By पं. नरेंद्र शर्मा
चंद्र राशि मिलान में षडाष्टक दोष के विभिन्न प्रकार और विवाहित जीवन पर उनका प्रभाव

षडाष्टक दोष के भी विभिन्न प्रकार माने जा सकते हैं, विशेषकर जब हम इसकी गहराई से विवेचना करते हैं। सामान्यतः षडाष्टक दोष को केवल चंद्र राशि आधारित दोष माना जाता है, परंतु ज्योतिषशास्त्र के गंभीर अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इसके विभिन्न स्तर और भेद हो सकते हैं, जो दोष की तीव्रता और प्रभाव को प्रभावित करते हैं। षडाष्टक दोष की और गहराई में जाकर जब हम इसके भावात्मक प्रभाव और राशि-स्वभाव पर आधारित भेद करते हैं, तो वहाँ हमें कुछ विशेष प्रकार के षडाष्टक संबंध मिलते हैं, जैसे - मृत्यु षडाष्टक, मित्र षडाष्टक और शत्रु षडाष्टक। ये सब शब्द कुंडली में दो राशियों के बीच षष्ठ (6वें) और अष्टम (8वें) भाव संबंध की प्रकृति को दर्शाते हैं और यह भी बताते हैं कि वह दोष कितना घातक, सामान्य या सहयोगी हो सकता है।
षडाष्टक दोष: वैवाहिक जीवन में बाधा या सिर्फ एक ज्योतिषीय संकेत?
यह षडाष्टक दोष का सबसे घातक रूप माना जाता है।
जब दो राशियाँ न केवल षष्ठ-अष्टम भाव में स्थित हों, बल्कि वे आपस में शत्रु राशियाँ भी हों और दोनों की प्रकृति कठोर या उग्र हो (जैसे मेष-वृश्चिक, सिंह-मकर, कर्क-धनु), तब यह दोष “मृत्यु षडाष्टक” कहलाता है।
यह षडाष्टक दोष का सौम्य या क्षम्य रूप होता है।
जब दो राशियाँ षष्ठ या अष्टम संबंध में हों लेकिन एक-दूसरे की मित्र राशियाँ हों, तब यह “मित्र षडाष्टक” कहलाता है। जैसे वृषभ-तुला (दोनों शुक्र की राशियाँ), या मकर-मिथुन।
मामूली वैचारिक मतभेद संभव हैं, लेकिन उनका समाधान संभव होता है। यदि अन्य योग अच्छे हों, तो यह दोष दांपत्य जीवन को अधिक नुकसान नहीं पहुँचाता। मित्रता, समझदारी और सहनशीलता से रिश्ता स्थिर रह सकता है। मित्र षडाष्टक में विवाह संभव है यदि कुंडली के अन्य योग अनुकूल हों।
यह मध्यम तीव्रता का दोष होता है, लेकिन विवाह के लिए सतर्कता आवश्यक होती है।
जब दो राशियाँ षष्ठ या अष्टम संबंध में हों और आपस में शत्रु ग्रहों की राशियाँ हों - जैसे सूर्य-शनि, मंगल-बुध, चंद्र-राहु आदि - तो यह “शत्रु षडाष्टक” कहलाता है।
| प्रकार | तीव्रता | विवाह की संभावना |
|---|---|---|
| मृत्यु षडाष्टक | अत्यधिक गंभीर | अत्यधिक सावधानी, अधिकतर वर्जित |
| शत्रु षडाष्टक | मध्यम तीव्र | उपायों के साथ संभव |
| मित्र षडाष्टक | सौम्य | कुंडली के अन्य भाग अनुकूल हों तो स्वीकार्य |
षडाष्टक दोष का केवल एक ही प्रकार नहीं होता, बल्कि यह विभिन्न स्तरों पर उपस्थित हो सकता है-मानसिक, शारीरिक, व्यवहारिक और आध्यात्मिक। एक कुंडली में केवल चंद्र राशि देखकर ही निर्णय लेना अधूरी दृष्टि होगी। पूर्ण कुंडली (लग्न, चंद्र, नवांश, सप्तम भाव) के समग्र विश्लेषण से ही दोष की प्रकृति और उसका शमन समझा जा सकता है।
सबसे सामान्य और प्रचलित प्रकार, जिसमें वर और वधू की चंद्र राशियाँ एक-दूसरे से 6वें या 8वें स्थान पर स्थित होती हैं। यह मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संघर्षों को जन्म दे सकता है।
यदि वर और वधू के लग्न (Ascendants) एक-दूसरे से षष्ठ या अष्टम स्थान पर हों, तो यह दोष और अधिक शारीरिक, व्यवहारिक और जीवनशैली आधारित असमानताओं को दर्शाता है। इससे दीर्घकालिक संघर्ष या तालमेल की समस्या हो सकती है।
यदि चंद्र राशि भले ही अनुकूल हो, लेकिन सप्तम भाव (विवाह का घर) या उसके स्वामी की स्थिति षष्ठ-अष्टम में हो तो यह भी षडाष्टक के प्रभाव को सक्रिय कर सकता है, विशेषकर संबंधों में असंतुलन और संवादहीनता लाता है।
कभी-कभी शुक्र और बृहस्पति जैसे विवाह से जुड़े ग्रह एक-दूसरे की कुंडली में षष्ठ-अष्टम स्थिति में हों, तो वे भी संबंधों में आंतरिक द्वंद्व या संतुलन की कमी उत्पन्न कर सकते हैं। इसे ग्रहाधारित षडाष्टक प्रभाव माना जाता है।
यदि मुख्य कुंडली में षडाष्टक दोष नहीं है, परंतु नवांश (D9) कुंडली में चंद्र, लग्न या सप्तम भाव की राशियाँ षष्ठ-अष्टम संबंध में हों, तो यह अंतर्मन, संस्कार और गहराई से जुड़ी टकराव की स्थितियाँ दिखाता है।
षडाष्टक दोष केवल एक स्थूल नियम नहीं है; उसकी गहराई में यह देखा जाता है कि राशियों की प्रकृति, ग्रहों की मित्रता या शत्रुता और दोष की तीव्रता क्या है। इसी आधार पर यह निर्णय लिया जा सकता है कि विवाह योग्य है या नहीं।
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