काली चौदस 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि

By पं. अभिषेक शर्मा

देवी काली की आराधना और नरक चतुर्दशी का आध्यात्मिक महत्व

काली चौदस 2025: तिथि और आध्यात्मिक पूजन विधि

काली चौदस, जिसे नरक चतुर्दशी, भूत चतुर्दशी, रूप चौदस और छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है, दीपावली के पाँच दिवसीय पर्व का दूसरा दिन होता है। यह दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, काली चौदस देवी काली की पूजा के लिए समर्पित दिन है और यह बुराई, अंधकार और नकारात्मक ऊर्जाओं पर अच्छाई, प्रकाश और सकारात्मक शक्तियों की विजय का प्रतीक है। इसे उन तिथियों में गिना जाता है जो साधक को बाधाओं से मुक्ति एवं सुरक्षा की शक्ति प्रदान करती हैं। यह पर्व दीपावली के प्रमुख उत्सव लक्ष्मी पूजन से पहले आत्मिक, मानसिक और शारीरिक शुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है।


काली चौदस 2025 की तिथि और समय

  • मुख्य तिथि: रविवार, 19 अक्टूबर 2025
  • चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ: 19 अक्टूबर 2025 को दोपहर 1:51 बजे
  • चतुर्दशी तिथि का समापन: 20 अक्टूबर 2025 को दोपहर 3:44 बजे

इस प्रकार पूजा और मुख्य अनुष्ठान 19 अक्टूबर की संध्या और निशीथ काल में सम्पन्न होंगे। 20 अक्टूबर की प्रातः बेला भी पूजा-अर्चना हेतु श्रेष्ठ बताई गई है।


काली चौदस 2025 - प्रमुख शुभ मुहूर्त

  • निशीथ पूजा मुहूर्त (मध्य रात्रि का समय): रात्रि 11:57 बजे से 12:47 बजे (अवधि: 50 मिनट, 20 अक्टूबर)
    यह समय तांत्रिक और शक्तिपूजा अनुष्ठानों के लिए विशेष कारगर माना गया है।
  • ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व का समय): प्रातः 4:56 बजे से 5:45 बजे तक।
    इस समय अभ्यंग स्नान और ध्यान का अभ्यास करने से आत्मा और शरीर दोनों की शुद्धि होती है।
  • अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:59 बजे से 12:45 बजे तक।
    यह मुहूर्त अत्यंत मंगलकारी है और इसे किसी भी कार्य में विजय का सूचक माना जाता है।
  • विजय मुहूर्त: दोपहर 2:18 बजे से 3:04 बजे तक।
    इस समय किए गए पूजन से विजय और शक्ति की कामना पूर्ण होती है।
  • सर्वार्थ सिद्धि योग: यह योग पूरे दिन विद्यमान रहेगा।
    इसका अर्थ है कि दिनभर किए गए सभी कर्मों से विशेष सिद्धि प्राप्त होगी।
  • अमृत सिद्धि योग: 19 अक्टूबर को सायं 5:49 बजे से 20 अक्टूबर को प्रातः 6:35 बजे तक रहेगा।
    इस समय के दौरान किया गया पूजन और साधना अमृततुल्य फल प्रदान करता है।

