By पं. अमिताभ शर्मा
जानिए श्मशान में शिव के निवास के पीछे छिपा गहरा प्रतीकवाद और मनोवैज्ञानिक सन्देश

भारतीय संस्कृति में जहाँ देवताओं की पूजा महलों, स्वर्णिम आभा और सौंदर्य के बीच होती है, वहीं शिव का संसार बिल्कुल अलग है। वे श्मशान में निवास करते हैं, भस्म से शरीर ढकते हैं, व्याघ्रचर्म धारण करते हैं और भय के बीच भी सहज साक्षी बने रहते हैं। वे संहार के देवता ही नहीं, सत्य और वैराग्य के मूर्त रूप हैं। उनकी उपस्थिति उस स्थान पर है जहाँ से मनुष्य सामान्यतः दूर भागता है।
श्मशान वह जगह है जहाँ जीवन का परम सत्य प्रकट होता है। वहाँ न धन की कीमत है, न पद की, न सौंदर्य की। देह पंचतत्व में विलीन होती है और अहंकार की हर परत आग में खो जाती है। शिव के लिए यह भय का स्थान नहीं, बल्कि यथार्थ की भूमि है। वे यहाँ ध्यान में बैठते हैं क्योंकि मृत्यु के सम्मुख माया की सारी परछाइयाँ समाप्त हो जाती हैं।
शिव का निवास प्रतीकात्मक शिक्षा है।
भस्म स्मरण कराती है कि सभी उपलब्धियाँ अंततः राख बन जाती हैं।
तीसरी आँख द्वैत से आगे की दृष्टि है जहाँ जीवन और मृत्यु एक ही सत् में विलीन हैं।
कपालमाला निर्भयता और वैराग्य का चिह्न है।
शिव जीवन को अस्वीकार नहीं करते बल्कि मृत्यु को स्वीकार कर उसके पार जाते हैं।
वैराग्य का अर्थ है वासनाओं के अधीन हुए बिना जीवन जीना। शिव गृहस्थ भी हैं, सन्यासी भी हैं। यह द्वैत सिखाता है कि सच्चा प्रेम स्वतंत्रता देता है और सच्चा त्याग विवेकपूर्ण स्वीकार है। पकड़े रहने से दुख जन्मता है और छोड़ने से शांति मिलती है।
आज मृत्यु को छिपाकर जीया जाता है। पर शिव उसे जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक मानते हैं। श्मशान की राख उन्हें यह अनुभव कराती है कि धन, यश और नियंत्रण अस्थायी हैं। स्थायी केवल आत्मज्ञान है।
अघोरी और तांत्रिक साधक शिव के मार्ग पर चलते हुए श्मशान में ध्यान करते हैं। मृत्यु के समीप बैठकर यह प्रश्न उठता है
मैं कौन हूँ
क्या मैं केवल यह शरीर हूँ
शरीर जलने के बाद क्या शेष रह जाता है
यही प्रश्न आत्मबोध की यात्रा का आरंभ करते हैं।
शिव हमें यह स्मरण कराते हैं कि मनुष्य अपनी देह, संपत्ति या प्रतिष्ठा नहीं है। वह वह चेतना है जो सबका साक्षी है। जब जीवन में हानि, शून्यता या टूटन आए, उससे मत भागिए। रुकिए, अनुभव कीजिए और वही अनुभव नए बीज बोता है।
अघोरी साधना शिव के पूर्ण स्वीकार का विस्तार है। वे मृत्यु और अपवित्रता में भी परमात्मा को खोजते हैं। उनका मत है कि यदि विनाश में ईश्वर को देख सको तो वह हर स्थान पर प्रकट होता है।
प्राचीन कथा में पार्वती पूछती हैं कि वे महलों में न रहकर श्मशान में क्यों रहते हैं। शिव उत्तर देते हैं कि मृत आत्माएँ छल नहीं करतीं, वहाँ केवल सत्य है। इस प्रकार श्मशान जीवन के अंत का नहीं, जागरण का स्थान बन जाता है।
हर व्यक्ति को श्मशान जाने की आवश्यकता नहीं। लेकिन जीवन में जब कुछ समाप्त हो, उसे जलने दीजिए, उसके साथ बैठिए। राख से ही स्पष्टता आती है और मौन से ही ज्ञान प्रकट होता है।
| प्रतीक | संदेश |
|---|---|
| भस्म | अस्थिरता और अंतिम सत्य |
| तीसरी आँख | द्वैत के पार दृष्टि |
| कपालमंडल | मृत्यु से निर्भयता |
| श्मशान | माया का क्षय और समानता |
| परिवार के साथ शिव | जीवन और सन्यास का संतुलन |
| अघोरी साधना | निर्भीक आध्यात्मिक परीक्षण |
| पार्वती प्रश्न कथा | सत्य की खोज |
1. शिव श्मशान में क्यों रहते हैं
क्योंकि वहाँ जीवन का अंतिम सत्य प्रकट होता है और अहंकार की सभी परतें समाप्त हो जाती हैं।
2. क्या शिव मृत्यु को भय मानते हैं
नहीं। शिव मृत्यु को शिक्षक मानते हैं जो वास्तविकता दिखाती है।
3. भस्म का क्या अर्थ है
भस्म संसारिक सफलता की क्षणिकता का स्मरण है।
4. अघोरी साधना का उद्देश्य क्या है
भय, अपवित्रता और मृत्यु के पार परम सत्य की अनुभूति प्राप्त करना।
5. आधुनिक जीवन में शिव का संदेश कैसे उपयोगी है
अस्थिरता को स्वीकार कर संतुलन, वैराग्य और आत्मज्ञान की ओर बढ़ने में सहायक है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 32
इनसे पूछें: विवाह, करियर, व्यापार, स्वास्थ्य
इनके क्लाइंट: छ.ग., उ.प्र., म.प्र., दि.
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें