By पं. नीलेश शर्मा
जानें कैसे आषाढ़ विनायक चतुर्थी व्रत से संतान प्राप्ति, बाधा निवारण और आत्मिक कल्याण संभव है

आषाढ़ मास की विनायक चतुर्थी केवल भगवान गणेश की उपासना का पर्व नहीं, बल्कि संतान सुख, बाधा निवारण और आध्यात्मिक कल्याण का एक दिव्य अवसर है। इस दिन गणेश जी के कृष्णपिङ्गल स्वरूप की पूजा का विधान है, जो विशेष रूप से संतानों के आशीर्वाद और जीवन की बाधाओं को दूर करने वाला माना गया है।
आषाढ़ विनायक चतुर्थी की कथा गहन प्रेरणा देने वाली और जीवन के रहस्यों को उजागर करने वाली है। यह कथा हर उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करती है जो किसी अभाव, कठिनाई या दुःख से जूझ रहा है और ईश्वर की शरण में समाधान खोजता है।
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द्वापर युग में महिष्मति नगरी पर राजा महीजित राज्य करते थे। वे धर्मपरायण, दयालु और सत्यवादी शासक थे। उन्होंने जीवन में कोई पाप नहीं किया, न छल, न अन्याय। उनकी प्रजा उन्हें पिता समान मानती थी।
किन्तु उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख था संतानहीनता। महल की समृद्धि, सत्ता और वैभव होते हुए भी उनके जीवन में खालीपन था। संतान के अभाव के कारण वे दिन-रात व्याकुल रहते थे। अनेक दान, यज्ञ और तप के बाद भी संतान प्राप्ति नहीं हुई।
एक दिन राजा ने दरबार में अपनी पीड़ा व्यक्त की और पूछा कि धर्मपरायण जीवन के बावजूद उन्हें संतान क्यों नहीं मिली। संपूर्ण दरबार मौन हो गया। प्रजा राजा से अत्यंत प्रेम करती थी और सभी ने समाधान खोजने का निश्चय किया।
राजा और प्रजा समाधान की खोज में वन की ओर गए और घने जंगल में तपस्या कर रहे महर्षि लोमश के पास पहुँचे। महर्षि लोमश त्रिकालदर्शी और वेदों के ज्ञाता थे।
उनसे राजा ने अपनी व्यथा कही। महर्षि ने गंभीरता से सुनकर कहा:
"आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी के दिन गणेश जी के कृष्णपिङ्गल रूप का व्रत करो। यह व्रत संतानहीन को संतान देता है और दुख दूर करता है।"
महर्षि लोमश ने राजा को निम्न विधि बताई:
राजा महीजित और रानी सुदक्षिणा ने श्रद्धा से यह व्रत किया।
कुछ समय बाद रानी को एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ। राज्य में उत्सव मनाया गया। राजा का जीवन पूर्ण हुआ और उन्होंने शेष जीवन धर्म और प्रजा-कल्याण में बिताया।
यह कथा बताती है कि श्रद्धा, धर्म और तप जीवन की सबसे बड़ी बाधाओं को भी दूर कर सकते हैं।
गणेश जी विघ्नहर्ता हैं और उनका व्रत केवल सांसारिक लाभ ही नहीं देता, बल्कि आत्मिक शांति और परिवार में प्रेम का संचार भी करता है।
यह व्रत यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति से ईश्वर की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
आषाढ़ विनायक चतुर्थी से जुड़ी यह कथा हर साधक को यह सिखाती है कि श्रद्धा, संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण से जीवन में चमत्कार होता है।
यह व्रत संतान इच्छा रखने वालों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है और जीवन में नई आशा और ऊर्जा लाता है।
क्या आषाढ़ विनायक चतुर्थी का व्रत संतान सुख प्रदान करता है?
परंपरा और कथा दोनों बताते हैं कि यह व्रत संतानहीन दंपतियों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
गणेश जी के किस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए?
कृष्णपिङ्गल स्वरूप की पूजा विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।
क्या इस व्रत में फलाहार आवश्यक है?
हाँ, व्रत रखने वाले को दिनभर फलाहार करना चाहिए।
क्या यह व्रत ग्रह दोषों को भी शांत करता है?
चंद्र दोष, शनि और राहु-केतु से उत्पन्न बाधाएं कम मानी जाती हैं।
क्या बिना संतान इच्छा के भी यह व्रत किया जा सकता है?
हाँ, यह व्रत मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और बाधा निवारण के लिए भी किया जाता है।
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