राह्मणों को भोजन कराना होगा और दान देना होगा। इन सभी कर्मों से पितृ दोष शांत होगा।
जब सोमवती अमावस्या आई तो ब्राह्मण तुरंत एक सच्ची पतिव्रता स्त्री की खोज में निकले। उन्हें एक ऐसी स्त्री मिली जो अपने पति की सेवा में निरंतर लगी रहती थी और आचरण से निर्मल थी। ब्राह्मण ने उसे सारी बातें बताईं और वह उनके साथ चलने को तैयार हो गई। परिवार ने संकल्प लेकर पूजा सामग्री के साथ पीपल वृक्ष की ओर प्रस्थान किया।
पीपल वृक्ष के नीचे पहले पूजन किया गया। गंगाजल चढ़ाया गया और दीप प्रज्वलित किया गया। इसके बाद कन्या ने सती स्त्री के साथ मिलकर एक सौ आठ परिक्रमा पूरी कीं। परिक्रमा के समय उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया और पितरों को स्मरण किया। तर्पण किया गया और ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। भूखों को अन्न दिया गया और यथाशक्ति दान भी किया गया।
कुछ ही दिनों में कन्या का विवाह एक योग्य और कुलीन युवक से निश्चित हो गया। विवाह के बाद उसका जीवन सुख, शांति और समृद्धि से भर गया। परिवार की वर्षों पुरानी चिंता समाप्त हुई और सभी ने सोमवती अमावस्या के दिव्य प्रभाव को अनुभव किया।
कथा सिखाती है कि श्रद्धा और धर्म के साथ किया गया प्रयास जीवन में असंभव प्रतीत होने वाली स्थितियों को भी बदल सकता है। सोमवती अमावस्या के दिन की गई पीपल परिक्रमा, पितृ तर्पण और शिव उपासना से पितृ दोष शांत होता है और परिवार में सौभाग्य आता है। विशेषकर महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और घर की सुख समृद्धि के लिए इस व्रत को करती हैं।
सोमवती अमावस्या पर पीपल की परिक्रमा क्यों की जाती है
पीपल को देव वृक्ष माना गया है और इस दिन परिक्रमा करने से पितृ दोष शांत होता है और मन को स्थिरता मिलती है।
सती स्त्री के साथ परिक्रमा करने का क्या कारण है
सती स्त्री की पवित्रता और संकल्प शक्ति से पुण्य का प्रभाव बढ़ता है और बाधाएं दूर होती हैं।
सोमवती अमावस्या पर कौन सी पूजा सबसे महत्वपूर्ण है
पीपल परिक्रमा, पितृ तर्पण और शिव पूजन इस दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं।
क्या इस दिन केवल महिलाएं ही व्रत करती हैं
नहीं, पुरुष भी पितृ तर्पण और दान कर्म कर सकते हैं और इससे परिवार को लाभ मिलता है।
क्या पितृ दोष दूर होने के अन्य भी उपाय हैं
पीपल में जल चढ़ाना, नियमित तर्पण करना और दान देना पितृ दोष शांत करने में सहायक है।
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