By पं. नीलेश शर्मा
जानिए गणपति अथर्वशीर्ष मंत्र का वैदिक महत्व, सही पाठ विधि, दिव्य लाभ और इसके गहरे आध्यात्मिक रहस्यों की विस्तारपूर्वक जानकारी

गणपति अथर्वशीर्ष एक अत्यंत पवित्र वैदिक स्तोत्र है, जिसकी रचना अथर्ववेद की परंपरा में हुई मानी जाती है। यह स्तोत्र भगवान गणेश को समर्पित है, जिन्हें सनातन परंपरा में प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता कहा गया है। कोई भी शुभ कार्य हो, यज्ञ, व्रत, विवाह या नामकरण-गणेश जी का स्मरण किए बिना आरंभ नहीं होता। गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है, बल्कि मानसिक शांति, बाधा निवारण और आत्मिक उन्नति में सहायक माना गया है।
‘गणपति अथर्वशीर्ष’ एक वेदमंत्रात्मक स्तोत्र है जिसमें भगवान गणेश के स्वरूप, शक्ति और ब्रह्मतत्व को व्याख्यायित किया गया है। इसमें उन्हें प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा गया है-कर्त्ता, धर्ता, और हर्ता। यह ग्रंथ न केवल भक्तिभाव को पोषित करता है, बल्कि अद्वैत वेदांत के गूढ़ सिद्धांतों को भी सरल शब्दों में प्रस्तुत करता है। इसे नियमित रूप से पढ़ने से साधक का मन शुद्ध होता है और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।
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ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।। स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः।। ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शांतिः॥ शांतिः॥ शांतिः॥
अर्थ: यह मंत्र मेरे लिए एक प्रार्थना है - मैं चाहता हूँ कि मेरे कानों से मैं केवल शुभ और कल्याणकारी वचन सुनूं, मेरी आँखों से मैं केवल पवित्र और सुंदर दृश्य देख सकूं। मेरा शरीर स्वस्थ, स्थिर और सशक्त रहे ताकि मैं अपने संपूर्ण अस्तित्व से देवताओं की स्तुति कर सकूं। मैं यह जीवन देवहित में और धर्म के मार्ग पर चलते हुए शांतिपूर्वक व्यतीत करना चाहता हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि इन्द्र मुझे शक्ति दें, पूषा (सूर्य देव) मुझे ज्ञान और दृष्टि दें, तार्क्ष्य (गरुड़) मुझे सभी बाधाओं से पार करवाएं, और बृहस्पति मेरी बुद्धि को सही मार्ग दिखाएं। अंत में, मैं तीनों लोकों - मेरे मन, शरीर और वातावरण - में पूर्ण शांति की कामना करता हूँ। शांति हो, शांति हो, शांति हो।
ॐ नमस्ते गणपतये।। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि। त्वमेव केवलं धर्ताऽसि। त्वमेव केवलं हर्ताऽसि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ।।1।। ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।। 2 ।। अव त्वं माम् । अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अवानूचानमव शिष्यम्। अव पश्चात्तात्। अव पुरस्त्तात्। अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात्। अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात् ॥3॥
अर्थ: मैं भगवान गणपति को नमस्कार करता हूँ। मैं जानता हूँ कि आप ही प्रत्यक्ष रूप से परम तत्त्व हैं। आप ही सृष्टि के एकमात्र कर्ता, पालनकर्ता और संहारक हैं। यह सम्पूर्ण जगत आप ही हैं - आप ही परम ब्रह्म हैं। आप ही साक्षात् आत्मा हैं जो नित्य, अविनाशी और सबमें व्याप्त है। मैं आज जो कुछ कह रहा हूँ, वह ऋत (शाश्वत धर्म) है, और मैं सत्य ही बोल रहा हूँ। हे प्रभु, मेरी रक्षा कीजिए - मेरी वाणी की, मेरी सुनने की शक्ति की, मेरे ज्ञान की, मेरी स्मृति की, मेरे देने और ग्रहण करने की शक्ति की। मेरी गुरुता और शिष्यता दोनों की रक्षा कीजिए। मेरी हर दिशा से रक्षा कीजिए - पीछे से, आगे से, उत्तर से, दक्षिण से, ऊपर से, नीचे से - सब ओर से मेरी रक्षा कीजिए। हे गणपति, मुझे चारों ओर से समग्र रूप में सुरक्षा प्रदान कीजिए।
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मय:। त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय:। त्वं सच्चिदानंदा द्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥4॥ सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते॥ सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति॥ सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति॥ सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति॥ त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः॥ त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥5॥
