ज्योतिष में ग्रहों की अंशानुसार अवस्थाएँ क्या होती हैं और उनका जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

By अपर्णा पाटनी

जानें बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत अवस्था में ग्रहों का महत्व और उनका फल।

ग्रह अवस्थाएँ

वैदिक ज्योतिष शास्त्र कहता है कि ग्रह केवल अपनी राशि और भाव से ही फल नहीं देते बल्कि उनके अंश (डिग्री) भी यह बताते हैं कि वे कितनी शक्ति से काम कर रहे हैं। ग्रह किस अवस्था में है, यह तय करता है कि वह शुभ या अशुभ फल कितनी क्षमता से देगा।

विषम और सम राशियाँ कौन सी हैं?

राशियों को दो वर्गों में बाँटा गया है।

  • विषम राशियाँ (पुरुष या क्रूर): मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ
  • सम राशियाँ (स्त्री या सौम्य): वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन

इन्हीं पर आधारित होकर ग्रहों की अंशानुसार अवस्थाएँ तय की जाती हैं।

क्या विषम और सम राशियों में ग्रहों की डिग्री अलग-अलग प्रभाव देती है?

ग्रहों की अंशानुसार अवस्थाएँ कैसे तय होती हैं?

हर राशि में 30 अंश होते हैं। इन 30 अंशों को 6-6 अंश के 5 हिस्सों में बाँटा जाता है। हर भाग में ग्रह की एक अलग अवस्था होती है।

विषम राशियों में ग्रह की अवस्थाएँ

  • 0°-6° : बाल अवस्था
  • 7°-12° : कुमार अवस्था
  • 13°-18° : युवा अवस्था
  • 19°-24° : वृद्ध अवस्था
  • 25°-30° : मृत अवस्था

सम राशियों में ग्रह की अवस्थाएँ (क्रम उल्टा हो जाता है)

  • 0°-6° : मृत अवस्था
  • 7°-12° : वृद्ध अवस्था
  • 13°-18° : युवा अवस्था
  • 19°-24° : कुमार अवस्था
  • 25°-30° : बाल अवस्था

तालिका: ग्रहों की अंशानुसार अवस्थाएँ

राशि का प्रकार0-6°7-12°13-18°19-24°25-30°
विषम राशिबालकुमारयुवावृद्धमृत
सम राशिमृतवृद्धयुवाकुमारबाल

ग्रहों की प्रत्येक अवस्था का फल क्या है?

  • बाल अवस्था: ग्रह कमजोर होता है और फल अधूरा देता है। यह स्थिति सीखने और बढ़ने का संकेत है।
  • कुमार अवस्था: ग्रह आधी शक्ति के साथ कार्य करता है। संघर्ष भी होता है और सफलता भी आंशिक रहती है।
  • युवा अवस्था: सबसे बलवान स्थिति, जहाँ ग्रह अपनी पूरी ताकत से परिणाम देता है। यह अवस्था करियर, विवाह और धन के लिए सबसे शुभ मानी जाती है।
  • वृद्ध अवस्था: ग्रह थका हुआ माना जाता है, इसलिए यह बहुत सीमित परिणाम देता है।
  • मृत अवस्था: ग्रह निष्क्रिय हो जाता है। ऐसा ग्रह शुभ फल देने में असमर्थ होता है और अक्सर बाधाएँ बढ़ाता है।

उदाहरण से समझें

यदि किसी जातक की कुंडली में बृहस्पति (गुरु) धनु राशि में 15° पर स्थित है, तो वह युवा अवस्था में है। इसका अर्थ है कि जातक को शिक्षा, संतान और भाग्य में अत्यधिक अच्छे परिणाम मिलेंगे। वहीं यदि वही बृहस्पति 27° पर बैठा हो, तो वह मृत अवस्था में होगा और परिणाम कमजोर हो जाएँगे।

योगकारक और मारक ग्रहों में डिग्री का महत्व

  • हर लग्न के लिए कुछ ग्रह योगकारक होते हैं जो सफलता और धन प्रदान करते हैं।
  • कुछ ग्रह मारक कहलाते हैं जो कठिनाई और मृत्यु तुल्य कष्ट दे सकते हैं।
  • यदि योगकारक ग्रह युवा अवस्था में हों तो राजयोग जैसा फल मिलता है।
  • यदि वही ग्रह मृत अवस्था में हों तो उनका शुभ फल भी कम हो जाता है।

ग्रहों की युति और डिग्री का असर

जब दो या अधिक ग्रह एक ही भाव में बैठते हैं तो उसे युति कहते हैं।

  • यदि ग्रह आपस में डिग्री के हिसाब से बहुत पास हों तो प्रभाव बहुत मजबूत होता है।
  • यदि डिग्री की दूरी अधिक हो तो युति का प्रभाव कमजोर हो जाता है।
  • अशुभ ग्रहों की निकटता संघर्ष और बाधाएँ बढ़ाती है।

तुलनात्मक तालिका: ग्रह की अवस्था और उसका प्रभाव

अवस्थाबलपरिणाम
बालकमजोरअधूरा फल, अस्थिरता
कुमारमध्यमसंघर्ष के बाद आंशिक सफलता
युवासबसे मजबूतपूर्ण सफलता और शक्ति
वृद्धकमज़ोरसीमित परिणाम, थकान
मृतनिष्क्रियशुभ फल न मिलना, बाधाएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

ग्रहों की अंशानुसार अवस्था क्यों देखना जरूरी है?

क्योंकि यह बताती है कि ग्रह वास्तव में कितने बलवान हैं और वे किस स्तर तक फल देंगे।

सबसे शुभ अवस्था कौन सी है?

युवा अवस्था को सबसे शक्तिशाली और फलदायी माना जाता है।

मृत अवस्था का असर क्या होता है?

मृत अवस्था में ग्रह बहुत कमजोर होता है और शुभ परिणाम नहीं दे पाता।

योगकारक ग्रह कब ज्यादा लाभ देते हैं?

जब वे युवा अवस्था में हों और शुभ ग्रहों की दृष्टि पा रहे हों।

ग्रहों की युति में डिग्री का महत्व क्यों है?

क्योंकि डिग्री जितनी निकट होगी उतना ही उनका प्रभाव गहरा और मजबूत होगा।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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