By अपर्णा पाटनी
महालक्ष्मी, धन्वंतरि और कुबेर पूजन का शुभ पर्व

धनतेरस, जिसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है, दीपावली महोत्सव का आरंभिक दिवस है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है और सनातन संस्कृति में धन, वैभव, स्वास्थ्य, आयु, सुरक्षा तथा आध्यात्मिक ऊर्जा के स्वागत का विराट उपासना पर्व है। वर्ष 2025 में धनतेरस का पर्व शनिवार, 18 अक्टूबर 2025 को उज्ज्वल आस्था एवं पारिवारिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा।
धनतेरस से कई दिन पूर्व ही पूरे घर की सफाई, झाड़ू-पोंछा, टाइल्स व दरवाजों की चमकाई की जाती है ताकि देवी लक्ष्मी का स्वागत भव्यता और पवित्रता के साथ हो। मांडने, रंगोली व शुभ मंगलकारी चित्र दरवाजों और आंगन में बनाए जाते हैं। खिड़कियों, छज्जों, बालकनी और मुख्य द्वार पर रंगीन लाइट्स, चमकीली झालरों और दीपमालाओं से सजावट की जाती है।
इस दिन संध्या के समय तेरह तिल के तेल से भरे दीपकों को दक्षिण-पश्चिम दिशा में जलाकर घर के बाहर या आंगन में रखा जाता है। इसे यमदीप कहा जाता है। यह प्रथा परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु या दुर्घटनाओं से रक्षा की कामना से की जाती है। भारत के विविध क्षेत्रों में धनतेरस संध्या को दीप वर्तिका-रजक, यम दीप-दान, दीप धारणा इत्यादि के अनुपम दृश्य दिखाई देते हैं।
इस दिन वस्त्र, आभूषण, धातु के बर्तन, विशेषकर सोना, चांदी, तांबा, पीतल के नए बरतन, सिक्के व जेवर खरीदना शुभ माना गया है। यह खरीदारी समृद्धि, ऐश्वर्य और वर्ष भर लक्ष्मी की स्थिरता का संकेत है। भले ही आप छोटी कोई वस्तु भी खरीदें, उसका अपना पुण्य और लाभ वर्षभर महसूस होता है।
धनतेरस की संध्या को यमराज की कृपा पाने और परिवार के प्रत्येक सदस्य की आयु, स्वास्थ्य व सुरक्षा की प्रार्थना के साथ दक्षिण-पश्चिम दिशा में तिल तेल का दीपक (यमदीप) आवश्यक रूप से जलाया जाता है।
कई श्रद्धालु धनतेरस के दिन फलाहार, दूध अथवा केवल जल पर रहकर उपवास करते हैं। यह उपवास शरीर-मन की शुद्धि के साथ भौतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को एकीकृत करने का साधन है। पूरे दिन भगवद्गीता पाठ, स्तोत्र, लक्ष्मी अष्टकम पढ़ना, ध्यान-पूजन और आराधना की जाती है।
परिवार के सभी सदस्य संध्या वेला में एकत्र होकर मां लक्ष्मी, धन्वंतरि, कुबेर और गणपति की सामूहिक पूजा करते हैं, मिठाइयाँ, फल, मेवे, नए बर्तन आपस में उपहार स्वरूप देते हैं, जिससे परिवारजनों के बीच प्रेम और सौहार्द की भावना का विस्तार होता है।
धनतेरस का वास्तविक महत्व केवल धन का संचय नहीं बल्कि स्वास्थ्य और आध्यात्मिक शुचिता, सकारात्मकता, पारिवारिक सुरक्षा, परंपरा, सेवा, सजग उपासना और समाज में उजास फैलाना है। यह दिन शुभारंभ, व्यापार, नूतन क्रय और समाज के आर्थिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक चेतना को ऊर्जित करने का सबसे बड़ा उत्सव है।
18 अक्टूबर 2025 का धनतेरस न केवल गृहलक्ष्मी और धन-ऐश्वर्य का व्रत है बल्कि स्वास्थ्य, भक्ति और सामाजिक उत्थान का अद्वितीय माध्यम है। प्रदोष-वृषभ काल में पूजन, दीपदान, बर्तन-धातु-वस्त्र की खरीद तथा सामूहिक भक्तिधारा से यह पर्व घर-परिवार में सुख, समृद्धि और संरक्षण का संवाहक बनेगा। सत्संग, दान और आराधना से पूरे वर्ष सकारात्मक ऊर्जा और लक्ष्मी-कुबेर के आशीर्वाद का संचार सुनिश्चित होता है।
प्रश्न 1: धनतेरस 2025 कब मनाई जाएगी और इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा?
उत्तर: धनतेरस शनिवार, 18 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। पूजन का मुख्य मुहूर्त शाम 6:44 से 7:42 बजे तक है, जबकि त्रयोदशी तिथि दोपहर 12:18 बजे से अगले दिन दोपहर 1:51 बजे तक रहेगी।
प्रश्न 2: धनतेरस के दिन किन प्रमुख देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
उत्तर: देवी महालक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि, भगवान कुबेर और भगवान श्रीगणेश की पूजा की जाती है। स्वास्थ्य, संपन्नता और विघ्न-निवारण हेतु इनकी सामूहिक आराधना की जाती है।
प्रश्न 3: यमदीप प्रज्वलन का क्या महत्व है और वह किस दिशा में रखा जाता है?
उत्तर: यमदीप, तिल के तेल का दीपक, दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखा जाता है। यह मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करने, परिवार की अकाल मृत्यु से रक्षा और स्वास्थ्य वृद्धि के लिए जलाया जाता है।
प्रश्न 4: धनतेरस पर क्या खरीदना सबसे शुभ माना जाता है और क्यों?
उत्तर: सोना, चाँदी, तांबे-पीतल के बर्तन, आभूषण या इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन या कोई भी नयी वस्तु खरीदना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह समृद्धि, स्थिरता और वर्ष भर लक्ष्मी-विजय का सूचक है।
प्रश्न 5: धनतेरस की अन्य सामाजिक और पारिवारिक विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर: परिवार के सभी लोग एकत्र होकर पूजा, भजन, दीपदान, दान और मिठाई प्रसाद के साथ प्रेम, सहयोग और त्याग का पर्व मनाते हैं, जिससे आपसी रिश्तों में मजबूती और सामूहिक सौहार्द बढ़ता है।
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