अर्थ: मैं महसूस करता हूँ कि आप ही वाणी, ज्ञान और चेतना के स्रोत हैं। आप आनंदमय और ब्रह्ममय हैं, और आप सच्चिदानंद के रूप में पूर्ण हैं। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं, जो ज्ञान और विज्ञान दोनों से परिपूर्ण हैं। इस संसार का सारा अस्तित्व आपसे उत्पन्न होता है, आप ही उसमें स्थिर रहते हैं, और अंततः सब कुछ आप में ही विलीन हो जाता है। आप ही इस जगत में सब कुछ वापस लौटते हैं। आप भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश के रूप में सभी तत्व हैं, और आप ही चारों वाणी के रूप हैं। मैं जानता हूँ कि आप ही इस सृष्टि के आधार हैं, जो सब कुछ समेटे हुए हैं।
त्वं गुणत्रयातीतः त्वमवस्थात्रयातीतः॥ त्वं देहत्रयातीतः ॥ त्वं कालत्रयातीतः॥ त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्॥ त्वं शक्तित्रयात्मकः॥ त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं॥ त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम्॥6॥ गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादि तदनंतरम्॥ अनुस्वारः परतरः ॥ अर्धेन्दुलसितम् ॥ तारेण ऋद्धम्॥ एतत्तव मनुस्वरूपम् ॥ गकारः पूर्वरूपम्॥ अकारो मध्यमरूपम् ॥ अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्॥ बिन्दुरुत्तररूपम् ॥ नादः संधानम्॥ संहितासंधिः ॥ सैषा गणेशविद्या॥ गणकऋषिः ॥ निचृद्गायत्रीच्छंदः॥ गणपतिर्देवता ॥ ॐ गं गणपतये नमः॥7॥ एकदंताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥8॥
अर्थ: मैं सब गुणों और अवस्थाओं से परे हूँ, मैं शरीर के तीनों रूपों से, और समय के तीनों चरणों से स्वतंत्र हूँ। मैं सदा मूल आधार में स्थित हूँ और तीनों शक्तियों का स्वरूप हूँ। योगी निरंतर मेरा ध्यान करते हैं क्योंकि मैं ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र और ब्रह्मा, भू, भुवः, स्वः तीनों लोकों में व्याप्त हूँ। मैं गणों और वर्णों के मूल स्वरूप हूँ, मेरा स्वरूप मनु के स्वरूप जैसा है। मैं ‘ग’ से शुरू होकर ‘ं’ तक सभी ध्वनियों का आधार हूँ। गणेश विद्या मेरी है, मैं गणपति हूँ, और मेरी उपासना से ज्ञान और शक्ति प्राप्त होती है। मैं एकदंत (एक दांत वाले), वक्रतुण्ड (टेढ़े-दांत वाले) रूप में प्रतिष्ठित हूँ, और मैं अपने भक्तों को प्रोत्साहित करता हूँ।
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्। रदं च वरदं हस्तैर्ब्रिभ्राणं मूषकध्वजम्। रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्। भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्। एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:॥9॥ नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। नम: प्रमथपतये। नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय। विघ्ननाशिने शिवसुताय। श्री वरदमूर्तये नमो नमः॥10॥
अर्थ: मैं एकदंत हूँ, चार हाथों वाला, जिनमें पाश और अंकुश हैं, और मेरे हाथों में रद और वरदान देने वाली मुद्रा है। मेरा ध्वज मूषक (चूहा) है, मेरा शरीर रक्तवर्णी है, लंबोदर और शूर्पकर्णक हूँ, मैं रक्त की महक से सुगंधित हूँ और रक्तपुष्पों से पूजित हूँ। मैं भक्तों के प्रति करुणामय और जगत के कारण हूँ, जो सृष्टि के आरंभ में प्रकृति और पुरुष से भी परे उत्पन्न हुआ। जो योगी मुझे निरंतर ध्यान करता है, वह योगियों में श्रेष्ठ होता है। मैं व्रातपति, गणपति, प्रमथपति हूँ, लंबोदर, एकदंत, विघ्ननाशक और शिव का पुत्र हूँ। मैं वरद रूप में पूजित हूँ और मेरी भक्ति से सभी बाधाएँ दूर होती हैं।
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते। स ब्रह्मभूयाय कल्पते। स सर्वतः सुखमेधते । स सर्वविघ्नैर्नबाध्यते। स पञ्चमहापापातप्रमुच्यते ॥11॥ सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायंप्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति। सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति। धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ॥12॥ इदम् अथर्वशीर्षमऽशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते। तं तमनेन साधयेत्॥13॥ अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति। चतुर्थ्यामनश्नञ्जपति स विद्यावान् भवति। इत्यथर्वण वाक्यं। ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्। न बिभेति कदाचनेति ॥14॥
अर्थ: जब मैं इस गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करता हूँ, तो मैं ब्रह्मस्वरूप बन जाता हूँ। मुझे सभी ओर से सुख की प्राप्ति होती है और कोई विघ्न मुझे बाधित नहीं करता। इस स्तोत्र का नियमित जप करने से मैं पाँचों महापापों से मुक्त हो जाता हूँ। यदि मैं इसे शाम को पढ़ता हूँ, तो दिन में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं; यदि सुबह पढ़ता हूँ, तो रात के पाप मिट जाते हैं। जब मैं सुबह-शाम इसका पाठ करता हूँ, तो पापरहित हो जाता हूँ और जीवन में कोई विघ्न नहीं आता। मुझे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं। मैं यह जानता हूँ कि इस रहस्य को अयोग्य शिष्य को नहीं देना चाहिए, जो अज्ञानवश इसे देता है, वह पापी होता है। जब मैं इसे हज़ार बार पढ़कर किसी कामना का जप करता हूँ, तो वह कामना निश्चित रूप से पूर्ण होती है। इसी स्तोत्र से जब मैं गणपति का अभिषेक करता हूँ, तो वाक्पटु बनता हूँ; चतुर्थी को उपवास कर इसका जप करूँ तो विद्वान बन जाता हूँ। यही अथर्ववेद का वचन है-जो इसे जानता है, वह किसी बात से डरता नहीं।
यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति। स मेधावान् भवति। यो मोदकसहस्रेण यजति। स वाञ्छितफलमवाप्नोति। यः साज्यसमिद्भिर्यजति। स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥15॥ अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति। सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रो भवति। महाविघ्नात्प्रमुच्यते। महादोषात्प्रमुच्यते। महापापात् प्रमुच्यते। स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति। य एवं वेद इत्युपनिषत् ॥ 16॥ ॥ अथर्ववेदीय गणपति उपनिषद समाप्त ॥
अर्थ: जब मैं गणपति की उपासना दूर्वा के अंकुरों से करता हूँ, तो मैं कुबेर के समान धन-धान्य से भरपूर हो जाता हूँ। जब मैं लाज (भुने हुए धान) से पूजन करता हूँ, तो मुझे यश, मेधा और बुद्धिमत्ता प्राप्त होती है। यदि मैं हज़ार मोदकों से गणपति का यज्ञ करता हूँ, तो मेरी सारी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। जब मैं आज्य और समिधा से यज्ञ करता हूँ, तो मुझे सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं-सभी सुख, सभी फल। जब मैं आठ ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक यह ज्ञान देता हूँ, तो मुझे सूर्य के समान तेज़ प्राप्त होता है। यदि मैं इस मंत्र का जाप सूर्यग्रहण के समय, किसी महानदी के किनारे या गणेश प्रतिमा के पास करता हूँ, तो मुझे सिद्धि प्राप्त होती है। मैं महान विघ्नों, दोषों और पापों से मुक्त हो जाता हूँ। मैं सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त करता हूँ, मुझे समस्त विद्याएँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। जो इस रहस्य को जानता है, वह समस्त सत्य का ज्ञाता बन जाता है-यह उपनिषद का वचन है।
ॐ सहनाववतु । सहनौभुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥ ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शांतिः॥ शांतिः॥ शांतिः॥ ॥ इति श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्तोत्रम् ॥
अर्थ: मैं प्रार्थना करता हूँ कि भगवन्, आप मुझे और मेरे सहपाठी को साथ-साथ सुरक्षा प्रदान करें, हमें साथ में भोजन दें, और मिलकर हम बल, बुद्धि और पराक्रम से युक्त होकर अध्ययन करें। हमारी पढ़ाई में तेजस्विता बनी रहे और हम एक-दूसरे से कभी द्वेष न करें। हे देवगण! मेरे कान सदा शुभ वचनों को सुनें, मेरी आँखें शुभ दर्शन करें। मेरी इंद्रियाँ स्वस्थ, स्थिर और श्रद्धापूर्वक स्तुति करने में समर्थ रहें ताकि मैं अपना जीवन देवताओं के हित में व्यतीत कर सकूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि इन्द्र देव, पूषन, गरुड़ रूपी तार्क्ष्य और बृहस्पति-ये सभी मुझे शुभ और कल्याणकारी प्रभाव दें। अंत में, मैं चाहता हूँ कि मेरे शरीर, मन और आत्मा में पूर्ण शांति बनी रहे-ऊपर, नीचे और चारों दिशाओं में शांति हो। इस प्रकार, मैं श्रद्धा और भक्ति के साथ श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्तोत्र का समापन करता हूँ।
विशेष: संकष्टी चतुर्थी के दिन यदि 21 बार अथर्वशीर्ष का पाठ किया जाए, तो यह विशेष फल देता है।
इस स्तोत्र में भगवान गणेश को केवल विघ्नहर्ता के रूप में नहीं, बल्कि पूर्ण ब्रह्मस्वरूप माना गया है - “त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।” अर्थात, "तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो।" वेदों में वर्णित तत्वज्ञान, पंचमहाभूतों की व्याख्या, वाणी के चारों रूप (परा, पश्यंती, मध्यमा, वैखरी) और आत्मा-ब्रह्म की एकता का संदेश इस मंत्र में समाहित है।
इस स्तोत्र में ‘ॐ गं गणपतये नमः’ बीज मंत्र का गूढ़ विश्लेषण किया गया है। ध्यान मंत्र में श्री गणेश को रक्तवर्ण, लंबोदर, शूर्पकर्ण और चतुर्भुज रूप में ध्यान किया गया है जो अंकुश, पाश, वरमुद्रा और रत्न धारण करते हैं।
गणपति अथर्वशीर्ष केवल एक स्तोत्र नहीं, एक आध्यात्मिक साधना है जो भक्त को आत्मा और ब्रह्म के बीच की एकता का बोध कराता है। यह विद्या, बुद्धि, बल, और भक्ति का समागम है। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करता है, उसे लौकिक सुखों के साथ-साथ अध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है।
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