छठ पूजा 2025 : व्रत विधान और महत्व

By पं. अभिषेक शर्मा

सूर्य देव और छठी मइया की आराधना का पर्व

छठ पूजा 2025 : तिथि, अनुष्ठान और विस्तृत विधि

छठ पूजा भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र पर्वों में से एक है। यह सूर्य देव और उनकी बहन छठी मइया को समर्पित है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में सबसे अधिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। छठ पूजा अपने कठोर अनुशासन, निर्मल पवित्रता और सादगी भरे निष्कलंक आचरण के लिए विश्वविख्यात है। यह पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

छठ पर्व का केंद्र सूर्य देव की आराधना है। सूर्य को वह देवता माना गया है जिनकी कृपा से जीवन, ऊर्जा, स्वास्थ्य और समाज की समृद्धि संभव है। सूर्य के साथ ही छठी मइया, जिन्हें प्रकृति और मातृशक्ति का स्वरूप माना जाता है, का पूजन भी इस व्रत का अभिन्न अंग है।

वर्ष 2025 में छठ पूजा 25 अक्टूबर शनिवार से प्रारंभ होकर 28 अक्टूबर मंगलवार को सम्पन्न होगी। यह चार दिनों तक चलने वाला अत्यंत कठोर और अनुशासित पर्व है।


पर्व के नाम और समय की विस्तृत व्याख्या

[translate:छठ] शब्द का अर्थ है "छठा" अर्थात् षष्ठी तिथि। यह पर्व अमावस्या के छह दिन बाद शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सूर्य की उपासना कर स्वास्थ्य, समृद्धि और दीर्घायु की कामना की जाती है।

छठ पूजा वर्ष में दो बार आती है:

  1. चैती छठ : चैत्र मास में होली के छह दिन बाद (मार्च-अप्रैल)।
  2. कार्तिक छठ : दीपावली के छह दिन बाद कार्तिक मास में (अक्टूबर-नवंबर)।

इनमें से कार्तिक छठ सबसे अधिक प्रसिद्ध और व्यापक स्तर पर आयोजित होती है। इसका कारण यह है कि यह त्योहार नई फसल, परिपक्व ऋतु और दीर्घ धार्मिक उत्सवों के उपरांत आता है। यह परिश्रम, आभार और नवीनीकरण का प्रतीक बन जाता है।


छठ पूजा का महत्व (आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक)

आध्यात्मिक महत्व

छठ पूजा में सूर्य देव की उपासना मात्र सूर्य की भौतिक किरणों की पूजा नहीं है बल्कि यह आत्मा की शुद्धि और अहंकार, मोह तथा नकारात्मकता के नाश का प्रतीक है। सूर्य सत्य, अमरत्व और आलोक के स्वामी कहे गए हैं। सूर्य की उपासना से व्यक्ति नए जीवन, नई ऊर्जा और मानसिक शांति का आशीर्वाद प्राप्त करता है।

स्वास्थ्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

छठ पूजा के दौरान किए जाने वाले सूर्य उपासना और अर्घ्य का वैज्ञानिक संबंध भी है। सूर्य की किरणें विटामिन डी का निर्माण करती हैं जो अस्थियों को मजबूत बनाती हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली सुदृढ़ होती है। इस प्रकार यह पर्व धर्म और विज्ञान दोनों का सुंदर समागम है।

सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

नदी तटों, तालाबों और सरोवरों में एकत्र होकर स्त्रियों का सामूहिक व्रत और प्रार्थना करना समाज में भाईचारे और एकता का अद्भुत परिचायक है। भक्तों का सामूहिक भाव से जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना इस पर्व का सबसे दिव्य दृश्य प्रस्तुत करता है।


चार दिवसीय अनुष्ठान और उनका पूर्ण विवरण

1. नहाय-खाय - 25 अक्टूबर (शनिवार)

पर्व का प्रथम दिन "नहाय-खाय" कहलाता है। श्रद्धालु गंगा, कोसी या यमुना जैसी पवित्र नदियों अथवा निकटवर्ती जलाशयों में स्नान कर शुद्धि प्राप्त करते हैं। इसके बाद सात्त्विक भोजन किया जाता है। भोजन में लौकी की सब्जी, चने की दाल और भात शुद्ध घी में बनाकर खाया जाता है। यह भोजन प्रदूषण रहित और पूर्ण सात्त्विक वातावरण में तैयार होता है। इसी दिन से व्रती अपने जीवन में पूर्ण शुद्धता और संयम का पालन प्रारंभ करते हैं।

2. खरना - 26 अक्टूबर (रविवार)

दूसरे दिन व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास करते हैं। यह दिन तपस्या और कठोर साधना का प्रतीक है। शाम को सूर्यास्त के समय गुड़ की खीर, पूरियाँ, कद्दू-भात और ठेकुआ का भोग तैयार किया जाता है। सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रती यह प्रसाद ग्रहण करते हैं। खरना के साथ ही आगामी 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत प्रारंभ होता है।

3. संध्या अर्घ्य - 27 अक्टूबर (सोमवार)

तीसरा दिन छठ पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन श्रद्धालु सजधज कर परिवार और समुदाय के साथ नदी या तालाब के तट पर पहुँचते हैं। कमर-भर जल में खड़े होकर सूर्यास्त के समय सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। बाँस की सूप में ठेकुआ, गन्ना, केला, नारियल, अदरक, हल्दी, मौसमी फल और जल सहित प्रसाद अर्पित किया जाता है। सूर्य की अंतिम लालिमा में हजारों दीप जलते हैं। स्त्रियों के गीत और भजन वातावरण को दिव्य बना देते हैं।