काली चौदस की पूजा-विधान और अनुष्ठान

  1. गृहशुद्धि और पूजास्थल की तैयारी:
    इस दिन शुभ प्रभात में घर की संपूर्ण सफाई की जाती है ताकि देवी के स्वागत के लिए वातावरण पवित्र बने। घर और मंदिर में गंगाजल का छिड़काव कर पूजा स्थल की शुद्धि की जाती है। यह क्रिया नकारात्मक ऊर्जाओं और असुर शक्तियों को दूर करने का प्रतीक है।
  2. माँ काली की प्रतिमा का स्नान और श्रृंगार:
    देवी काली की मूर्ति या चित्र को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और जल) से स्नान कराने की परंपरा है। इसके बाद लाल वस्त्र, आभूषण और विशिष्ट श्रृंगार से उन्हें सजाया जाता है। लाल रंग शक्तिरूप देवी काली का प्रिय रंग है जो उर्जा और संहार शक्ति का प्रतीक है।
  3. दीप प्रज्वलन और अर्घ्य अर्पण:
    सरसों या तिल के तेल से दीपक जलाए जाते हैं। इन्हें घर के मंदिर और मुख्य द्वार पर रखा जाता है। देवी को पुष्प, चंदन, जल और अक्षत मिश्रित अर्घ्य अर्पित किया जाता है। दीप प्रज्वलन अंधकार पर प्रकाश की विजय का द्योतक है।
  4. पुष्प और नैवेद्य अर्पित करना:
    लाल गुड़हल के फूल देवी मां काली को अत्यंत प्रिय हैं। इन पुष्पों के साथ तिल, गुड़, नारियल, मिठाइयाँ और अनाज देवी को अर्पित किए जाते हैं। यह अर्पण कठिनाइयों से उबारने और सुख-शांति की कामना करता है।
  5. मंत्रजाप और आरती:
    भक्त इस दिन काली गायत्री मंत्र, महाकाली मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं। इसके बाद माँ काली की आरती दीप, घी और कपूर के दीयों से की जाती है। घण्टि और शंख के जयघोष के साथ भक्त सामूहिक भक्ति में रमे रहते हैं।
  6. प्रसाद वितरण और ग्रहण:
    पूजा पूर्ण होने पर भोग के रूप में अर्पित लड्डू, तिल-गुड़, चिवड़ा और गुड़ आदि को प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। प्रसाद ग्रहण करना देवी की कृपा का प्रतीक है।

काली चौदस का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

  • नकारात्मकता का नाश: देवी काली की पूजा से सभी प्रकार की बुरी ऊर्जाएँ, भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।
  • असुर-विजय का पर्व: इस दिन नरकासुर दैत्य का वध हुआ था। श्रीकृष्ण और काली माँ ने मिलकर उसे समाप्त किया और मानवों को भय से मुक्ति दिलाई। यह घटना अच्छाई के अजेय होने का स्मरण दिलाती है।
  • आध्यात्मिक शुद्धि और तैयारी: यह दिन दीपावली के लक्ष्मी पूजन से पहले आत्मिक और मानसिक शुद्धि के लिए है। अभ्यंग स्नान, उपवास और प्रार्थना द्वारा मानसिक स्वच्छता बढ़ती है।
  • रूप चौदस: कई स्थानों पर इस दिन को रूप चौदस कहा जाता है। स्त्रियाँ इस दिन विशेष सौंदर्य साधना और उबटन आदि करती हैं। यह शरीर और आत्मा की सुंदरता व पवित्रता का प्रतीक है।
  • साहस और शक्ति की प्राप्ति: देवी काली के पूजन से व्यक्ति को भय मुक्त साहस और बाधाओं से लड़ने की क्षमता प्राप्त होती है।

पौराणिक कथा - नरकासुर वध

नरकासुर असुर ने देवताओं और मानवों दोनों को आतंकित कर रखा था। उसने अनेक दिव्य कन्याओं को बंदी बना लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने मां काली की ऊर्जा से शक्ति प्राप्त कर नरकासुर का वध किया। इस विजय से सभी बंधक मुक्त हुए और भय का अंत हुआ। इसलिए इस दिन दीपक जलाकर और आतिशबाजी कर हर्षोल्लास से उत्सव मनाया जाता है।


काली चौदस की प्रमुख परंपराएँ

  • अभ्यंग स्नान: सूर्योदय से पूर्व तिल तेल से स्नान कर तन-मन शुद्ध किया जाता है। इसे अकाल मृत्यु से रक्षा करने वाला कहा गया है।
  • दीपदान: संध्या और रात्रि में घर, मंदिर और बाहर अनेक दीपक जलाए जाते हैं।
  • हनुमान पूजन और तांत्रिक अनुष्ठान: कुछ क्षेत्रों में इस दिन हनुमानजी की विशेष पूजा और तांत्रिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं जिससे दुष्ट ऊर्जाओं से रक्षा होती है।
  • आत्म-नियंत्रण: पूरे दिन नकारात्मक विचारों से दूर रहकर साधना और ध्यान करने की परंपरा है।

