By पं. अमिताभ शर्मा
श्रीकृष्ण के जन्म की यह कथा पुष्य नक्षत्र को सौभाग्य और शुभता का प्रतीक बनाती है

भारतीय संस्कृति में पुष्य नक्षत्र को अत्यंत शुभ, दिव्य और कल्याणकारी माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मकथा से इसका संबंध इसे और भी पावन बना देता है। यह कथा केवल ज्योतिषीय नहीं, बल्कि भावनाओं, संघर्ष और विजय के गहन संदेशों से भरी हुई है।
द्वापर युग में कंस ने सत्ता के लोभ में अपने पिता उग्रसेन को बंदी बना लिया और मथुरा का राजा बन बैठा। अपनी बहन देवकी के विवाह के समय उसे आकाशवाणी सुनाई दी कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी। भय और क्रोध में उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया तथा उनकी हर संतान को जन्म लेते ही मार दिया।
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात, जब कारागार में अंधकार और भय का वातावरण था, तभी देवकी की आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण प्रकट हुए। चंद्रमा अपनी प्रिय रोहिणी नक्षत्र में था, जिससे वातावरण में दिव्यता फैल गई। कारागार का प्रकाश बढ़ा, हथकड़ियाँ अपने आप खुल गईं और पहरेदार निद्रा में चले गए।
भगवान विष्णु ने वसुदेव को आदेश दिया कि वे नवजात श्रीकृष्ण को गोकुल पहुँचा दें और वहाँ की नवजात कन्या को लेकर लौट आएँ। वसुदेव ने कृष्ण को टोकरी में रखा और मूसलाधार वर्षा के बीच यमुना को पार किया। यमुना ने जैसे ही छोटे बालक के चरणों को स्पर्श किया, वह शांत हो गई। वसुदेव सुरक्षित रूप से गोकुल पहुँचे, कृष्ण को यशोदा के पास सुलाया और कन्या को लेकर मथुरा लौट आए।
कंस जैसे ही कन्या को मारने का प्रयास करता, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हुई और देविरूप में बोली – “हे कंस, तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है और वृंदावन पहुँच गया है।” यह कन्या स्वयं योगमाया थीं।
नंद-यशोदा ने श्रीकृष्ण का पालन-पोषण प्रेम और वात्सल्य से किया। कंस ने अनेक बार कृष्ण को मारने का प्रयास किया, पर हर बार असफल रहा। अंततः कृष्ण ने मथुरा जाकर कंस का वध किया और उग्रसेन को पुनः सिंहासन पर स्थापित किया।
पुष्य नक्षत्र - पोषण, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र
श्रीकृष्ण की जन्मकथा बताती है कि अंधकार के बीच भी शुभता और सौभाग्य मार्ग खोज ही लेता है। जब जीवन में संघर्ष बढ़ते हैं, तब धैर्य, विश्वास और कर्तव्य ही प्रकाश बनते हैं। पुष्य नक्षत्र की ऊर्जा भी यही बताती है कि हर शुभारंभ में दिव्यता का बीज छिपा होता है।
1. श्रीकृष्ण का जन्म किस परिस्थिति में हुआ?
कारागार में, आधी रात को, अत्याचार और भय से भरे वातावरण में।
2. वसुदेव यमुना कैसे पार कर सके?
क्योंकि श्रीकृष्ण के चरण स्पर्श करते ही यमुना शांत हो गई।
3. कन्या के रूप में कौन प्रकट हुईं?
योगमाया, जिन्होंने कंस को उसके विनाश का संकेत दिया।
4. इस कथा में पुष्य नक्षत्र क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह नक्षत्र शुभता, सौभाग्य और दिव्य आरंभ का प्रतीक है।
5. कथा पाठकों को क्या संदेश देती है?
अंधकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, शुभता और सत्य अंत में अपनी राह बना लेते हैं।
जन्म नक्षत्र मेरे बारे में क्या बताता है?
मेरा जन्म नक्षत्र
अनुभव: 32
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