4. उषा अर्घ्य - 28 अक्टूबर (मंगलवार)

यह पर्व का अंतिम और सबसे पवित्र क्षण है। प्रातःकाल उगते सूर्य को जल अर्पित किया जाता है। इसे "भोर का अर्घ्य" या "बिहनिया अर्घ्य" कहा जाता है। व्रती कमर-भर जल में खड़े होकर उगते सूर्य का अभिवादन करते हैं। इसके बाद व्रती अपना व्रत अदरक, मिश्री और जल से तोड़ते हैं। तत्पश्चात प्रसाद का वितरण पूरे परिवार, मित्रों और समुदाय में किया जाता है। यह पर्व हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न होता है।


अनुशासन और नियम

  • शारीरिक और मानसिक शुद्धि : पूरे व्रत काल में शारीरिक, मानसिक और पर्यावरणीय पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है।
  • 36 घंटे का निर्जल उपवास : खरना के पश्चात उपवास में भोजन और जल का पूर्ण त्याग किया जाता है। यह तप और संकल्प का अद्भुत उदाहरण है।
  • सरल वस्त्र : व्रती विशेषकर महिलाएँ बिना सिले वस्त्र (साड़ी) धारण करती हैं और पीले, लाल, नारंगी जैसे शुभ रंगों को पहना जाता है।
  • ठेकुआ : छठ पूजा का प्रमुख प्रसाद है। गेहूँ का आटा, गुड़ और घी से इसका निर्माण होता है। ठेकुआ मधुरता और आस्था का प्रतीक है।
  • निस्वार्थ भावना : यह व्रत केवल व्यक्तिगत कल्याण के लिए नहीं बल्कि परिवार और पूरी मानवता के स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना हेतु किया जाता है।

सांस्कृतिक विविधताएँ और ऐतिहासिक संदर्भ

छठ पूजा को विभिन्न स्थानों पर "डाला छठ", "सूर्य षष्ठी", "छठ महापर्व", "डाला पूजा" और "सूर्य पूजा" कहा जाता है।

पौराणिक संदर्भ :

  • महाभारत में उल्लेख है कि द्रौपदी और पांडवों ने छठ पूजा का अनुष्ठान कर अपना राज्य पुनः अर्जित किया था।
  • कर्ण, जो सूर्यपुत्र थे, प्रतिदिन सूर्य की पूजा और अर्घ्यदान करते थे। उनकी पूजा के प्रभाव से ही इस व्रत को अपार महत्व मिला है।

छठ पूजा 2025 - गहन संदेश और महत्ता

छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं है बल्कि आत्मिक और सांस्कृतिक साधना है। यह हमें जीवन में अनुशासन, सादगी और प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देती है। सूर्य तथा छठी मइया की उपासना कर भक्त स्वास्थ्य, समृद्धि और शांति की कामना करते हैं।

आधुनिक जीवन की आपाधापी में छठ पूजा हमें बताती है कि संयम, पवित्रता और कृतज्ञता ही वास्तविक उन्नति और कल्याण के मूल स्तंभ हैं। यह पर्व प्रकृति और आराधना के संगम के रूप में जीवन को सुख, संतोष और आशीर्वाद से भर देता है।

छठ पूजा 2025 - प्रश्नोत्तर (FAQ)

प्रश्न 1. छठ पूजा 2025 कब मनाई जाएगी?
उत्तर: छठ पूजा 2025 शनिवार, 25 अक्टूबर से मंगलवार, 28 अक्टूबर तक मनाई जाएगी।

प्रश्न 2. छठ पूजा के चार मुख्य दिन कौन-से हैं और उनके अनुष्ठान क्या हैं?
उत्तर: छठ पूजा के चार प्रमुख दिन हैं:

  • नहाय-खाय (25 अक्टूबर): पवित्र जल में स्नान और सात्विक भोजन।
  • खरना (26 अक्टूबर): निर्जला उपवास और सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर व अन्य प्रसाद ग्रहण।
  • संध्या अर्घ्य (27 अक्टूबर): नदी तट पर खड़े होकर सूर्यास्त को जल और अन्य सामग्री से अर्घ्य देना।
  • उषा अर्घ्य (28 अक्टूबर): सूर्योदय को जल अर्पित कर व्रत तोड़ना।

प्रश्न 3. छठ पूजा का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है?
उत्तर: आध्यात्मिक रूप से यह अहंकार व नकारात्मकता से मुक्ति का प्रतीक है, जबकि वैज्ञानिक रूप में सूर्य की किरणों से शरीर को विटामिन डी मिलती है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

प्रश्न 4. छठ पूजा में अपव्य से बचने के लिए किन नियमों का पालन आवश्यक है?
उत्तर: भावपूर्ण निर्जला उपवास, शारीरिक एवं मानसिक शुद्धता, सादे वस्त्र पहनना और ठेकुआ जैसे पारंपरिक प्रसाद का उपयोग अनिवार्य है।

प्रश्न 5. छठ पूजा में सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से क्या महत्त्व है?
उत्तर: यह सामाजिक एकता का पर्व है, जिसमें प्रसाद वितरण, सामूहिक पूजा और दान-परोपकार शामिल हैं।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

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