क्या कृष्ण के जन्म ने देवताओं को अपने नियम तोड़ने पर विवश कर दिया?

By पं. संजीव शर्मा

अधर्म की सीमा पार करने पर ही धर्म की रक्षा संभव क्यों हुई?

कृष्ण जन्म की कथा: देवताओं ने नियम क्यों तोड़े?

धर्म की प्रणाली का विनाश - और फिर उसका विस्तार

वैदिक धर्म यह स्पष्ट करता है कि देवता धर्म के स्वामी नहीं बल्कि उसके अनुयायी हैं। ऋग्वेद ने कहा है "ऋतं वदन्ति देवाः" - देवता भी उसी नियममाला में बंधे हैं जो सृष्टि को स्थिर बनाए रखता है। उस रात जब कृष्ण जन्मे तब देवताओं ने अपने नियम तोड़े - लेकिन यह धर्म का उल्लंघन नहीं, अपितु धर्म की रक्षा थी। यदि नियम ही अधर्म की सहायता करे तब धर्म का सर्वोपर्याय अपने मार्ग का विस्तार होना है।

मथुरा में अधर्म का आतंक हमेशा से अधिक था

भगवद पुराण (दशम स्कंध, अध्याय 1-3) में बताया गया है कि कंस का अत्याचार इतना बढ़ चुका था कि उसके अत्याचारी शोषण से धर्म का मूल अस्तित्व ही क्षुब्ध हो रहा था। देवकी के छह बच्चे शहीद हो चुके थे। देवता, ऋषि और जन्मभूमि स्वयं विलाप कर रही थी।

तब क्या विकल्प बचा था?

जब धर्म का आधार ही डगमगा जाए तब उसे केवल अवतार ही बचा सकता है। विष्णु ने अपने नियम तोड़े बिना, उस नियम का उल्लंघन ही किया जो निष्पक्षा नहीं था। यह अवतार धर्म की रक्षा का अंतिम साधन था।

देवताओं का पृथ्वी पर अप्रशासित संघर्ष

हरिवंश पुराण बताता है कि श्रीकृष्ण के जन्म से पहले कई देवता पृथ्वी पर अवतरित हुए-कोई यादव वंश में, कोई सेवक रूप में। इन्द्र ने वर्षा रोकी ताकि वसुदेव सुरक्षित गोकुल पहुंच सकें। अनन्त शेष ने स्वयं अपनी जगह त्याग दी और श्रीकृष्ण को अपने फन से ढक लिया। यमुना ने अपने प्रवाह को रोक दिया ताकि कृष्ण के चरण धो सके। यह हर कार्य पारंपरिक नियमों से बाहर था, लेकिन सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा की भावना से प्रेरित था।

यमुना का प्रेम जो बंदिशें भी तोड़ दे

जब वसुदेव श्रीकृष्ण को यमुना पार करा रहे थे तब यमुना देवी स्वयं रूक गईं। नदी का यही स्वधर्म था कि वह बहती रहे। परन्तु उस चरण स्पर्श के लिए नदी ने स्वयं नियम से विदा ले ली। ऐसा सिर्फ प्रेम करने वाले ही कर सकते हैं।

नियमों का टूटना - धर्म की दुर्गा बनना

महाभारत (शान्ति पर्व 109.10) में लिखा है: "जब धर्म पतनशील हो तब उसका स्वरूप बदलना स्वाभाविक है"। देवताओं ने नियम तोड़े नहीं। उन्होंने नियमों के सत्ता संरक्षक को समझा और उसी की सेवा की। वह सेवा ही धर्म का उच्चतम रूप है, नीतियों का कठोरता नहीं।

आज के मनुष्य के लिए यह कथा क्यों महत्वपूर्ण है?

यह कथा हमें यह सिखाती है कि जब सिस्टम सत्य का दमन करे तब न्याय के लिए साहसपूर्वक नियम को चुनौती देना धर्म-भंग नहीं बल्कि उच्चतम धार्मिक उत्तरदायित्व होता है। यही संदेश भगवद्गीता का मूल है - “धर्म की रक्षा हेतु कार्य करो, चाहे वह असुविधाजनक हो”।


FAQs

1.क्या देवताओं का नियम तोड़ना गलत था?
उत्तर: नहीं। यह धर्म की सर्वोच्च रक्षा था, न कि उसकी अवज्ञा।

2.कौन-कौन देव त्यागी भूमिकाओं में अवतरित हुए?
उत्तर: इन्द्र, अनन्त शेष, यमुना जैसी शक्तियाँ पृथ्वी पर देवी-देवता रूप में अवतरित हो कर रक्षा में जुटीं।

3.यमुना ने नियम क्यों तोड़े?
उत्तर: श्रीकृष्ण के चरणों को वंदन करने हेतु वह स्वधर्म को त्याग कर प्रेम की उपर उठी।

4.धर्म का संकल्प कब नियम से ऊपर हो जाता है?
उत्तर: जब नियम सत्य की रक्षा के विरुद्ध होते हैं और वहाँ धर्म ही नियम की सेवा के लिए खड़ा होता है।

5.आज के समाज में इस कथा का क्या संदेश है?
उत्तर: यह याद दिलाता है कि न्याय की रक्षा के लिए कभी कभी असुविधा स्वीकारना स्वयं धर्म होती है।

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पं. संजीव शर्मा

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