By पं. संजीव शर्मा
सुख, संतान और पितृ कृपा की कथा जो व्रत, श्रद्धा और सेवा से जीवन परिवर्तन का संदेश देती है।

आषाढ़ अमावस्या आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है जिसे पितरों की शांति तर्पण दान पुण्य और आत्मिक शुद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन किए गए स्नान दान और पितृ तर्पण से पितृ दोष शांत होता है जीवन की नकारात्मकता दूर होती है और परिवार पर सुख समृद्धि की वर्षा होती है। वैदिक ज्योतिष में यह तिथि इसलिए भी विशेष है क्योंकि सूर्य और चंद्रमा का संयोग मन और आत्मा को शुद्ध करने वाली दिव्य ऊर्जा उत्पन्न करता है।
बहुत समय पहले एक नगर में एक ब्राह्मण और उसकी धर्मपरायण पत्नी रहते थे। उनके घर में किसी प्रकार की कमी नहीं थी परंतु उनकी गोद सूनी थी। संतान का अभाव उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख था और वे निरंतर ईश्वर से संतान प्राप्ति की प्रार्थना करते थे।
ब्राह्मण ने अंततः निश्चय किया कि वह संतान के लिए वन में जाकर कठोर तपस्या करेगा। वह अपनी पत्नी से विदा लेकर वन में पहुंचा और एक वटवृक्ष के नीचे तपस्या में लीन हो गया। वर्ष बीतते गए उसका शरीर कमजोर हो गया परंतु उसके मन की इच्छा अभी भी अधूरी थी। निराशा के एक क्षण में उसने आत्मत्याग का निश्चय किया। जैसे ही उसने वटवृक्ष की डाल से फंदा बांधकर गले में डालने का प्रयास किया तभी दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ।
उस प्रकाश से सुख अमावस्या देवी प्रकट हुईं। देवी ने करुणा से कहा कि उसके भाग्य में सात जन्मों तक संतान नहीं है परंतु उसकी तपस्या असाधारण है इसलिए वह उसे दो कन्याओं का वरदान देती हैं। देवी ने कहा कि उसकी पत्नी एक वर्ष तक श्रद्धा से सुख अमावस्या व्रत करे और हर अमावस्या को एक कटोरी चावल का दान करे। इससे उसके जीवन में सुख समृद्धि और संतान का आगमन होगा।
ब्राह्मण घर लौटकर देवी का संदेश पत्नी को सुनाता है। पत्नी पूर्ण श्रद्धा संयम और नियम से व्रत आरंभ करती है। समय बीतता है और उनके घर दो सुंदर कन्याओं का जन्म होता है जिनके नाम रखे जाते हैं अमावस्या और पूनम।
समय के साथ दोनों बहनें बड़ी होती हैं। अमावस्या विनम्र धार्मिक और सेवा भाव से परिपूर्ण थी और उसके घर में शांति और समृद्धि रहती थी। दूसरी ओर पूनम दिखावा आलस्य और भौतिक सुखों में लीन रहती थी जिससे उसके घर में अभाव और कलह का वातावरण था।
एक दिन अमावस्या को ज्ञात होता है कि पूनम अत्यंत दुखी है। अमावस्या बहन के घर जाती है और बताती है कि सुख अमावस्या व्रत ने उसके जीवन को कैसे बदल दिया। पूनम बहन की बात मानती है और श्रद्धा से व्रत करती है। कुछ ही समय बाद उसके घर में भी कलह समाप्त होता है धन की वृद्धि होती है और उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।
यह कथा सिखाती है कि श्रद्धा संयम और नियम से किया गया व्रत जीवन में गहन परिवर्तन ला सकता है और पितरों की कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है।
कठिन समय में धैर्य और आस्था बनाए रखना चाहिए।
नियम और श्रद्धा से किया गया व्रत चमत्कार ला सकता है।
पितरों के तर्पण जलदान और दान से जीवन में शांति आती है।
दूसरों को सही मार्ग दिखाना पुण्य का कार्य है।
सेवा भक्ति और दान हर संकट को दूर कर सकते हैं।
श्रद्धा और नियम से अमावस्या व्रत करना
चावल तिल वस्त्र और अन्न का दान
पितरों के लिए तर्पण और जलदान
जरूरतमंदों की सेवा
घर में सात्विकता और शांति बनाए रखना
मांस मदिरा और तामसिक भोजन का सेवन
क्रोध विवाद और अपमान
झूठ बोलना या व्रत नियमों का उल्लंघन
अशुद्धता और आलस्य
• क्या सुख अमावस्या व्रत किसी भी स्त्री द्वारा किया जा सकता है
हाँ यह व्रत सभी स्त्रियों के लिए शुभ माना गया है।
• क्या पुरुष भी इस तिथि पर व्रत रख सकते हैं
हाँ पुरुष भी इस दिन स्नान दान और तर्पण कर सकते हैं।
• क्या बिना चावल दान किए व्रत अधूरा माना जाता है
चावल दान इस व्रत का मुख्य अंग है इसलिए इसे अवश्य करना चाहिए।
• क्या तर्पण घर पर किया जा सकता है
हाँ यदि विधि से किया जाए तो घर पर किया गया तर्पण पूर्ण फल देता है।
• क्या इस दिन नए कार्य शुरू किए जा सकते हैं
नहीं यह दिन साधना तर्पण और आत्मशुद्धि के लिए है नई शुरुआत के लिए नहीं।
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