By अपर्णा पाटनी
संयम, श्रद्धा और आत्मकल्याण का प्रेरक प्रसंग

आध्यात्मिक जीवन की राह में कभी अचानक ऐसा क्षण आता है जब मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचानने लगता है। यह पहचान उसे किसी गहरे परिवर्तन की ओर ले जाती है। निर्जला एकादशी की कथा इसी परिवर्तन की यात्रा को सामने रखती है। यह उस कहानी का वर्णन है जिसमें अद्भुत बल वाले भीमसेन अपनी सबसे कठिन कमजोरी को जीतकर आत्मबल और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ते हैं। इस कथा में आस्था की गहराई भी दिखाई देती है और यह भी स्पष्ट होता है कि शक्ति केवल शारीरिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक भी होती है। ज्येष्ठ के उज्ज्वल पक्ष में आने वाली यह एकादशी आज भी संयम और तप की परंपरा को जीवित रखती है।
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस दिन सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक उपवास रखा जाता है। इस उपवास में केवल अन्न का ही नहीं बल्कि जल का भी त्याग किया जाता है। यह नियम इस व्रत को अन्य एकादशियों से अत्यंत विशेष बना देता है। पूरे दिन भगवान विष्णु का स्मरण किया जाता है और रात्रि को जागरण करने की परंपरा भी मानी गई है। अगले दिन द्वादशी तिथि पर दान किया जाता है जो इस व्रत की पूर्णता का संकेत माना जाता है।
| विधान | विवरण |
|---|---|
| उपवास का स्वरूप | अन्न और जल दोनों का त्याग |
| उपवास की अवधि | सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक |
| अनुमति | मुख का आचमन किया जा सकता है |
| पूजन | विष्णु स्मरण और स्तोत्र पाठ |
| दान | जल्युक्त कलश वस्त्र छाता और मिठाई |
| फल | वर्ष की सभी एकादशियों के समान पुण्य |
एक समय ऋषि वेदव्यास ने पांडवों को धर्म और मोक्ष की सिद्धि के लिए एकादशी व्रत का उपदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक पक्ष की एकादशी को उपवास करने से मन शुद्ध होता है और व्यक्ति धीरे धीरे ईश्वर के समीप पहुंचने लगता है। माता कुन्ती युधिष्ठिर अर्जुन नकुल और सहदेव ने श्रद्धा से इस उपवास को अपनाया। उनके लिए यह केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं था बल्कि जीवन को संतुलित करने का एक माध्यम भी था।
भीमसेन के भीतर हालांकि एक गहरी चिंता थी। शक्ति से पूर्ण होने के बावजूद वह अपनी वृक अग्नि से परेशान रहते थे जो उनकी भूख का संकेत देती थी। वह जानते थे कि उनके लिए प्रत्येक एकादशी का उपवास करना संभव नहीं है क्योंकि भूख उनके शरीर को कमजोर कर सकती है। इसलिए उन्होंने व्यासजी से मार्गदर्शन मांगा।
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भीमसेन का प्रश्न केवल भूख से जुड़ा हुआ नहीं था। वह अपने भीतर उपस्थित आध्यात्मिक इच्छा को सही दिशा देना चाहते थे। उनका मन यह जानना चाहता था कि क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे वह भक्ति मार्ग से विचलित न हों और फिर भी उपवास का पुण्य प्राप्त कर सकें। यह भावना अत्यंत मानवीय है क्योंकि मनुष्य अक्सर अपनी प्रकृति और अपने लक्ष्य के बीच संतुलन खोजता है। भीमसेन का यह प्रश्न हमें यह समझाता है कि साधना की इच्छा केवल शरीर से नहीं बल्कि मन की गहराई से उठती है।
