By पं. अभिषेक शर्मा
आस्था, नारी शक्ति और वैवाहिक जीवन की अनूठी परंपरा

एक परंपरा तब जीवित रहती है जब वह केवल एक कर्मकांड न होकर जीवन के भीतर किसी गहरे सत्य को जगाती है। वट सावित्री व्रत उसी जीवंत परंपरा का उदाहरण है। यह वह दिन है जब स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन की स्थिरता के लिए केवल पूजा ही नहीं करतीं बल्कि अपने मन में एक ऐसा संकल्प भी जगाती हैं जो जीवन को दीर्घायु प्रेम और स्नेह से भर देता है। इस व्रत के पीछे उपस्थित कथा और आध्यात्मिक शक्ति भारतीय संस्कृति को एक बहुत ही सुंदर रूप में प्रस्तुत करती है।
वट सावित्री व्रत सोमवार 26 मई 2025 को रखा जाएगा। यह दिन इसलिए विशेष माना गया है क्योंकि इस दिन सोमवती अमावस्या का संयोग बन रहा है। धार्मिक परंपराओं में अमावस्या का महत्व अपने आप में विशिष्ट माना जाता है और जब यह सोमवार को आती है तब इसका प्रभाव शुभ माना जाता है। इस व्रत को इस संयोग में करना अत्यंत लाभकारी माना गया है।
| विवरण | समय |
|---|---|
| व्रत की तिथि | सोमवार 26 मई 2025 |
| अमावस्या प्रारंभ | दोपहर 12 बजकर 11 मिनट |
| अमावस्या समाप्त | सुबह 8 बजकर 31 मिनट अगले दिन |
| अभिजीत मुहूर्त | 11 बजकर 54 मिनट से 12 बजकर 42 मिनट |
| चंद्र नक्षत्र | भरणी |
| चंद्र राशि | वृषभ |
| विशेष योग | शोभन योग और अतिगंड योग |
इन सभी योगों को अत्यंत शुभ माना गया है। ऐसे ग्रह योग में किया गया व्रत सदैव फलदायी माना जाता है। यह दिन मानसिक स्पष्टता समर्पण और स्थिरता को बढ़ाता है।
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वट सावित्री व्रत के केंद्र में सावित्री और सत्यवान की कथा है जिसे भारतीय संस्कृति में स्त्री की निष्ठा का सबसे सुंदर उदाहरण माना जाता है। महाभारत और अन्य पौराणिक ग्रंथों में इस कथा को अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ बताया गया है। इस कथा में केवल दांपत्य प्रेम ही नहीं बल्कि धर्म ज्ञान और साहस की अद्भुत शक्ति भी दिखाई देती है।
राजकुमारी सावित्री ने सत्यवान को अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार किया। वह जानती थीं कि सत्यवान की आयु अल्प है पर उनका निर्णय प्रेम श्रद्धा और अपनी आत्मिक शक्ति पर आधारित था। नियत दिन पर जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर लौटने लगे तब सावित्री उनके पीछे चल दीं। यमराज ने कई बार समझाया कि जीवित प्राणी मृत्यु से नहीं बच सकता पर सावित्री ने अपना धैर्य और ज्ञान बनाए रखा।
उन्होंने यमराज से अपने ससुर की ज्योति अपने परिवार के राज्य अपने वंश के लिए संतानों की कामना और अंत में अपने पति के जीवन की प्रार्थना की। यमराज उनकी निष्ठा से प्रभावित हुए और सत्यवान को जीवन दान दिया। यह कथानक दर्शाता है कि जब स्त्री का संकल्प अडिग हो जाता है तब वह असंभव से असंभव परिस्थिति को भी बदल सकती है।
वट वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं बल्कि हिंदू धर्म में त्रिदेवों का प्रतीक माना गया है। इसकी जड़ें सृष्टि के आरंभ का रूप मानी जाती हैं जो ब्रह्मा का संकेत देती हैं। तना स्थिरता और संरक्षण का प्रतीक है जो विष्णु के स्वरूप को दर्शाता है। शाखाएं विस्तार और संहार दोनों का बोध कराती हैं इसलिए इन्हें शिव का प्रतीक माना गया है।
विवाहित जीवन में स्थिरता का महत्व अत्यंत गहरा माना जाता है। वट वृक्ष शाश्वतता और धैर्य का संकेत देता है। इसी कारण विवाहित स्त्रियां इसकी पूजा करती हैं और जीवन में सौभाग्य प्रेम और समृद्धि की इच्छा करती हैं।
