By पं. अभिषेक शर्मा
अनादि काल से सूर्य के दिव्य रूपों, कथाओं और आस्था की प्रकाशमयी यात्रा

प्रकाश, चेतना और जीवन की अनादि धारा
सृष्टि के आरंभ से पहले सब ओर केवल अंधकार था। न समय था, न दिशा थी, न ही कोई गति। अनंत काल तक फैले इस तिमिर में जब प्रथम हलचल उत्पन्न हुई, वही क्षण सूर्यदेव के अवतरण का था। क्षीरसागर के मध्य शेषनाग की शैया पर विराजमान भगवान विष्णु ने जब अपनी दिव्य नेत्रों को खोला, तो उनके नेत्रों से फूटा प्रकाश ब्रह्मांड को आलोकित कर गया। यह केवल प्रकाश नहीं था, बल्कि चेतना और जीवन का आद्य स्वरूप था, जो कालांतर में सूर्यदेव के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
वैदिक ज्योतिष में सूर्य ग्रह: प्रकाश, प्राण और प्रतिष्ठा का प्रतीक
जब ब्रह्मांड में न पृथ्वी थी, न आकाश था, न जीव था, न कोई तत्व, तब केवल एक विराट सत्ता विद्यमान थी। इस सत्ता को वेदों में विराट पुरुष कहा गया है। जब इस विराट पुरुष के नाभि से एक कमल खिला और उस कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए, उसी समय भगवान विष्णु की आँखों से एक तेजस्वी प्रकाश उत्पन्न हुआ। यह प्रकाश इतना प्रखर था कि स्वयं देवता भी उसकी चमक को न सह सकें। यही तेज सूर्य के रूप में प्रकट हुआ।
यजुर्वेद में इस दिव्य प्रक्रिया का वर्णन मिलता है
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत
अर्थात चन्द्रमा उनके मन से और सूर्य उनकी आँखों से उत्पन्न हुए।
इसलिए सूर्य को सूर्य नारायण कहा जाता है। वे केवल प्रकाश नहीं, बल्कि स्वयं भगवान नारायण के तेज का प्रत्यक्ष रूप हैं।
त्रेता काल में जब असुरों का प्रभाव बढ़ा, तब देवताओं को स्वर्ग से निकाला जाने लगा। वे अपनी माता अदिति के पास पहुँचे जिन्होंने अपने पुत्रों की दयनीय स्थिति देखकर घोर तपस्या करने का निश्चय किया। अदिति हिमालय की ऊँची चोटियों पर जाकर सूर्यदेव का ध्यान करने लगीं। वर्षों तक उन्होंने कठिन व्रत और तप किया।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव प्रकट हुए और अदिति ने उनसे अपने गर्भ से जन्म लेने का वर माँगा। सूर्यदेव ने वर स्वीकार किया, परंतु कठोर तपस्या के कारण संज्ञान मिला कि गर्भस्थ तेज अत्यधिक प्रखर हो गया है। इसलिए अदिति ने योग बल से गर्भ को अंड रूप में बाहर निकाल दिया।
उस अंड से निकला प्रकाश मार्तंड कहलाया। इसी रूप ने देवताओं को असुरों से मुक्त कराया। इसलिए सूर्य का एक नाम मार्तंड और दूसरा आदित्य है।
सूर्यदेव का तेज इतना प्रचंड था कि उनकी पत्नी संज्ञा धीरे धीरे उसे सहन न कर सकीं। वह निरंतर दुर्बल होती गईं। अंततः उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या के लिए जाएँगी। परंतु वे अपने स्थान को खाली नहीं छोड़ना चाहती थीं। उन्होंने अपनी ही छाया रूपी प्रतिच्छाया बनाई और उसे अपना स्थान सौंप दिया।
छाया ने संज्ञा का स्थान लिया और सूर्यदेव के तीन संतानों की माता बनी। समय के साथ छाया का स्वभाव कठोर हो गया और वास्तविक पुत्र यमराज से वह अनुचित व्यवहार करने लगी। यमराज ने संदेह के कारण सूर्यदेव को सब बताया, और सूर्यदेव ने अपनी दिव्य दृष्टि से सत्य जान लिया।
संज्ञा घोड़ी रूप में तपस्या कर रही थीं। सूर्यदेव उन्हें ढूँढते हुए घोड़े का रूप धारण कर उनके पास पहुँचे। संज्ञा और सूर्यदेव के अश्विनीकुमार उत्पन्न हुए। बाद में विश्वकर्मा ने सूर्यदेव के तेज को कम किया ताकि संज्ञा उन्हें सहन कर सकें। यह कथा दर्शाती है कि संबंधों में समझ, धैर्य और प्रेम कितना महत्वपूर्ण है।
एक समय पृथ्वी पर माली और सुमाली नामक दैत्य अत्याचार कर रहे थे। उन्हें भगवान शिव से वर मिला था कि संकट में शिव स्वयं उनकी रक्षा करेंगे। जब सूर्यदेव धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने पहुँचे तो दैत्यों ने शिव को पुकारा। वरदान के बंधन में शिव को आना पड़ा।
