क्या है दशहरा 2025 का असली भाव और विविधता और क्यों भारत का हर कोना इसे नई ऊर्जा से मनाता है?

By पं. नीलेश शर्मा

दशहरा 2025 : शुभ तिथि, पूजा विधियाँ, विविध राज्य और हर परिवार के लिए सीख

दशहरा 2025: तिथि, पूजा विधियाँ और विविधता

सामग्री तालिका

कब है दशहरा 2025? विजयदशमी के शुभ मुहूर्त, तिथि और आवश्यक पूजा विधियाँ

दशहरा 2025 का पर्व गुरुवार, 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन देश के अलग-अलग इलाकों में विशेष पूजा, अनुष्ठान और उत्सव होते हैं। इस साल दशहरा की तिथि दशमी 1 अक्टूबर को दोपहर 3:16 बजे से प्रारंभ होकर 2 अक्टूबर की शाम 4:26 बजे तक रहेगी। सबसे शुभ मुहूर्त विजय मुहूर्त दोपहर 2:23 बजे से 3:11 बजे तक रहेगा और अपराह्न पूजा का समय 1:35 बजे से 3:59 बजे तक निर्धारित है। शमी पूजा, अपराजिता पूजा और सीमा अवलंघन जैसे अनुष्ठान इसी अवधि में किए जाते हैं।

पर्वतिथि और समयअवधि
दशमी तिथि प्रारंभ1 अक्टूबर, 3:16 PM
दशमी तिथि समाप्त2 अक्टूबर, 4:26 PM
विजय मुहूर्त2 अक्टूबर, 2:23-3:11 PM48 मिनट
अपराह्न पूजा2 अक्टूबर, 1:35-3:59 PM2 घं 23 मिनट

पूरे देश में घर-घर में साफ-सफाई, माला-फूलों से घर व पूजनस्थल का सजाना, शास्त्रों, पुस्तकों, औजारों और यहां तक कि वाहन तक की पूजा करना, नया सत्र शुरू करने के प्रतीक रूप में मन्त्रों और आशीर्वादों का आदान-प्रदान किया जाता है। महिलाएं पकवानों में पूड़ी, सब्ज़ी और मिठाइयां बनाती हैं। बच्चे हाट-बाज़ार में खिलौने चुनते हैं।

दशहरा क्यों मनाया जाता है? हर साल रावण को जलाने की परंपरा के पीछे का अर्थ क्या है?

शाम के समय मैदानों में विशाल रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन भारतीय समाज के अंदर गहराई से रचा-बसा आयोजन है। बच्चों के कंधों पर बूढ़े बुजुर्ग पुरानी कहानियाँ सुनाते हैं। हर साल क्यों जलाया जाता है रावण को? इसका उत्तर है नकारात्मकता कितनी भी प्रबल क्यों न हो, आखिरकार उसे झुकना ही पड़ता है। राम की धैर्य, मर्यादा और दुर्गा का साहस जीवन में हर अत्याचारी, अहंकारी और अन्यायी ताकत को मात देता है। इसी गाथा को परिवार और समाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराते हैं।

विजयदशमी के दो ऐतिहासिक दृष्टान्त: राम की जीत या दुर्गा का पराक्रम?

राम द्वारा रावण वध: उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत

रामायण के प्रसंग के अनुसार, श्रीराम ने लक्ष्मण और हनुमान के साथ रावण पर दस दिन का युद्ध किया। अंतिम दिन राम ने रावण का वध किया और सीता को वापिस लाए। दशहरा को इसी सत्य, भक्ति और धर्म के विजयी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

दुर्गा द्वारा महिषासुर वध: पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिण भारत

यहीं दूसरी ओर, दुर्गा माँ ने भी महिषासुर नामक राक्षस से नौ दिनों के भीषण युद्ध के बाद विजय प्राप्त की। दशहरा को दुर्गा पूजा का समापन मानते हैं, जब मां की मूर्तियों का विसर्जन नदी में किया जाता है।

इन दोनों कथाओं में शिक्षा स्पष्ट है सत्य धीमा हो सकता है मगर हारता कभी नहीं। राम का धैर्य और दुर्गा का साहस मुश्किल समय में भी मार्गदर्शक है।

दशहरा के रंग विविध, लेकिन भाव एक

भारत के अलग-अलग राज्य इस त्योहार को अपने-अपने रंग में रंग लेते हैं:

दिल्ली और उत्तर प्रदेश: रामलीला, पुतला दहन

रामलीला नाटकों का मंचन, विशाल मैदानों में पुतला दहन और सभी की सामूहिक भागीदारी दशहरा का मुख्य आकर्षण है।

पश्चिम बंगाल: दुर्गा विसर्जन

यहां दुर्गापूजा श्रृंखला का आखिरी दिन दशहरा है। महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर विदाई देती हैं।

कर्नाटक - मैसूर: शाही रंग और झांकियाँ

मैसूर का दशहरा शाही महल रोशनी से जगमगाता है, सजे-धजे हाथी, वाद्य यंत्र और पारंपरिक जुलूस स्थानीय संस्कृति की भव्यता के प्रतीक बन जाते हैं।

तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश: गोलू - गुड़ियों का त्योहार

घरों में सीढ़ी बनाकर देवी-देवताओं और कथाओं की गुड़ियों की सजावट होती है। पड़ोसी, बच्चे और रिश्तेदार भजन-कीर्तन, प्रसाद और कथा सुनाने के लिए जुटते हैं।

कुल्लू, हिमाचल प्रदेश: देवताओं का संगम

कुल्लू में सौ से अधिक गांवों के देवता एकत्रित होते हैं। पूरे सप्ताह उत्सव चलता है, जिससे यह आयोजन विश्वभर में अद्वितीय बन जाता है।

विजयदशमी का अध्यात्मिक भाव: जीवन की दिशा

दशहरा का असल महत्व बाहरी नहीं, भीतरी है। हर साल रावण दहन आत्म-शुद्धि का रूपक है क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अहम को जलाना जीवन में शान्ति लाने का संदेश देता है। यह दिन नया कार्य, नई शिक्षा आरम्भ करने का भी श्रेष्ठ समय है।

आज के समय में दशहरा का अर्थ

तेजी से बदलती जिंदगी में दशहरा की प्रासंगिकता बढ़ी है:

  • मानसिक तनाव, लोभ, निर्जनता जैसी चुनौतियों को भीतर के रावण रूपी दोषों को पहचानकर जीतने का संदेश देता है।
  • डिजिटल युग में रामलीला का सीधा प्रसारण, डिजिटल ग्रीटिंग्स से नई पीढ़ी की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
  • पुस्तकें, लैपटॉप की पूजा शिक्षा और कौशल की साधना का महत्व बताता है।

नवरात्रि और दशहरा का जुड़ाव: नौ रातों का तप, दसवें दिन की सिद्धि

नवरात्रि की साधना का फलीभूत परिणाम दशहरा है। घर-घर व्रत-पूजन के पश्चात पर्व पर व्रत के समापन और नए आरंभ का उत्साह जगा रहता है।

क्या गंगा दशहरा और विजयदशमी एक ही पर्व हैं?

नहीं, गंगा दशहरा (जो जून में आता है) गंगा नदी के अवतरण पर आधारित है, जबकि विजयदशमी शरद ऋतु में बुराइयों के अंत, विजय और पुनर्नवता का उत्सव है।

दशहरा 2025 का सार: खुद से खुद का मेल, समाज से नई डोर

आज दशहरा केवल उत्सव, आतिशबाजी, या मिठाइयों तक सीमित नहीं है। यह जीवन को निखारने, असली ताकत पहचानने और परिवार-समाज को एक साथ लाने का मौका है। त्याग, धैर्य और साहस के मूल्यों के साथ जीना, यही दशहरा सिखाता है।

जैसे-जैसे रावण दहन होता है, भीतर के नकारात्मकता जलाने, साहस और नई शुरुआत के बीज बोने का संकल्प आकार लेता है।

सभी को दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ।*

अक्सर पूछे गए प्रश्न (FAQs)

क्या दशहरा 2025 देशभर में एक ही दिन मनाया जाएगा?
2025 में दशहरा 2 अक्टूबर, गुरुवार को पूरे भारत में मनाया जाएगा।

विजय मुहूर्त और पूजा का सबसे शुभ समय क्या है?
2 अक्टूबर को विजय मुहूर्त दोपहर 2:23-3:11 बजे और अपराह्न पूजा 1:35-3:59 बजे है।

क्या गंगा दशहरा और विजयदशमी समान पर्व हैं?
नहीं, दोनों अलग-अलग पर्व हैं; गंगा दशहरा जून में होता है, विजयदशमी शरद ऋतु में मनाई जाती है।

दशहरा के प्रतीकात्मक अर्थ क्या हैं?
दशहरा सत्य की विजय, आत्म-शुद्धि और नए आरंभ का प्रतीक है।

भारत के किस-किस राज्य में दशहरा अलग-अलग रूप से मनाया जाता है?
उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश (कुल्लू), कर्नाटक (मैसूर), पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में दशहरा विभिन्न रंग में मनाया जाता है।

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पं. नीलेश शर्मा

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