व्यासजी ने भीमसेन से कहा कि यदि वह वर्ष की सभी एकादशियों का उपवास नहीं कर सकते तो निर्जला एकादशी का व्रत उनके लिए पर्याप्त होगा। यह एक ही व्रत वर्ष की सब एकादशियों के समान फल प्रदान करता है। यह व्रत कठिन है क्योंकि इसमें जल का त्याग भी किया जाता है। परंतु कठिन साधना ही मनुष्य को उसकी गहराई से मिलाती है। व्यासजी के इस निर्देश में यह संकेत भी छिपा है कि जब साधक अपनी सीमा पहचानकर दैवी मार्ग स्वीकार करता है तब ईश्वर की कृपा उसे आगे ले जाती है।
भीमसेन ने निश्चय किया कि वह निर्जला एकादशी का व्रत करेंगे और अपने भीतर की भूख को भी परास्त करेंगे। व्रत के दिन उन्होंने न अन्न ग्रहण किया और न जल पिया। पूरे दिन भगवान विष्णु का ध्यान करते रहे और रात्रि में जागरण किया। यह जागरण केवल बाहरी कर्म नहीं था बल्कि उनके भीतर की तपस्या की अग्नि का प्रतीक भी था। अगले दिन उन्होंने स्नान करवाकर ब्राह्मणों को जल से भरा कलश वस्त्र छाता और मिठाई का दान दिया। इसके बाद ही उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया।
व्यासजी ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि भीमसेन के इस तप से न केवल उन्हें पुण्य प्राप्त होगा बल्कि उनके सौ पूर्वजों और आने वाली सौ पीढ़ियों को भी स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी। यह कथन दर्शाता है कि एक साधक की तपस्या उसके वंश पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। इसी कारण इस व्रत को पांडव एकादशी और भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
यह व्रत बताता है कि संयम केवल दुर्बलों के लिए नहीं होता। यह उन लोगों के लिए भी आवश्यक है जो शारीरिक सामर्थ्य से भरपूर हों। निर्जला एकादशी यह संदेश देती है कि मनुष्य अपनी आदतों इच्छाओं और प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर सकता है। जब मन संयमित होता है तब जीवन में स्थिरता आती है और साधक के भीतर भक्ति का प्रकाश फैलता है।
| सीख | विवरण |
|---|---|
| संयम का महत्व | जीवन में स्थिरता और मन की शुद्धि |
| तप का प्रभाव | साधना आत्मा को तेज प्रदान करती है |
| भक्ति का स्वरूप | ईश्वर स्मरण मन को शांत करता है |
| आत्मबल | व्यक्ति अपनी कमजोरी पर विजय पा सकता है |
| वंश कल्याण | साधना का शुभ फल पीढ़ियों को uplift करता है |
भीमसेन की कथा यह प्रकट करती है कि आध्यात्मिक यात्रा केवल ऋषियों और मुनियों तक सीमित नहीं होती। यह हर उस व्यक्ति की यात्रा है जो अपनी इच्छाओं और सीमाओं से संघर्ष करते हुए ईश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता है। निर्जला एकादशी इस संघर्ष का प्रतीक है। यह व्रत मन को निर्मल बनाता है आत्मा को शक्ति देता है और साधक के भीतर भक्ति रूपी प्रकाश जगाता है जो धीरे धीरे उसे मोक्ष की दिशा में ले जाता है।
1.निर्जला एकादशी कठिन क्यों मानी जाती है
क्योंकि इस व्रत में अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है और साधक को पूरे दिन संयम बनाए रखना होता है।
2.इस व्रत को भीमसेनी एकादशी क्यों कहा जाता है
क्योंकि भीमसेन ने इसे अपनाकर वर्ष की सभी एकादशियों के समान फल प्राप्त किया।
3.इस दिन क्या दान किया जाता है
जल से भरा कलश वस्त्र छाता और मिठाई का दान किया जाता है।
4.क्या निर्जला एकादशी अन्य एकादशियों का स्थान ले सकती है
परंपरा में कहा गया है कि यह व्रत सभी एकादशियों के समान पुण्य प्रदान करता है।
5.इस व्रत का आध्यात्मिक उद्देश्य क्या है
मन को संयमित करना इंद्रियों को नियंत्रित करना और भक्ति की भावना को गहरा करना।
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