By पं. संजीव शर्मा
भरणी नक्षत्र के अधिपति, यम देव मृत्यु, कर्म और धर्म का संतुलन सिखाते हैं

वैदिक संस्कृति में यम केवल मृत्यु के देवता नहीं बल्कि धर्म न्याय और जीवन मृत्यु चक्र के संतुलन के परम प्रतीक हैं। इन्हें धर्मराज और काल कहा जाता है। यम दक्षिण दिशा के अधिपति पितृलोक के स्वामी और कर्मफल के निर्णायक हैं। भरणी नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता के रूप में वे मनुष्य के जीवन में नैतिकता न्याय और आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का मार्गदर्शन करते हैं।
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| अधिष्ठाता नक्षत्र | भरणी मेष राशि 13°20' से 26°40' |
| माता पिता | सूर्य देव विवस्वान और संज्ञा सरण्यु |
| भाई बहन | यमुना अश्विनी कुमार शनि मनु रेवंत तपती |
| वाहन | भैंसा |
| आयुध | गदा पाश |
| सहयोगी | चित्रगुप्त कालभैरव चतुरक्षी कुत्ते |
| लोकपाल | दक्षिण दिशा |
यम शब्द का अर्थ नियंत्रण और संयम है।
धर्मराज उनके न्याय स्वरूप को दर्शाता है।
काल समय और परिवर्तन का स्वामी है।
अंतक मृत्यु के अंतिम सत्य का परिचायक है।
भरणी नक्षत्र: जीवन, निर्माण और कर्म का वैदिक द्वार
ऋग्वेद में यम को प्रथम मनुष्य कहा गया है जिन्होंने मृत्यु का मार्ग खोजा। सूर्य और संज्ञा के पुत्र होने के कारण इन्हें तेज बुद्धि और धर्म भावना प्राप्त हुई।
यमुना की प्रार्थना पर यम ने वर दिया कि जो भाई बहन प्रेम से यमुना में स्नान करेंगे उन्हें मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसी से यम द्वितीया की परंपरा आरंभ हुई।
सावित्री की तपस्या से प्रसन्न होकर यम ने सत्यवान के प्राण लौटाए। यह कथा यम की न्यायप्रियता और धर्मपालन का आदर्श उदाहरण है।
1.कर्मफल का निर्धारण
चित्रगुप्त के लेखा के आधार पर जीव को नरक स्वर्ग पितृलोक या पुनर्जन्म की ओर भेजना।
2.धर्म के संरक्षक
अधर्मियों के लिए दंड का रूप और धर्मशीलों के लिए न्याय और मार्गदर्शन।
3.दक्षिण दिशा के अधिपति
यह दिशा मृत्यु पितृऋण और आध्यात्मिक परिवर्तन का प्रतीक मानी गई है।
भरणी नक्षत्र के जातक यम के सिद्धांतों से प्रभावित होते हैं।
सकारात्मक प्रभाव
• न्यायबुद्धि
• साहस और दृढ़ संकल्प
• कर्तव्य पालन
• कर्म के प्रति जागरूकता
चुनौतियाँ
• आवेग
• हठ और मानसिक तनाव
जीवन सूत्र
कर्म की प्रधानता ही यम का सबसे बड़ा संदेश है।
• मूल मंत्र: ॐ यमाय नमः
• विशेष मंत्र: ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नो यम प्रचोदयात
पूजा विधि
शनिवार या अमावस्या को काले तिल उड़द और लाल फूल अर्पित करें।
• रंग: काला लाल
• वाहन और प्रतीक: भैंसा कौवा त्रिशूल
• वृक्ष: पीपल
• यम द्वितीया
• दान: लोहे के पात्र तिल उड़द दाल काले वस्त्र
बौद्ध धर्म में यम धर्मराज कहलाते हैं और तिब्बती परंपरा में शिनजे।
जैन परंपरा में वे काल माने जाते हैं।
मृत्यु अटल है और कर्म ही साथ जाते हैं।
महाभारत में युधिष्ठिर और यम का संवाद कर्म सिद्धांत का आधार है।
यम को सड़क सुरक्षा का देवता माना जाता है। नियमों का उल्लंघन मृत्यु से जुड़ा भय उत्पन्न करता है।
अथर्ववेद कहता है
यमो मृत्युः
यम मृत्यु का स्वयंभू स्वरूप हैं।
उनकी उपासना मनुष्य को धर्म सत्य और कर्म का स्मरण कराती है।
भरणी नक्षत्र में यम की उपस्थिति जातक को नैतिक शक्ति और जीवन में संतुलन का मार्ग देती है।
• यम को केवल मृत्यु का देवता क्यों नहीं माना जाता
क्योंकि वे धर्म न्याय और कर्मफल के निर्णायक भी हैं।
• भरणी नक्षत्र पर यम का प्रभाव क्या दर्शाता है
साहस कर्तव्य पालन और न्याय भावना को प्रबल करता है।
• यम की पूजा कब करनी चाहिए
शनिवार अमावस्या या पितृ तिथि पर उनकी आराधना शुभ मानी जाती है।
• यम और चित्रगुप्त का क्या संबंध है
चित्रगुप्त कर्म लेखा लिखते हैं और यम उसके आधार पर न्याय देते हैं।
• यम द्वितीया का धार्मिक महत्व क्या है
यह भाई बहन के प्रेम और सुरक्षा का उत्सव है।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
मेरा जन्म नक्षत्र
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इनसे पूछें: पारिवारिक मामले, आध्यात्मिकता और कर्म
इनके क्लाइंट: दि., उ.प्र., म.हा.
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