By पं. अमिताभ शर्मा
धर्म और प्रकाश की विजय का दिव्य पर्व

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला नरक चतुर्दशी का पर्व आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह दिवस दीपावली के एक दिन पूर्व आता है और इसे छोटी दिवाली, काली चौदस तथा रूप चौदस जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह पर्व केवल दीपावली की प्रस्तावना मात्र नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, पाप विमोचन और बुराई के पूर्ण नाश का प्रतीक है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, देवी काली और यमराज की उपासना का अत्यधिक महत्व होता है। परंपरा के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर दीपदान करना मृत्यु के देवता यमराज की आराधना के रूप में देखा जाता है, जो अकाल मृत्यु से रक्षा करने और दीर्घायु का आशीर्वाद देने का मार्ग है। साथ ही प्रातःकाल अभ्यंग स्नान करना आत्मा और शरीर की गहन शुद्धि का सूचक माना गया है जिससे नकारात्मक कर्म धुल जाते हैं और नया जीवन आरंभ होता है।
अभ्यंग स्नान नरक चतुर्दशी के प्रमुख अनुष्ठानों में सम्मिलित है। इसे केवल स्नान मात्र नहीं बल्कि एक दिव्य शुद्धिकरण प्रथा के रूप में समझा जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार असुर नरकासुर अत्यंत पराक्रमी और अत्याचारी था। उसने देवताओं, ऋषियों और सामान्य जनमानस को आतंकित कर रखा था। उसने वरुण का छत्र, माता अदिति के कुण्डल और असंख्य धन-रत्न बलपूर्वक छीन लिए थे। इतना ही नहीं, सोलह हजार षोडशी कन्याओं को भी उसने बंधक बनाकर अपने कारागार में कैद कर लिया था। देवराज इंद्र और अन्य देवताओं की प्रार्थना पर भगवान कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर गए। युद्ध के दौरान यह वरदान स्मरण हुआ कि केवल स्त्री ही नरकासुर का वध कर सकती है। अतः सत्यभामा स्वयं रथारूढ़ हुईं और अपने पराक्रम से नरकासुर का वध किया। उस विजय के उपलक्ष्य में रात्रि को दीपदान करना परंपरा बन गई जो अंधकार पर प्रकाश और पाप पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
दूसरे प्रसंग में बताया गया है कि असुर रक्तबीज का वध केवल देवी काली ही कर सकती थीं। यह राक्षस ऐसा था कि उसका रक्त जब भी भूमि पर गिरता था, प्रत्येक बूंद से नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था। देवी काली ने अपने प्रचंड रूप से प्रकट होकर उसके रक्त की प्रत्येक बूँद को अपने मुख में ग्रहण किया, जिससे उसकी पुनरुत्पत्ति रुक गई। अंततः रक्तबीज का संहार हुआ। इस कथा के कारण ही नरक चतुर्दशी के दिन देवी काली की विशेष आराधना की जाती है और इसे काली चौदस कहा जाता है। यह संदेश देता है कि जब तक जीवन में नकारात्मकता की पुनरावृत्ति होती है तब तक उसका अंत नहीं होता।
कम ज्ञात किंतु महत्वपूर्ण कथा हनुमान जी से जुड़ी है। अपने बाल्यकाल में उन्होंने सूर्य को पका हुआ फल समझकर निगल लिया। इससे संपूर्ण ब्रह्मांड में अंधकार फैल गया और प्राणी संकट में पड़ गए। देवताओं ने हनुमान से निवेदन किया परंतु उन्होंने सूर्य को नहीं छोड़ा। तब इंद्र ने वज्र से प्रहार किया जिससे सूर्य मुक्त हुआ और जगत में पुनः प्रकाश फैला। यह प्रसंग दर्शाता है कि अंधकार और अज्ञानता कितनी भी प्रबल क्यों न हो, दिव्य कृपा और उचित हस्तक्षेप से उजाला पुनः आ सकता है।
यमराज की उपासना नरक चतुर्दशी के पर्व का एक प्रधान अंग है। इस दिन दक्षिण दिशा की ओर तेरह आटे के दीपक जलाए जाते हैं। शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा बताया गया है। इस दीपदान से व्यक्ति अकाल मृत्यु से सुरक्षित रहता है और दीर्घायु प्राप्त करता है। साथ ही यह मृत्यु के शाश्वत सत्य को स्वीकार करने और उससे निडर रहने का प्रतीक भी है।
नरक चतुर्दशी हमें यह सीख देती है कि मनुष्यों के जीवन में भी नरकासुर जैसे अहंकार और रक्तबीज जैसे पुनः-पुनः जन्म लेने वाले दोष छिपे रहते हैं। जब तक उन्हें दैवीय शक्ति, आत्मबल और सत्संगति का संबल न मिले तब तक वे समाप्त नहीं होते। इस दिन किए गए आचरण और संकल्प हमें प्रेरित करते हैं कि जीवन के भीतर छिपे प्रत्येक अंधकार का नाश करें और सत्य, साहस तथा धार्मिकता को अपनाएँ।
अभ्यंग स्नान द्वारा आत्मशुद्धि, दीप प्रज्वलन द्वारा जीवन में उजाला, देवताओं की उपासना द्वारा दिव्यता का अनुभव तथा पूर्वजों की स्मृति द्वारा आत्मीय संबंधों की पुष्टि - यह सब मिलकर नरक चतुर्दशी को केवल एक पर्व नहीं बल्कि जीवन का गहन दर्शन बना देते हैं। यह दिन स्मरण कराता है कि अंधकार कितना भी प्रबल क्यों न हो, प्रकाश की एक छोटी सी ज्योति उसे परास्त कर सकती है। यही इस पर्व का वास्तविक संदेश है जो भक्तों को आत्मविश्वास और नवजीवन का अनुभव कराता है।
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