By अपर्णा पाटनी
जानिए एकदंत संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथा, पूजन विधि, धार्मिक महत्व और गणेश कृपा पाने का सरल मार्ग

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को एकदंत संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है, जो भगवान गणेश के अनेक रूपों में से एक ‘एकदंत’ को समर्पित है।
इस दिन व्रत रखने और पूजन करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। महिलाएं यह व्रत संतान की दीर्घायु और सुरक्षा के लिए रखती हैं, जबकि कुछ लोग संतान प्राप्ति की कामना से भी करते हैं। गणेश जी को जनेऊ, चंदन, दूर्वा, अक्षत, धूप, दीप, फूल, फल अर्पित किए जाते हैं। हरा वस्त्र, मोदक, लड्डू और मालपुए का भोग विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। पूरे विधि-विधान से पूजा और व्रत रखने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और भक्त को सुख, समृद्धि और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद देते हैं।
भगवान गणेश को एकदन्त इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनका एक दांत टूटा हुआ है। अलग अलग पौराणिक कहानिया इसके कई कारण बताती हैं।
एक बार भगवान शिव के परम भक्त परशुराम भगवान शिव से मिलने के लिए कैलाश पर्वत गए। गणेश जी ने उन्हें शिवजी से मिलने से रोका, क्योंकि शिवजी ध्यान में थे। परशुराम क्रोधित होकर गणेश जी से युद्ध करने लगे। युद्ध के दौरान, परशुराम के फरसे से गणेश जी का
अन्य मान्यताओं के अनुसार कुछ अन्य कथाओं के अनुसार, गणेश जी ने अपने दांत का उपयोग करके एक राक्षस गजमुखासुर को वश में किया था, या फिर उनके भाई कार्तिकेय ने उन्हें परेशान करने के लिए उनका एक दांत तोड़ दिया था।
एकदंत संकष्टी चतुर्थी से जुडी कथाएं बताती हैं कि श्रद्धा, भक्ति और संकल्प से किया गया गणेश व्रत जीवन की सबसे बड़ी विघ्न-बाधाओं को भी हर सकता है।
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सतयुग में पृथु नामक एक धर्मपरायण राजा का राज्य था, जिनके राज्य में वेदों के ज्ञाता एक ब्राह्मण दयादेव रहते थे। उनके चार पुत्र और बहुएं थीं। सबसे बड़ी बहू संकष्टी चतुर्थी का व्रत बचपन से करती आ रही थी। एक दिन उसने सास से व्रत करने की अनुमति मांगी। सास ने कहा - "तुम्हें कोई कष्ट नहीं है, व्रत की क्या आवश्यकता?" लेकिन बहू ने श्रद्धा से व्रत करना जारी रखा।
कुछ समय बाद, उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। जब सास को पता चला कि वह अब भी व्रत कर रही है, तो उसने उसे व्रत छोड़ने को मजबूर किया। गणेश जी अप्रसन्न हो गए। वर्षों बाद, उस पुत्र का विवाह तय हुआ, लेकिन विवाह के दिन वर रहस्यमय ढंग से गायब हो गया। पूरे परिवार में हड़कंप मच गया।
बड़ी बहू रोते हुए सास से बोली - "आपने मेरा गणेश व्रत छुड़वाया, शायद इसी कारण यह विपत्ति आई है।" यह सुनकर दयादेव और उनकी पत्नी बहुत दुखी हुए। बहू ने फिर से संकष्टी चतुर्थी का व्रत करना शुरू कर दिया। कहते हैं कि उसकी भक्ति से गणेश जी प्रसन्न हुए और खोया हुआ पुत्र वापस मिल गया। इसके बाद पूरे परिवार ने गणेश चतुर्थी व्रत को जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया।
एक बार गणेशजी ने एक दुर्बल, वेदज्ञ ब्राह्मण का रूप धारण किया और भिक्षा मांगते हुए एक भक्त पुत्रवधू के घर पहुँचे। ब्राह्मण रूपी गणेशजी ने कहा - "हे पुत्री! मुझे इतनी भिक्षा दो कि मेरी भूख शांत हो जाए।" पुत्रवधू ने श्रद्धा से उनका पूजन किया, भोजन कराया और वस्त्र भी अर्पित किए। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर ब्राह्मण बोले - "मैं गणेश हूं, वचन दो जो वर मांगना है।"
पुत्रवधू हाथ जोड़कर बोली - "यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे मेरे खोए हुए पुत्र के दर्शन कराइए।" गणेशजी ने आशीर्वाद दिया - "तुम्हारा पुत्र शीघ्र ही लौट आएगा।" इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए।
कुछ ही समय बाद पुत्र सकुशल घर लौट आया और विवाह कार्य भी सम्पन्न हुआ। इस प्रकार, ज्येष्ठ मास की संकष्टी चतुर्थी सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली मानी जाती है।
इन सभी कथाओं से ये ज्ञात होता है कि भगवान गणेश अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं और यथोचित फल देते हैं। श्रद्धालुओं को ध्यान रखना चाहिए कि जब भी भगवान गणेश की आराधना करें तो पूरे मन और समर्पण से करें।
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