व्रत का आरंभ सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करने से होता है। इसके बाद संकल्प लेकर विशेष पूजा प्रारंभ की जाती है। व्रत की विधि विस्तृत है क्योंकि इसमें कई प्रकार की सामग्री और आचरण शामिल हैं।
| सामग्री | उपयोग |
|---|---|
| पीली चुनरी | पूजन के लिए |
| पूजा थाली | सभी सामग्री रखने के लिए |
| रोली अक्षत मौली | पूजन और परिक्रमा के लिए |
| फूल और फल | अर्पण के लिए |
| सात प्रकार के अनाज | पूजा का महत्त्वपूर्ण भाग |
| पंचामृत और जल कलश | अभिषेक के लिए |
| वट वृक्ष की डाली या समीपस्थ वट वृक्ष | मुख्य पूजन हेतु |
| सावित्री सत्यवान का चित्र | कथा स्मरण के लिए |
| सूत का धागा | वृक्ष की परिक्रमा के लिए |
स्नान और संकल्प
सुबह उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
पूजन स्थल की तैयारी
वट वृक्ष के निकट स्थान को साफ करें और पूजा की चौकी सजाएं।
वट वृक्ष की पूजा
वृक्ष पर जल चढ़ाएं।
हल्दी और रोली अर्पित करें।
फूल चढ़ाएं।
सूत का धागा लेकर सात या ग्यारह बार परिक्रमा करें।
सावित्री सत्यवान पूजन
मूर्ति या चित्र को सजा कर पूजा करें।
वस्त्र सुहाग सामग्री और फल चढ़ाएं।
पंचामृत अर्पित करें।
व्रत कथा का श्रवण
कथा का पाठ करें या किसी विद्वान ब्राह्मण से सुनें।
आरती और प्रसाद
दीप प्रज्वलित करें और आरती करें।
प्रसाद ग्रहण करें और वितरित करें।
पारण
अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत समाप्त करें।
यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा रखा जाता है क्योंकि यह पति की दीर्घायु के लिए होता है। नवविवाहित महिलाएं इसे गृहस्थ जीवन की स्थिरता के लिए रखती हैं। कुछ क्षेत्रों में अविवाहित महिलाएं भी योग्य जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं।
इस दिन सात्विकता का पालन किया जाता है।
झूठ क्रोध और विवाद से दूर रहना चाहिए।
निंदा और छल से बचना चाहिए।
भोजन न करना श्रेष्ठ माना गया है पर आवश्यकता हो तो फलाहार ग्रहण किया जा सकता है।
अधिक से अधिक मौन रखना या सत्संग करना कल्याणकारी माना गया है।
व्रत के अनेक आध्यात्मिक और पारिवारिक लाभ बताए गए हैं।
| लाभ | विवरण |
|---|---|
| पति की दीर्घायु | व्रत का मुख्य उद्देश्य |
| गृहस्थ जीवन में स्थिरता | दांपत्य संबंधों में दृढ़ता |
| संतानों का सुख | परिवार में उन्नति |
| आत्मबल में वृद्धि | मन की दृढ़ता |
| आध्यात्मिक शुद्धि | मन और आत्मा की पवित्रता |
यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह स्त्री शक्ति का प्रतीक है और यह भी दर्शाता है कि समर्पण और निष्ठा जीवन की दिशा बदल सकते हैं। व्रत का प्रभाव मन को शांत करता है और संबंधों में विश्वास बढ़ाता है। 2025 में यह व्रत अत्यंत शुभ योग में आ रहा है और इस दिन श्रद्धा से किया गया व्रत जीवन में स्थिरता प्रेम और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खोलता है।
1.वट सावित्री व्रत का मुख्य उद्देश्य क्या है
यह व्रत पति की दीर्घायु वैवाहिक सुख और परिवार की समृद्धि के लिए रखा जाता है।
2.सूत्र से वट वृक्ष की परिक्रमा क्यों की जाती है
यह विवाह में स्थिरता और अटूट बंधन का प्रतीक माना जाता है।
3.क्या अविवाहित कन्याएं यह व्रत रख सकती हैं
कुछ क्षेत्रों में योग्य जीवनसाथी की कामना से अविवाहित महिलाएं भी यह व्रत रखती हैं।
4.व्रत कथा सुनना अनिवार्य क्यों माना गया है
कथा संकल्प शक्ति को बढ़ाती है और व्रत का आध्यात्मिक अर्थ समझाती है।
5.क्या व्रत के दिन भोजन किया जा सकता है
पारंपरिक रूप से व्रत निर्जला या फलाहार रखा जाता है ताकि मन और शरीर शुद्ध रहे।
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