सारांश

काली चौदस 2025 का पर्व रविवार, 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। यह दीपावली से एक दिन पूर्व देवी काली की उपासना का पर्व है। इस दिन काली पूजन, दीपदान, तंत्र शुद्धि, अभ्यंग स्नान और मंत्रजाप से साधकों को साहस, आत्मबल और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा की प्राप्ति होती है।


प्रश्नोत्तर (FAQ)

प्रश्न 1: काली चौदस 2025 कब मनाई जाएगी?
उत्तर: रविवार, 19 अक्टूबर 2025 को। चतुर्दशी तिथि 19 अक्टूबर को दोपहर 1:51 बजे प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर को 3:44 बजे समाप्त होगी।

प्रश्न 2: इस दिन पूजा का सबसे शुभ समय कब है?
उत्तर: निशीथ काल में रात्रि 11:57 से 12:47 बजे तक, ब्रह्म मुहूर्त (4:56 - 5:45) और विजय मुहूर्त (2:18 - 3:04) विशेष शुभ हैं।

प्रश्न 3: काली चौदस का पौराणिक आधार क्या है?
उत्तर: यह दिन नरकासुर दैत्य के वध और असुरों से मुक्ति का प्रतीक है। इसे अच्छाई और प्रकाश की विजय का दिन माना जाता है।

प्रश्न 4: काली चौदस को रूप चौदस क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि इस दिन स्त्रियाँ उबटन, स्नान और सौंदर्य की विशेष साधना करती हैं। यह शारीरिक और आत्मिक पवित्रता का प्रतीक है।

प्रश्न 5: इस दिन की जाने वाली प्रमुख परंपराएँ क्या हैं?
उत्तर: अभ्यंग स्नान, दीपदान, देवी काली की पूजा, मंत्रजाप, हनुमान पूजन और कुछ क्षेत्रों में तांत्रिक साधना।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

ZODIAQ के बारे में

ज़ोडियाक (ZODIAQ) एक ऑनलाइन वैदिक ज्योतिष प्लेटफॉर्म है। जिन यूज़र्स को ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता है उन्हें ये अनुभवी ज्योतिषियों से जोड़ता है। हमारे यूज़र्स निशुल्क कुंडली भी बनाते हैं और कुंडली मिलान करते हैं। साथ ही ज़ोडियाक (ZODIAQ) ज्योतिषियों को भी कई उपयोगी सेवाएँ प्रदान करता है। ज्योतिषी ज़ोडियाक (ZODIAQ) की विभिन्न सुविधाओं का उपयोग कर अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करते हैं।

यदि आप एक उपयोगकर्ता हैं

अनुभवी ज्योतिषियों से सलाह लें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें। आप हमारे प्लेटफॉर्म से अनुभवी ज्योतिषियों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित जन्म पत्रिका और जीवन भविष्यवाणी रिपोर्ट भी मंगवा सकते हैं। सटीक कुंडली बनाएं, कुंडली मिलान करें और राशिफल व मुहूर्त की जानकारी प्राप्त करें। हमारी ऑनलाइन लाइब्रेरी का उपयोग करें जहां आपको सभी जरूरी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक जानकारी एक जगह मिलेगी।

यदि आप एक ज्योतिषी हैं

अपने ग्राहकों के लिए सटीक कुंडली बनाएं और एक बार में 5 लोगों तक का कुंडली मिलान करें। ज़ोडियाक (ZODIAQ) की मदद से अपने ग्राहकों के लिए विस्तृत जन्म पत्रिका रिपोर्ट तैयार करें। क्लाइंट डायरेक्टरी में ग्राहकों का विवरण सेव करके किसी भी समय उन्हें एक्सेस करें। हर दिन आपने कितने लोगों को परामर्श दिया यह ट्रैक कर के अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाएं।

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ

500+

USERS

100K+

TRUSTED ASTROLOGERS

20K+

DOWNLOADS