By पं. अभिषेक शर्मा
ग्रह दशा, गोचर और पुरुषार्थ के आधार पर राजयोगों के प्रभाव की समय-सारणी

राजयोग शब्द सुनते ही मन में समृद्धि, यश, पद-प्रतिष्ठा और सफलता की छवि उभर आती है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि राजयोग केवल एक योग नहीं, बल्कि एक संयोग होता है - जिसमें ग्रह, भाव, दशा और व्यक्ति का आत्मबल सभी मिलकर भूमिका निभाते हैं। राजयोगों की उपस्थिति मात्र से फल नहीं मिलता, बल्कि उसका उद्भव, सक्रियता और अनुकूल दशा आना आवश्यक है।
बहुत से लोगों की कुंडली में राजयोग विद्यमान होता है, लेकिन फिर भी वे उसका फल नहीं भोग पाते। इसका कारण यह है कि केवल योग का होना पर्याप्त नहीं है - वह योग सक्रिय कब होगा, यह मुख्यतः ग्रहों की विंशोत्तरी दशा, गोचर और अंतर्दशा पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि पंचमेश और नवमेश का संबंध दशम भाव से होकर बन रहा हो, तो यह एक शक्तिशाली राजयोग है। परंतु जब तक इन ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा नहीं आती, तब तक इसका प्रभाव पूर्ण रूप से दिखाई नहीं देता।
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राजयोग देने वाले ग्रह यदि उच्च राशि में, स्वराशि में, या मित्र राशि में हों तो उनका प्रभाव अधिक तीव्र और शुभ होता है। यदि वही ग्रह नीचस्थ, वक्री, अस्त या शत्रु राशि में हों, तो योग का फल सीमित, विलंबित या संघर्षपूर्ण हो सकता है। उदाहरणतः, उच्च के गुरु और चंद्र का गजकेसरी योग यदि कर्क लग्न में बने, तो वह अत्यंत प्रभावी होता है। लेकिन यदि चंद्रमा पाप दृष्ट हो और गुरु नीच का हो, तो वही योग सामान्य फल दे सकता है।
हर राजयोग का फल जीवन के किसी न किसी क्षेत्र से जुड़ा होता है। यदि योग दशम भाव (कर्म) में है, तो कार्यक्षेत्र में सफलता देगा। यदि पंचम या नवम भाव से संबंधित है, तो शिक्षा, बुद्धि या भाग्य के क्षेत्र में उन्नति होगी। इसी प्रकार, लग्न या चतुर्थ भाव में योग होने पर सामाजिक मान-सम्मान और आंतरिक संतुलन की प्राप्ति होती है।
राजयोग का फल प्रायः ग्रहों की दशा में आता है, लेकिन यह ध्यान देने योग्य बात है कि कुछ योग बाल्यकाल में फलित होते हैं, कुछ युवावस्था में और कुछ प्रौढ़ावस्था में। इसका निर्णय लग्न, चंद्र और सूर्य से दशा विचार करने पर होता है। उदाहरण: बाल्यकाल में चंद्र आधारित दशाएं फल देती हैं, युवावस्था में सूर्य आधारित और प्रौढ़ावस्था में लग्न आधारित योगों की दशाएं फलित होती हैं।
यदि किसी समय गोचर में वही योगकारी ग्रह लग्न, दशम या नवम भाव में स्थित हो जाएं, या उन्हें बल मिले (जैसे गुरु का गोचर कर्म स्थान में हो), तो पूर्ववर्ती योग अचानक उभर सकते हैं और जीवन में अप्रत्याशित उन्नति ला सकते हैं। इसीलिए अच्छे योगों के साथ-साथ ग्रहों के गोचर पर भी नज़र रखना आवश्यक होता है।
यह भी एक गहरा सत्य है कि बिना प्रयास के कोई योग फल नहीं देता। योग केवल अवसर प्रदान करता है-उस अवसर का उपयोग करना व्यक्ति की चेतना, प्रयत्न और निर्णय क्षमता पर निर्भर करता है। जिस व्यक्ति में आत्मबल और समय की पहचान हो, वह राजयोग से मिलने वाले लाभों को वास्तविक उन्नति में बदल सकता है।
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