By पं. नीलेश शर्मा
जानिए अग्नि देव की उत्पत्ति की पौराणिक कथा, समुद्र मंथन में उनकी भूमिका और ब्रह्मांडीय महत्व

समुद्र मंथन की कथा और वैदिक साहित्य में अग्नि देव की उत्पत्ति के कई रूप मिलते हैं। पुराणों और ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार अग्नि का जन्म प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हुआ था। जब सृष्टि का आरंभिक काल था और ब्रह्मांड में प्रकाश, ऊर्जा तथा यज्ञ की शक्ति का अभाव था, तब ब्रह्मा ने ध्यान अवस्था में अपने मस्तक अर्थात ललाट से एक दिव्य तेज प्रकट किया। यह तेज इतना प्रचंड था कि संपूर्ण सृष्टि आलोकित हो उठी। इसी तेज को ब्रह्मा ने अग्नि का रूप दिया।
अग्नि देव केवल प्रकाश नहीं, बल्कि शुद्धि, चेतना और ज्ञान के भी अधिष्ठाता माने गए। समुद्र मंथन की कथा में भी, जब क्षीरसागर का मंथन हुआ, तब मंथन की तीव्रता से एक दिव्य अग्नि प्रकट हुई जिसे ब्रह्मा ने नियंत्रित कर देवता का रूप दिया।
सृष्टि के प्रारंभ में जब ना प्रकाश था, ना ऊर्जा, तब ब्रह्मा गहन ध्यान में लीन थे। उसी समय उनके मस्तक से एक दिव्य तेज निकला। यह तेज सृष्टि के संचालन हेतु आवश्यक शक्ति थी। इस दिव्य ज्वाला को ब्रह्मा ने अग्नि का स्वरूप दिया। अग्नि देव यज्ञ के वाहक बने, देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु बने और शुद्धि तथा पवित्रता के प्रतीक माने गए।
समुद्र मंथन के समय जब दिव्य ज्वाला उत्पन्न हुई, तब भी ब्रह्मा ने उसे देवता का रूप देकर सृष्टि की रक्षा और संतुलन में स्थापित किया। अग्नि ने विष के प्रभाव को कम करने में सहायता की और शिव के शरीर की उष्णता को संतुलित रखने में भूमिका निभाई।
समुद्र मंथन और अग्निदेव की उत्पत्ति: दिव्य ज्वाला का जन्म
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| जन्मदाता | प्रजापति ब्रह्मा |
| जन्म स्थान | ब्रह्मा का मस्तक (ललाट) |
| समुद्र मंथन में भूमिका | दिव्य ज्वाला के रूप में प्रकट होकर ब्रह्मा द्वारा देवता रूप प्रदान |
| अन्य नाम | अभिमानी, जाटवेद, पावक, कृव्याद |
| स्वरूप | पृथ्वी पर अग्नि, आकाश में बिजली, सूर्य में तेज |
1. अग्नि देव का जन्म कैसे हुआ माना गया है?
अग्नि का जन्म ब्रह्मा के मस्तक से उत्पन्न दिव्य तेज से हुआ।
2. समुद्र मंथन में अग्नि की क्या भूमिका थी?
दिव्य ज्वाला के रूप में प्रकट होकर सृष्टि की रक्षा और संतुलन में योगदान दिया।
3. अग्नि देव को देवताओं का मुख क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे यज्ञ की आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं।
4. अग्नि के तीन प्रमुख रूप कौन से हैं?
पृथ्वी पर अग्नि, आकाश में विद्युत और सूर्य में तेज।
5. अग्नि देव का दार्शनिक अर्थ क्या है?
अग्नि शुद्धि, चेतना, ऊर्जा और ज्ञान का प्रतीक है।
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