वट सावित्री व्रत की आरती: देवी गौरी की आराधना से मिलता है अखंड सौभाग्य

By पं. नरेंद्र शर्मा

अखंड सौभाग्य, आरती और देवी गौरी की स्तुति का आध्यात्मिक महत्व

वट सावित्री व्रत की आरती: देवी गौरी की पूजा से मिले अखंड सौभाग्य

आज का दिन भारतीय स्त्री शक्ति और उसके अविचल संकल्प की स्मृति में विशेष माना जाता है। वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह स्त्री के प्रेम, तप, सौभाग्य और कर्तव्यनिष्ठा का उत्सव भी है। इस व्रत का आधार सावित्री और सत्यवान की अमर कथा है जिसमें एक पत्नी ने अपने अटूट धैर्य और भक्ति के बल पर मृत्यु को पराजित किया। हर वर्ष यह व्रत उस दिव्य शक्ति को याद दिलाता है जो संकल्प और श्रद्धा से प्रकट होती है।

कौन से अनुष्ठान वट सावित्री व्रत को पूर्णता देते हैं

वट सावित्री व्रत में तिथि, पूजा विधि और स्तुति पाठ का क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत का शुभ प्रभाव तभी प्राप्त होता है जब पूजा के सभी चरण सही विधि में संपन्न किए जाएं।

तिथि और अनुष्ठान

आज 26 मई 2025 को सम्पूर्ण भारत में यह व्रत अत्यंत श्रद्धा से मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और गौरी देवी के स्वरूप के साथ वट वृक्ष की पूजा करती हैं। यह दिन पति की दीर्घायु, समग्र सुख और पारिवारिक सौभाग्य प्राप्ति का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है।

वट वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है

व्रत में वट वृक्ष को प्रमुख स्थान दिया जाता है क्योंकि इसकी जड़ में स्थिरता, तने में शक्ति और शाखाओं में चिरंतन विस्तार का संकेत देखा जाता है। धर्मशास्त्रों में माना गया है कि वट वृक्ष में देवी सावित्री का निवास होता है। इसलिए इसके चारों ओर परिक्रमा करके महिलाएं अपने दांपत्य जीवन में स्थिरता और सुरक्षा की कामना करती हैं।

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देवी गौरी की स्तुति का स्थान

वट सावित्री व्रत में स्तुति का पाठ पूजा की आत्मा माना गया है। स्त्री जब भक्ति के साथ यह स्तुति गाती है तो उसका मन स्थिर होता है और पूजा की एकाग्रता बढ़ती है। इस व्रत में देवी गौरी की आराधना मनोवांछित फलदायिनी मानी गई है।

देवी गौरी की स्तुति

जय जय गिरिराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गाता॥
देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
मोर मनोरथ जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबही के॥
कीन्हेऊं प्रगट न कारन तेहिं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मुरति मुसुकानि॥
सादर सियं प्रसादु सर धरेऊ।
बोली गौरी हरषु हियं भरेऊ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सूचि साचा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हियं हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

यह महाकाव्यात्मक स्तुति भक्त के मन में गहन शांति का संचार करती है। इसके प्रत्येक शब्द में माता पार्वती की कृपा का तेज बसता है। यह स्तुति व्रत के माहात्म्य को और अधिक प्रभावशाली बना देती है।

वट सावित्री व्रत की आरती का दिव्य अनुभव

पूजा और कथा के बाद आरती वह क्षण है जब मन की सारी भावनाएं देवी के चरणों में अर्पित हो जाती हैं। आरती में नाद, लय और भाव एक साथ मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें भक्त अपनी चिंताओं को भूलकर देवी की कृपा में डूब जाता है।

जय अम्बे गौरी की आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्जवल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर नर मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

कानन कुंडल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटि चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधुकैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

चौंसठ योगिनि मंगल गावैं, नृत्य करत भैरूं।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी।
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्परधारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥

आरती की ध्वनि भक्त के मन में दिव्य कंपन उत्पन्न करती है। यह क्षण साधक को देवी के समीप ले जाता है। परंपरा में कहा गया है कि व्रत कथा और पूजा के उपरांत आरती करने से देवी का आशीष तुरंत प्राप्त होता है क्योंकि यह भक्ति का चरम रूप माना गया है।

आरती का आध्यात्मिक महत्व क्या है

आरती के द्वारा शरीर और मन दोनों एक सूक्ष्म ऊर्जा से भर जाते हैं। लौ और आलोक का यह संगम प्रतीक है उस चेतना का जो अज्ञान के अंधकार को दूर करती है। जब स्त्री वट सावित्री व्रत में आरती करती है तो उसका मन प्रेम, विश्वास और साहस से पूर्ण हो जाता है। यह वही ऊर्जा है जो सावित्री के संकल्प में प्रकट हुई थी।

आरती वैवाहिक जीवन में सौहार्द बढ़ाती है और घर के वातावरण में शांति और संतुलन लाती है। इस दिन विशेष रूप से जय अम्बे गौरी के गान से नारी के जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है और उससे जुड़े सभी रिश्तों में मधुरता आती है।

व्रत का सार और स्त्री शक्ति की अनुभूति

वट सावित्री व्रत नारी के गहन समर्पण, त्याग और जीवन शक्ति का पर्व है। यह व्रत याद दिलाता है कि प्रार्थना और संकल्प में अद्भुत सामर्थ्य होती है। स्त्री जब देवी गौरी की स्तुति और आरती के साथ यह व्रत करती है तो उसके भीतर धैर्य और सौभाग्य का प्रकाश जगता है। यह व्रत उसके परिवार की उन्नति का मार्ग बनाता है और उसे आंतरिक शांति प्रदान करता है।

FAQs अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या वट सावित्री व्रत केवल सुहागिन महिलाओं द्वारा किया जाता है
हाँ, यह व्रत मुख्य रूप से विवाहित स्त्रियों द्वारा पति की दीर्घायु के लिए किया जाता है।

वट वृक्ष की पूजा को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है
वट वृक्ष स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है और इसमें देवी सावित्री का वास बताया गया है।

क्या आरती करना अनिवार्य है
हाँ, पूजा और कथा के बाद आरती व्रत को पूर्णता देती है और देवी की कृपा प्राप्त होती है।

क्या स्तुति पाठ पूजा से पहले किया जाता है
हाँ, स्तुति मन को एकाग्र करती है और पूजा के भाव को गहन बनाती है।

क्या जय अम्बे गौरी की आरती पूरे भारत में समान रूप से गाई जाती है
हाँ, यह आरती देवी गौरी की सर्वप्रिय आरतियों में से एक है और कई क्षेत्रों में समान भाव से गाई जाती है।

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पं. नरेंद्र शर्मा

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