By पं. सुव्रत शर्मा
जानिए रथ यात्रा के पीछे छुपी प्रेम, वियोग और पुनर्मिलन की अद्वितीय पौराणिक कथा

पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि यह प्रेम, वियोग, पुनर्मिलन और मानवता के गहरे भावों की कालातीत कथा है। यह यात्रा भक्त और भगवान के बीच के उस संबंध को उजागर करती है, जिसमें प्रेम, त्याग, निर्भरता, अविरल भक्ति और आध्यात्मिकता एक ही धारा में बहते हैं। इस कथा में राधा, कृष्ण, गोपियों, बलराम और सुभद्रा की स्मृतियाँ समाई हुई हैं, जो मन को स्पर्श कर जाने वाली हैं।
द्वापर युग में जब कृष्ण मथुरा के लिए प्रस्थान कर रहे थे, वृंदावन की गोपियाँ असहनीय विरह में टूट चुकी थीं। कृष्ण ने वादा किया था कि वे शीघ्र लौटेंगे, किंतु सौ वर्षों तक वे नहीं लौटे।
गोपियों ने रथ को रोकने का पूरा प्रयास किया। वे रथ के पहियों के आगे लेट गईं, रस्सियाँ पकड़कर बैठ गईं। उनके आँसू, उनकी पुकार और उनके हृदय की वेदना आज भी रथ यात्रा की मूल अनुभूति का आधार बनती है।
अक्रूर असहज हो उठे, किंतु कृष्ण ने गोपियों को सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि उनका शरीर भले कहीं और हो, पर हृदय वृंदावन में ही रहेगा। यह घटना भक्त और भगवान के संबंध की उस सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ प्रेम का बंधन किसी भी दूरी से बड़ा होता है।
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समय गुज़रता गया। सूर्य ग्रहण के अवसर पर समस्त भारतवर्ष कुरुक्षेत्र में एकत्र हुआ। वृंदावन की राधा, गोपियाँ, नंद बाबा, यशोदा माता भी वहाँ उपस्थित थीं।
जब राधा ने कृष्ण को देखा, अब राजसी स्वरूप में, मोर मुकुट और रत्नों से सजे, तो उनके मन में प्रश्न उठा कि क्या यह वही कृष्ण हैं जिनके साथ उन्होंने जीवन का हर क्षण बाँटा था।
कृष्ण ने राधा की आँखों में झाँका और कहा, “बाहरी रूप बदल जाता है, राधे, पर प्रेम का स्वरूप कभी नहीं बदलता।”
यह संवाद केवल दो प्रेमियों का नहीं बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है, जहाँ पहचान शरीर से नहीं बल्कि हृदय से होती है।
कुरुक्षेत्र की भीड़ में कृष्ण, बलराम और सुभद्रा को रथ पर बैठाया गया। राधा, गोपियाँ और वृंदावनवासी रथ की रस्सियों को पकड़कर खड़े थे।
जैसे ही भक्तों ने रथ खींचना शुरू किया, वातावरण "जय जगन्नाथ" और "हरे कृष्ण" के उद्घोष से गूंज उठा।
गुंडिचा मंदिर को वृंदावन का प्रतीक माना गया है, जहाँ भगवान नौ दिन रहकर उस प्रेममय वृंदावन अनुभूति का संदेश देते हैं।
रथ की रस्सियाँ भक्त के प्रेम, प्रयास और समर्पण का प्रतीक हैं।
रथ के पहिए समय के चक्र, कर्म और जीवन के उतार–चढ़ाव का संकेत देते हैं।
रथ यात्रा के अंत में रथों का टूट जाना हमें यह स्मरण कराता है कि संसार नश्वर है, पर प्रेम और ईश्वर शाश्वत हैं।
जगन्नाथ रथ यात्रा की प्रत्येक झलक आत्मा को छूती है।
रथ की ध्वनि, घंटियों की झंकार, भक्तों की पुकार, पुष्पवर्षा, भजन और आरती—ये सब उस प्रेम की याद दिलाते हैं जो भक्त और भगवान को जोड़ता है।
यह यात्रा हमें सिखाती है कि जब हम अपने हृदय के रथ को प्रेम और सेवा की रस्सियों से खींचते हैं, तो भगवान स्वयं हमारे जीवन में उतर आते हैं।
1. गोपियों के विरह को रथ यात्रा से क्यों जोड़ा जाता है?
क्योंकि रथ की रस्सियाँ गोपियों के उस प्रेम को दर्शाती हैं जिससे वे कृष्ण को रोकना चाहती थीं।
2. रथ खींचने का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
यह समर्पण, प्रेम और कर्म–बंधन के नाश का प्रतीक है।
3. गुंडिचा मंदिर को वृंदावन क्यों माना जाता है?
क्योंकि यह भक्त और भगवान के मिलन की अनुभूति का प्रतीक है।
4. रथों को हर वर्ष नया क्यों बनाया जाता है?
यह जीवन में नूतनता, परिवर्तन और शुद्धता का संदेश है।
5. छेरा पहरा का मुख्य अर्थ क्या है?
कि ईश्वर के सामने सभी समान हैं, चाहे राजा हो या सामान्य जन।
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