त्रिशूल के प्रहार से सूर्यदेव के तीन भाग हो गए। यह दृश्य इतना भयंकर था कि ऋषि कश्यप का हृदय क्रोध से भर उठा। उन्होंने शिव को श्राप दिया कि उन्हें भी एक दिन अपने पुत्र पर त्रिशूल चलाना पड़ेगा। यही श्राप आगे चलकर गणेश के प्रसंग में सत्य हुआ।
बाद में शिव ने अपनी कृपा से सूर्यदेव को पुनर्जीवित किया और उनके तीन स्वरूप कोणार्क, देवार्क और लोलार्क में प्रतिष्ठित हुए।
कर्ण सूर्यदेव के परम भक्त थे। वे प्रतिदिन गंगा में अर्घ्य देकर सूर्य मंत्र का जाप करते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यदेव स्वयं उन्हें दर्शन देते और दिव्य ज्ञान प्रदान करते थे। कर्ण को जन्म से मिला कवच कुंडल सूर्यदेव का वरदान था जो उन्हें अजेय बनाता था।
जब इंद्र ब्राह्मण वेश में कर्ण के पास आए और कवच कुंडल माँगे, तब भी कर्ण ने अपने दानधर्म के सिद्धांत को निभाया। सूर्यदेव ने अपने भक्त की परीक्षा और त्याग को देखा और उसे अपनी दिव्य कृपा से आशीष दिया। कर्ण की मृत्यु पर सूर्यदेव का प्रकाश मंद पड़ने की कथा उनके प्रेम और संबंध की गहराई को दर्शाती है।
साम्ब अपनी सौंदर्य पर अभिमान करते हुए अनेक स्त्रियों को भ्रमित करता था। जब कृष्ण को यह ज्ञात हुआ, उन्होंने उसे श्राप दिया कि वह कोढ़ी हो जाएगा। पीड़ा से व्याकुल साम्ब ने सूर्यदेव की कठोर तपस्या की। चंद्रभागा नदी के तट पर वर्षों तक साधना के बाद सूर्यदेव ने उसे आरोग्य प्रदान किया।
कृतज्ञ साम्ब ने सूर्यदेव के भव्य मंदिरों का निर्माण कराया और उन्हीं के कारण आज भी देवार्क तथा अन्य सूर्य मंदिर इतने प्रसिद्ध हैं। साम्ब की कथा सिखाती है कि पश्चाताप और ईमानदार तपस्या से हर दोष मिट सकता है।
सूर्यदेव के विवस्वान रूप से वैवस्वत मनु उत्पन्न हुए जिन्होंने मानव समाज की पुनः स्थापना की। उनके पुत्र इक्ष्वाकु से सूर्यवंश की शुरुआत हुई। इसी वंश में आगे चलकर महाराज दशरथ और भगवान श्रीराम उत्पन्न हुए।
ऋषि अगस्त्य द्वारा राम को दिया गया आदित्य हृदय स्तोत्र इस वंश की सूर्य उपासना की परंपरा का शाश्वत प्रतीक है।
इन सभी कथाओं में केवल पौराणिक रोचकता ही नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक संदेश छिपा है। सूर्यदेव हमें सिखाते हैं कि प्रकाश बाहर से नहीं, भीतर से उत्पन्न होता है। उनकी कथाएँ साहस, तप, त्याग, समर्पण और आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन करती हैं।
सूर्य सृष्टि का मूल प्रकाश है और मन का भी। जो सूर्य को समझ लेता है, वह जीवन की हर दिशा में प्रकाश पा लेता है।
1.सूर्यदेव का सबसे प्राचीन उल्लेख कहाँ मिलता है
वेदों में, विशेषकर ऋग्वेद और यजुर्वेद में सूर्य की उत्पत्ति और महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है।
2.सूर्यदेव को आदित्य क्यों कहा जाता है
क्योंकि वे अदिति के पुत्र हैं और अदिति के बारह पुत्रों को आदित्य कहा गया है।
3.सूर्य और संज्ञा की कथा का मुख्य संदेश क्या है
यह कथा दिखाती है कि संबंधों में धैर्य, समर्पण और समझ आवश्यक हैं।
4.सूर्यदेव और शिव का युद्ध क्यों हुआ था
दैत्यों को मिले वरदान के कारण शिव को बाध्य होकर हस्तक्षेप करना पड़ा। यह धर्म और कर्तव्य के बीच की दुविधा थी।
5.कर्ण सूर्यदेव के इतने प्रिय क्यों थे
क्योंकि कर्ण की भक्ति निष्ठावान, निष्कपट और त्यागमय थी।
6.सूर्य उपासना का मुख्य लाभ क्या माना गया है
मानसिक शांति, ऊर्जा, रोगों से रक्षा और आत्मबल की वृद्धि।
सूर्य राशि मेरे बारे में क्या बताती है?
मेरी सूर्य राशि
अनुभव: 19
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